बे-तख़ल्लुस

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'बेतख़ल्लुस' हूं मुझे कोई भी अपना लेगा

manu

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Monday, April 27, 2009

ghazal,,,,,

 
बेखुदी, और इंतज़ार नहीं,
छोड़ आई नज़र क़रार कहीं
 
तेरी रहमत है, बेपनाह मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं
 
निभे अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं
 
सख्त दो-इक, मुकाम और गुजरें,
फ़िर तो मुश्किल, ये रह्गुजार नहीं
 
काश! पहले से ये गुमाँ होता,
यूँ खिजाँ आती है, बहार नहीं
 
अपने टोटे-नफे के राग न गा,
उनकी महफिल, तेरा बाज़ार नहीं
 
जांनिसारी, कहो करें कैसे,
जां कहीं, और जांनिसार कहीं
 

Monday, April 20, 2009

ghazal........

खाली प्याले, निचुड नीम्बू, टूटे बुत सा अपना हाल

कब सुलगी दोबारा सिगरेट ,होकर जूते से पामाल


रैली,परचम और नारों से कर डाला बदरंग शहर

वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल


चन्दा पर या मंगल पर बसने की जल्दी फिक्र करो

बढती जाती भीड़, सिमटती जाती धरती सालों साल


गांधी-गर्दी ठीक है लेकिन ऐसी भी नाचारी क्या

झापड़ खाकर एक पे आगे कर देते हो दूजा गाल


यार, बना कर मुझको सीढी, तू बेशक सूरज हो जा

देख कभी मेरी भी जानिब,मुझको भी कुछ बख्श जलाल


उनके चांदी के प्यालों में गुमसुम देखी लालपरी

अपने कांच के प्याले में क्या रहती थी खुशरंग-जमाल

Monday, April 6, 2009

Satpal ji ke Tarhi Mushaayre se

कभी इन्कार चुटकी मे,कभी इक़रार चुटकी मे
हज़ारों रंग बदले है निगाहे-यार चुटकी में

मैं रूठा सौ दफ़ा लेकिन मना इक बार चुटकी में
ये क्या जादू किया है आपने सरकार चुटकी में

बड़े फ़रमा गए, यूँ देखिये तस्वीरे-जाना को,
ज़रा गर्दन झुकाकर कीजिये दीदार चुटकी में

कहो फिर सब्र का दामन कोई थामे भला कैसे,
अगर ख़्वाबों में हो जाए विसाले-यार चुटकी में

ग़ज़ल का रंग फीका हो चला है धुन बदल अपनी
तराने छेड़ ख़ुशबू के, भुलाकर ख़ार चुटकी में

न होना हो तो ये ता-उम्र भी होता नहीं यारो
मगर होना हो तो होता है ऐसे प्यार चुटकी में

वजूद अपना बहुत बिखरा हुआ था अब तलक लेकिन
वो आकर दे गया मुझको नया आकार चुटकी में


जो मेरे ज़हन में रहता था गुमगश्ता किताबों-सा
मुझे पढ़कर हुआ वो सुबह का अखबार चुटकी

कभी बरसों बरस दो काफ़िये तक जुड़ नहीं पाते
कभी होने को होते हैं कई अश'आर चुटकी में

Tuesday, March 24, 2009

GHAZAL,,,


कड़कती धूप को सुबहे-चमन लिखा होगा

फ़रेब खा के सुहाना सुखन लिखा होगा


कटे यूँ होंगे शबे-हिज़्र में पहाड़ से पल

ख़ुद को शीरी औ मुझे कोहकन लिखा होगा


लगे उतरने सितारे फलक से उसने ज़रूर

बाम को अपनी कुआरा गगन लिखा होगा


शौके-परवाज़ को किस रंग में ढाला होगा

कफ़स को तो चलो सब्ज़ा-चमन लिखा होगा


हर इक किताब के आख़िर सफे के पिछली तरफ़

मुझी को रूह, मुझी को बदन लिखा होगा


ये ख़त आख़िर का मुझे उसने अपनी गुरबत को

सुनहरी कब्र में करके दफ़न लिखा होगा |

Wednesday, March 11, 2009

happy holi
असर दिखला रहा है खूब, मुझ पे गुलबदन मेरा,
उसी के रंग जैसा हो चला है, पैराहन मेरा
 
कोई मूरत कहीं देखी, वहीं सर झुक गया अपना
मुझे काफ़िर कहो बेशक, यही है पर चलन मेरा
 
हजारों बोझ हैं दिल पर, मेरे बेहिस गुनाहों के,
तेरे अहसां से लेकिन दब रहा है, तन-बदन मेरा
 
उस इक कूचे में मत देना बुलावे मेरी मय्यत के,
शहादत की वजह ज़ाहिर न कर डाले कफ़न मेरा
 
मैं इस आख़िर के मिसरे में, जरा रद्दो-बदल कर लूँ
ख़फा वो हो ना बैठे, खूब समझे है सुखन मेरा
 
मुझे हर गाम पर लूटा है, मेरे राहनुमाओं ने,
ज़रा देखूं के ढाए क्या सितम, अब राहजन मेरा
 
यहाँ शोहरत-परस्ती है, हुनर का अस्ल पैमाना
इन्हीं राहों पे शर्मिंदा रहा है, मुझसे फन मेरा
 
कभी आ जाए शायद हौसला  परबत से भिड़ने का,
जरा देखो सही तुम नाम रख कर कोहकन मेरा

Monday, February 16, 2009

जुनूने-गिरिया का ऐसा असर भी, मुझ पे होता है
कि जब तकिया नहीं मिलता, तो दिल कागज़ पे रोता है

अबस आवारगी का लुत्फ़ भी, क्या खूब है यारों,
मगर जो ढूँढते हैं, वो सुकूं बस घर पे होता है

तू बुत है, या खुदा है, क्या बाला है, कुछ इशारा दे,
हमेशा क्यूँ मेरा सिजदा, तेरी चौखट पे होता है

अजब अंदाज़ हैं कुदरत, तेरी नेमत-नवाजी के
कोई पानी में बह जाता, कोई बंजर पे रोता है

दखल इतना भी, तेरा न मेरा उसकी खुदाई में
कि दिल कुछ चाहता है, और कुछ इस दिल पे होता है |

Monday, February 9, 2009

आदत

कल परसों की बात......चला जा रहा था यूँ ही कहीं...मोबाईल फोन कानो से लगा था...किसी अजीज से बात करता जा रहा था.....रास्ता एक दम सुनसान था.....ना कोई आदमी , न बस्ती...ना कोई मुहल्ल्ला ...बस सुनसान राह...एक दम अकेली ..वीरान..सुनसान.......... बस मेरे और मेरे दोस्त के अलावा ( बल्कि वो दोस्त भी तो फोन पर ही था.)...उस वीराने में एक आदमी टमाटर की रेहडी हांके जा रहा था...जोरों से चीखता........
"टमाटर ले लो...........टमाटर वाला..........""
लाल रंग के देसी टमाटर ...कहीं हल्का सा हरा -पीला पॅन लिए मुझे वो स्वाद याद दिला रहे थे जो के होता है इन देसी टमाटरों में...एकदम खालिस ...देसी खट्टापन लिए.....के गाजर आलू की सब्जी में दो छोटे टमाटर काट पीस के डाल दो ...और सब्जी जायकेदार......अक्सर ये गाजेर वाली सब्जी अपने ही मिजाज के हिसाब से स्वाद या बे स्वाद बनती है.....बनाने वाले का कोई खास महत्त्व नही होता चाहे कितना ही जोर लगा लिया जाए......जैसी इसने बनना होता है....वैसी ही बनती है............पर अगर ये देसी टमाटर इस में पड़ जाए तो...कुछ उम्मीद सी बाँध जाती है ....के उतनी ख़राब तो नही बनेगी....जितनी बन जाती है ...आमतौर पर... खैर............उसकी बा बुलंद आवाज़ से मैं कुछ डिस्टर्ब सा हुआ फोन पर....मैंने उसे कहा......
" अमा यार , क्यूं चिल्ला रहे हो गला फाड़ फाड़ के...थोडा आराम से....धीरे...से.. ओ .के ...."
दोस्त शायद समझ चुका था हमारी बातें...........तो बोला....
"उसकी रोजी-रोटी है मनु....ऐसे क्यूं बोल रहे हो बेचारे को........? "
मैंने कहा के यार ना तो तुमसे बात करने दे रहा है...खामख्वाह चीख रहा है.....तुम तो दूर फोन पर हो...पर मुझे पता है के....जहाँ खडा हो कर ये चिल्ला रहा है..वहाँ न तो कोई गली मुहल्ल्ला है ...ना बस्ती...ना आदमी ..न आदमी जैसा कुछ और...........जिसे इन देसी टमाटरों से कोई लेना-देना हो ....इसलिए टोका है इस को....... 

" और तुम क्या कर रहे हो.............?????" जहाँ पर तुम इतने दिन से अपना गला फाड़ फाड़ कर चीख रहे हो......? वहाँ पर कौन है सुन ने वाला...??कौन सी आदमियों की बस्ती है ...? कौन सा मोहल्ला है....? कौन है जो तुम्हें सुन रहा है....? पर ठीक है ....आदत हो जाती है यूँ चीखने की......जैसी तुम्हें है ...ऐसी ही इसे भी होगी....."

टमाटर वाला मुझे सुनकर चुप लगा गया था... और मैं अपने दोस्त की बात सुन कर खामोश हो गया था........... दोनों ही शायद सोच रहे थे...के हम क्यूं चीख रहे हैं.........और कहाँ चीख रहे हैं................. सन्नाटा और भी सुनसान हो गया था.......वीरानी ..पहले से भी ज़्यादा वीरान हो चली थी....

हां,........ज़रा दूरी से गुजर रही,,,,,कोई हैरान सी ,मायूस सी...कविता जरूर देखे जा रही थी .......हल्का सा हरापन लिए ..लाल-लाल देसी टमाटरों को.......

Monday, January 26, 2009

नज़्म


वक्त बद-वक्त सही
आसमां सख्त सही,
न कोई ठोर-ठिकाना
कहीं ज़माने में,
खुशी की ज़िक्र तक
बाकी नहीं फ़साने में,
कब से पोशीदा लिए बैठा हूँ
इन ज़ख्मों को.....
टूटे दिल को
तेरे मरहम की ज़रूरत भी नहीं.....
अश्क अब सूख चले
आँख के समंदर से.....
अब गिला तुझसे नहीं
दिल से शिकायत भी नहीं.......
वक्त बद-वक्त सही................

वो ढलती शाम का कहना
यहीं रुक जाओ तुम....
जाने कल कौन सा अज़ाब
लिए आए सहर........
कल आफ़ताब उगे
जाने किसका पी के लहू.........
जाने कल
इम्तिहाने-इश्क पे आ जाए दहर.........
आज बस जाओ
इस दिल के गरीबखाने में......
वक्त बद-वक्त सही
आसमां सख्त सही,
न कोई ठोर-ठिकाना कहीं ज़माने में.............

Monday, January 19, 2009

चांदनी के देस


चन्दों से बने घर में बसाने के वास्ते,
इनसान के दिल से तुझे निकाल रहे हैं,

मासूम हैं बहोत तेरे पाले हुए बन्दे
हैं ज़हर नाक वो जो तुझे पाल रहे हैं

ये और ही जहान के मज़हब के लोग हैं
जो तेरे मेरे बीच दरर डाल रहे हैं

वादे वफ़ा से उनका कोई वास्ता नहीं
वादे मगर ज़बां पे बहरहाल रहे हैं

धरती से गिला हमको न अम्बर से शिकायत 
जिस हाल में रहे हों, खुश खयाल रहे हैं

जिनसे गुज़र के पहुंचा हूँ मैं चांदनी के देस 
वो रास्ते अंधेरों से पामाल रहे हैं....||   

Wednesday, December 31, 2008

" मांगने वालियां"

हम दोनों करोल बाग़ मैट्रो स्टेशन से निकले और अजमल खान रोड पर  आ गए | बाहर निकलते ही उसने मैट्रो व्यवस्था पर झींकते हुए सिगरेट सुलगाई "ये भी कोई सफर हुआ ? बस दम सा घोट के बैठे रहो | बेकार है ये मैट्रो ...!! ...एकदम बस.. !!" कहते हुए पहला भरपूर कश खींचकर, फेफेडों का धुँआ मुंह उठाकर ऊपर छोड़ने लगा | एक यही तरीका था उसका किसी भी अच्छे सिस्टम के ख़िलाफ़ अभिव्यक्ति का | इधर जाने कहाँ से मांगने वालियों की एक छोटी सी टोली हमारे सामने आ खड़ी हुई थी | "ऐ बाबू..!!" "कुछ गरीब के बच्चे को भी दे जा बाबू..?" "भूखा है बाबू..." सीने से नंग धडंग बच्चे चिपकाए अलग अलग कातर स्वरों में बच्चे के लिए कुछ भी दे देने की मार्मिक पुकार थी | मैंने अपनी जेब टटोलनी चाही तो उसने कहा "छोड़ न यार ...! तू भी कहाँ चक्कर में पड़ रहा है..?" फ़िर आदतन वो उन मांगने वालियों को दुत्कारने लगा | ये भी शायद इस डेली पैसेंजर से वाकिफ थीं | मेरे साथ उसे देखकर आसानी से एक तरफ़ हो गयीं | 
"तू भी बस खामखा में न धर्मात्मा बनता है"  अगला कश कुछ हल्का खींचते हुए उसने ऐसे ढंग से कहा मानो फेफडों की तलब कुछ कम हो गयी हो | 
"अरे यार ,अगर दो चार रूपये दे देता तो कौन सी आफत आ जाती ?" 
"दो चार की बात नहीं है, बस मुझे भीख देना ही पसंद नहीं है "
"क्यों, इसमें क्या बुराई है..?"
"तो चल तू ही बता के अच्छाई भी क्या है"
उसके धुंए से बचता हुआ मैं जवाब सोच ही रहा था के फेफड़ा खाली होते ही वो बोला "अच्छा चल ये बता के इन मांगने वालियों की कितनी उम्र होगी ?" 
"ये कैसा बेहूदा सवाल है ?" 
"फ़िर भी तू बता तो , चल यूँ ही गैस कर "
"ऐसे क्या गैस करूं....?  ये भी कोई तुक है....? और ये तो ३०-३५ साल की भी हैं और कमती बढती भी हैं ..सबकी एक सी उम्र थोड़े है.?"
"और वो काली कुचेली चद्दर वाली....?"
"हां,उसकी उम्र तो खासी है.....होगी ६०-६५ के लपेटे में "
"इसको मैं पिछले सत्रह सालों से ऐसे ही देख रहा हूँ "
"हाँ, तो इसमें कौन सी बड़ी बात है...? बहुत से लोग होते हैं जिनकी झुर्र्रियाँ पूरी होने के बाद शकल में कोई बदलाव नहीं आता....ये भी कोई बात हुई कोई नयी बात कर"
"इसके कलेजे से चिपका ये बच्चा देखा है "
ये वो ही साल डेढ़ साल का मासूम था जिसके दूध के लिए मैंने पैसे देने चाहे थे और अब सूखे हाडों में से जीवन धारा निचोड़ने की कोशिश कर रहा था अब तक मैं भी अपने इस दोस्त से दुखी हो चुका था "हाँ ,दीख रहा है....!!" खिन्न मन से मैंने जवाब दिया |
"सत्रह सालों से मैं इसे भी ऐसे ही देख रहा हूँ"  कहते हुए उसने सिगरेट ख़त्म कर सड़क पर फेंक दी | 
अब के मेरा मुंह खुला रह गया और सड़क पर पड़ी सिगरेट कलेजे में सुलगने लगी| 

Monday, December 29, 2008

रवानी

|| कौन सी ज़ंजीर पहना दूँ, रवानी को बता,
दरिया हूँ आख़िर, भला मैं कैसे बहना छोड़ दूँ ||

|| बेज़ा ना तोहमत लगा, तर्जे बयानी पर मेरी,
बात कुछ ऐसी नही कहता, के कहना छोड़ दूँ ||

Friday, December 26, 2008

रंग

कल आफिस में लंच करते समय उन्होंने कहा था....
"मनु यार कम से कम हाथ तो धो ले।"
"धुले तो हैं " मैंने कहा पर उँगलियों पर हल्का गुलाबी रंग, और कहीं एक शोख आसमानी रंग नज़र आ रहा था
"तो ये क्या है....?"
"ये तो रंग हैं ,हाथ तो धो चुका हूँ पर ये नहीं छूट रहे.....आप ही बताओ क्या करुँ "
"दुबारा हाथ गीले कर के स्लैब के उलटी तरफ़ खुरदरी जगह पर जोर से रगड़ ले, सब छूट जाएगा "
मैंने उनके कहे पर अमल करना शुरू किया........पर जाने क्यूं इन शोख रंगों को जोर से रगड़ने की हिम्मत हाथों को ना हुई, कुछ देर वो मेरा इंतज़ार देख के बोले " एक मिनट का काम है, बस,, पर तू ही नहीं चाहता...."

""जी शायद मैं ही नहीं चाहता, आप चाहें तो मेरे बिना अकेले लंच कर सकते हैं ......."

Saturday, December 20, 2008

ग़ज़ल

|| छूटा ही ना कुछ साथ , कभी हम से ग़मों का,
होने को तो यूँ दुनिया में उस्ताद बहुत थे ||

|| इतनी तो ना रुसवा थी ,ये तहरीर-ऐ-ज़हालत,
हाँ ,दाना भी थे कुछ, मगर बेदाद बहुत थे ||

|| हम तेरी मसीहाई पे , तोहमत नहीं धरते,
कुछ ज़ख्म थे ऐसे भी, जो नाशाद बहुत थे ||

|| वीरान ही देखीं वहाँ, बंगलों की कतारें,
यूँ छोटे बड़े घर यहाँ , आबाद बहुत थे ||

|| ये फाका मस्तियों का हुनर , तू भी कुछ समझ,
इस इल्म के माहिर , तेरे अजदाद बहुत थे ||

|| चट्टान काट कर भी , ना शीरी को पा सका,
जतनो जुगत लगाये, वाँ फरहाद बहुत थे ||
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बयान-ऐ-मुफलिस
हम ही न समझ पाये ज़माने का तक़ाजा
वरना तो यहाँ जरिया-ऐ-इमदाद बहुत थे

Tuesday, December 16, 2008

 क्या ही बेहतर हो , ये अफ़साने यूँ ही चलते रहें, एक संग कहता रहे , बाकी के सब सुनते रहें..!!

Friday, December 12, 2008


आज किसी ने भगवान् बुद्ध की मूर्ती के दर्शन करा दिए हैं सवेरे सवेरे तो सोचा.......

क्यूं ढूंढता हूँ अंधेरों में रूहे ताबानी ,
दर्द से मैं भी तो घबरा के भाग सकता हूँ..
पर मैं घर बार को ठुकरा के जी नहीं सकता,
मैं भी गौतम हूँ मगर और ही तरह का हूँ...

Monday, December 8, 2008

मैं तर्ज़ की बात कर रहा था ....मैं ख़ुद को अपनी जगह ठीक पा रहा था और मुफलिस साहब के बयान से भी संतुष्ट था....हम लोग कहते हैं न के फलां गीत की तर्ज़ कैसी है ...है ना....? तो मैंने अपनी अकल का इस्तेमाल करने के बजाय बाहर खोज बीन करना ठीक समझा ..........और पाया के तर्ज़ उभयलिंगी शब्द है .......दोनों तरह से इस्तेमाल हो सकता है.......लेकिन कहीं कुछ चूक रह गए थी ...फैशन शब्द ठीक था ...........पर ये शब्द शैली ...पद्धति ....से होता हुआ फैशन बना था........तो थोड़ा दूर हो गया था, मेरे पोस्टिंग वाले फॉण्ट में कुछ गड़बड़ है शायद ....बाकी का हिन्दयुग्म वाले फॉण्ट से लिखता हूँ...........जाइयेगा नहीं....................
.............हाँ अब ठीक है....तो जैसे हमारा बच्चा कभी घर में नहीं नज़र आता तो हम बराबर वाले मकान में पूछ लेते हैं ....वहाँ नहीं तो गली में तलाश लेते हैं ....थोड़ा ज़्यादा बड़ा हुआ तो मुहल्ले में पता कर लिया.....मिल ही जाता है....है न...? सीधे ही दूसरे शहर में नहीं जाते ...अगर वहाँ मिल भी जाए तो साथ में कई संशय जन्म ले लेते हैं...अब के मुझे ठीक समझना ....मेरी प्रार्थना है के अपनी भाषा का कोई अर्थ ढूँढने के लिए पड़ोस की भाषा में जाएँ...क्यूंकि यहाँ तो अपना घर सा है ...आना जाना लगा रहता है ....कभी इस घर का बच्चा उस में तो कभी उस घर का बच्चा इस में .........कैसे भी संशय की कोई गुंजाईश नहीं.......अब हिंद युग्म पर टाईपिंग करने में मज़ा आ रहा है...दूसरे पैर कितनी असुविधा लग रही थी .....क्यों न हो अपना घर सा है...है ना..?अगर आप में से कोई साहब इधर आ जाएँ तो सहमती या असहमति ज़रूर लिखियेगा...बाकी मैं कोशिश करता हूँ आपको बुलाने की...............मनु""घर पे आते ही मेरा साया मुझ से यूँ लिपटा,अलग शहर में था दिन भर अलग अलग सा रहा.""

Friday, December 5, 2008

""कितने रदीफ़-ओ-काफिये, कितने ज़वां हुरूफ़,
कब से हैं मुन्तज़िर, तेरे अहसान-ऐ-ग़ज़ल के..""

Thursday, December 4, 2008

आज डायरी उलटता पलटता तीन साल पहले पहुँच गया

"वक्त के पाबन्द साकी मयकशों से खौफ खा ,

सरफिरा फिरता है तेरे क़त्ल का सामां लिए ।

बिक चुके हों दहन सारे रहन हो ईमाँ जहाँ ,

मुंसिफी को क्या कहें, खस्ता ऐ जिस्मों जान लिए ।।"

कितना ग़लत फैसला सुनाया गया था .................

Wednesday, December 3, 2008

शायरी और कार्टून ....

एक दिल की मजबूरी , दूजा दिमाग का खेल....

कैसे हो ये मेल......

""शौके तीरंदाजी पूरा हो,लहू भी न बहे...

मरहमी कुछ तीर भी मिलते हैं क्या बाज़ार में""

Tuesday, December 2, 2008

""नज़्म जिन की शान में लिखते हैं हम,

हैं कहाँ पढने की उनको फुरसतें..."

Sunday, November 30, 2008

आख़िर शाम को मैंने अपना वोट दे ही दिया.....एक स्याही आज अपनी भी ऊंगलियों को छू गयी............................
मेरे वाला आए ...तेरे वाला आए .......................................................................................................
पर ऐसा कोई ना आए .....जैसे के आते रहे है...................

Saturday, November 29, 2008

आज पूरी रात दिमाग में कैफ़ी आज़मी साहब की नीचे लिखी लाइने घूमती रहीं, और मैं रात भर सोचता रहा के आख़िर मैंने आज तक वोट क्यूं नहीं दिया ......"आज की रात बहोत गर्म हवा चलती है आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी ,मैं उठूँ,तुम भी उठो,ये भी उठे वो भी उठे,कोई खिड़की इसी दीवार पे खुल जायेगी "चलो वोट दे आयें
क्या जोर-ऐ-सितम जाने,
लीडर की है पैदाइश ,
नाजों से पला है इक ,
गुलदस्ते का गुँचा है

Wednesday, November 26, 2008

""ये ज़मीं, चुकने ही वाली है पर मेरे हमदम...कोंपलें और भी फूटेंगी इन ख़लाओं से.....!!""

Monday, November 24, 2008


हमने समझा

सिमट

रही है ज़मीन

फासले

तंग होते

जा रहे हैं

अब ये जाना

बढ़ी है

भीड़ बहुत

जो थोड़े से थे

वो लोग

खोते जा रहे हैं



अब ना

परदा उठा

ऐ शाम-ऐ-हयात

अब ना

मंज़र में

वो सबाहत है

अब ना

नज़रों में

वो उजाले हैं

अश्क हर

नक्श धोते जा रहे हैं

Sunday, November 23, 2008

एम.एफ़.एवं एफ़.एम......!


एम.एफ। और एफ एम। दो ऐसे शब्द जिन से जब तब मुलाकात हो जाती है। एक एम एफ तो बहुतेरे लोगों के गले ही नहीं उतरता यानी अपना एम एफ हुसैन ! और एक एफ.एम.के बगैर बहुतेरों को दुनिया ही सूनी लगती है यानी एफ.एम.रेडियो! अपना मिजाज़ काफी लोगों से अक्सर मेल नहीं खाता। एम.एफ.बेचारे में तो अपने को ऐसी कोई ख़ास कमी नहीं लगती जिस के चलते इतना बवाल होता है। और आप भी सोच कर देखें ...कुछ ज़्यादा ही नहीं हो जाता भले आदमी के साथ..? और अब ज़रा एफ.एम.महोदय की भी सुध लें.... कितने ही लोग हैं जिनकी सुबह एफ.एम.के किसी न किसी चैनल से होती है जो अक्सर देर रात तक तारी रहता है। एफ.एम.गोल्ड की बात छोड़ दें तो ज्यादातर के साथ मेरा तज़ुर्बा कड़वा ही रहा है। हालांकि मैं चाह कर भी एफ.एम.नहीं सुन पाता लेकिन जब कभी भी न चाहते हुए भी सुना है तो मेरी चाहत ने इससे तौबा ही की है। गीत की पसंद की तो बात करना बेमानी होगा क्योंकि वो तो सब मुट्ठी भर लोगों की मर्ज़ी से ही बजते बनते हैं। हाँ !जब मुसलसल सुनते सुनते कान पक जाते हैं और मजबूरन इनके आदी जाते हैं तो मेरे जैसे बाकी बेबस श्रोताओं की तरह मुझे भी इनकी सुपर-डूपेर्टी कबूलनी पड़ती है। ये तो बात हुई संगीत माफिया की या कह लें के पूँजीवाद की जिनका के एक निरीह श्रोता कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इन उदघोषकों से अवश्य ही प्रार्थना करना चाहूँगा के कम से कम आप लोग अर्थपूर्ण गीत न बजाया किजीये। गलती से आ गयी फरमाइश पे भी नहीं!इनका बड़ा अनर्थ होता है।कोई भी गंभीरता से संगीतबद्द किया गीत सुनने के फ़ौरन बाद आर.जे.की बेसिर पैर की उन्मुक्त चटर पटर तमाचे जैसी लगती है। जैसे "बिछडे सभी बारी बारी....!" चल रहा है और आधे अधूरे रफी साहब को एन बीच में घोटकर पूरी मस्ती में चहकना 'ओ.के.फ्रेंड्स !ये साहब तो बिछड़ गए हैं अब आपके साथ है वैरी वैरी होट.......!!!!!!!!! भगवान् के लिए ऐसे ही गीत बजाएं जो आपके माहौल को सूट करें। अच्छे संगीत के मर्म की समझ जो आकाशवाणी के उदघोषकों को थी उसका तो अब एकदम अकाल है। ग़ालिब का शेर याद आ रहा है ....
"अब है इस मामूर में कहते-गम-ऐ-उल्फत असद,
हमने माना के रहे दिल्ली में पर खाएँगे क्या?"