बे-तख़ल्लुस

manu

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Monday, October 25, 2010

एक बे-काफिया ग़ज़ल...

एक ग़ज़ल ... बे-kaafiyaa ग़ज़ल...
करवा चौथ par...


जब से है बज्म में हमराजे सुखनवर मेरा
शे'र क्या रुक्न भी होता है मुक्कमल मेरा

कुफ्र कहते हो जिसे तुम, कभी दीवानापन
कुछ नहीं और, है ये तौर-ऐ-इबादत मेरा

रश्क होता है फरिश्तों को भी आदम से तो फिर
बोल क्यों खटके मुझे रूतबा-ऐ-आदम मेरा

रात जो हर्फ़, तमन्ना में नया लगता है
सुबह मिलता है वोही हर्फ़-ऐ-मुक़र्रर मेरा

और गहराइयां अब बख्श न हसरत मुझको
कितने सागर तो समेटे है ये साग़र मेरा

आह निकली है ओ यूं दाद के बदले उसकी
कुछ तो समझा वो मेरे शे'र से मतलब मेरा

Tuesday, September 21, 2010

एक पुराना शे'र याद आ गया..
मेट्रो में ही हुआ था कभी....




जब कि ज़ाहिर है तेरी हरकत से तेरी कैफियत
क्या जरूरी है बता, फिर फुसफुसाना कान में ...

Tuesday, September 7, 2010

उस नज़र में 'बे-तखल्लुस'



काफी वक़्त से लग रहा था कि कोई ग़ज़ल नहीं हुई है..अभी पिछली फुरसतों में कुछ डायरियां,कागज़ के पुर्जे ,कापी-किताबें वगैरह देखना हुआ ... तो जाने कब कैसे किस बेखुदी में लिखी ये ग़ज़ल..कुछ और शे'र भी बरामद हुए..शायद ४-६ महीने पहले के हैं..
आपकी खिदमत में पेश हैं... 



पहले खुद की फिर ज़माने की नज़र से देखना

कुछ नहीं समझो तो फिर मेरी नज़र से देखना

जान कर अनजान को वैसी नजर से देखना
जी जलाए है तेरा ऐसी नज़र से देखना 

प्यास को काबू में रख, प्यासी नज़र से देखना
तू कभी प्याले को साकी की नज़र से देखना

और खुशफहमी बढ़ा देता है यारब, उनका वो
पढ़ कलाम अपना मुझे उडती नज़र से देखना

सुर्खिये लब जिनकी ठहरी सुर्खियाँ हर शाम की
सुब्हे-दम वो सुर्खी तू पैनी नज़र से देखना

उस नज़र में 'बे-तखल्लुस' खो गया सारा जहां 
मुझ में खोकर वो मुझे खोई नज़र से देखना 

Monday, August 23, 2010

बाल रचना...


अभी परसों की ही बात है..एक फोन आया..
'फूफा जी, आप कहाँ हो..?'
हमने कहा बेटा काम बोलो...पर फिर वही सवाल...'आप हो कहाँ'
हमने दोबारा कहा...बेटा बात क्या है...?
'ख़ास नहीं, पर पहले ये बताओ कि आप कहाँ हो...?'
अब कहना ही पडा कि एक हफ्ते पहले एक्सीडेंट हो गया था, पाँव में फ्रेक्चर हुआ है...सो तब से घर पर ही हूँ,..अब पहले तो काम बोलो..और दूसरा ये सुन लो कि आप लोग हमारी खैर खबर लेने हरगिज नहीं आयेंगे... हम बखूबी जानते हैं कि तुम लोगों का घर से निकलना बेहद मुश्किल है इन दिनों और तुम ये फोर्मलिटी किये बिना मानोगे नहीं...

काफी कह सुन लेने के बाद हमें बताया गया कि फलां विषय पर कविता लिख कर देनी है..वो भी अभी...कुछ ही देर के अन्दर...!! विषय भी ऐसा जिससे कभी कोई वास्ता नहीं पडा...
अब हमारे इकलौते जमाने पर रखे पांव के भी नीचे से रही सही ज़मीं खिसक गयी...
यूं पहले भी हिंद युग्म पर दिए गये चित्र पर एक दो बार लिखा है..पर एक तो वहाँ एक महीने का समय दिया जाता है...ऊपर से कुछ लिखने का मूड ना भी हो तो कोई जबरदस्ती नहीं होती...

खैर...उन दस-बीस मिनट में जो भी लिखा गया..वही आपके सामने रखते हैं...
काफी वक़्त बाद कुछ नया है तो यही है बस....

............

...............

बाल-ह्रदय में पनपे कैसे जीवन का आधार..?
बच्चों को दुश्वार हुआ दादा-दादी का प्यार



बुढ़िया चरखा कैसे काते , कौन कहे अब चाँद की बातें
बच्चे सा ही बच्चा बनकर , कौन है इनका सुख-दुःख बांटे..?
व्यस्त पिता हैं बहुत उन्हें दिखता हरदम व्यौपार...

बच्चों को दुश्वार हुआ दादा-दादी का प्यार...


दादा-दादी भी फुर्सत में, पोता पोती भी फुर्सत में
वृद्धाश्रम में हैं ये तनहा,उधर अकेले हैं वो घर में
'लगे रहो मुन्ना भाई' से कुछ तो सीखो यार

बच्चों को दुश्वार हुआ दादा-दादी का प्यार.....


भौतिकता की ओढ़ के चादर, नैतिकता से मुंह मत मोड़ो
उन्नति की सीढ़ी चढ़ लो ,पर अपने बड़ों का हाथ न छोडो
आखिर वो ही सिखलाते सच्चाई, शिष्टाचार

बच्चों को दुश्वार हुआ दादा-दादी का प्यार.
बाल ह्रदय में पनपे कैसे जीवन का आधार..?

बच्चों को दुश्वार हुआ दादा-दादी का प्यार....


Sunday, August 15, 2010

कसम मेरी जां

ये साकी से मिल, हम भी क्या कर चले
कि प्यास और अपनी बढाकर चले..

खुदाया रहेगी, कि जायेगी जां
कसम मेरी जां की वो खाकर चले

भरम दिल की चोरी का जाता रहा
वो जब आज आँखें चुरा कर चले

चुने जिनकी राहों से कांटे,वो ही
हमें रास्ते से हटाकर चले

तेरे ही रहम पे है शम्मे-उम्मीद
बुझाकर चले या जलाकर चले

रहे-इश्क में संग चले वो मगर
हमें सौ दफा आजमा कर चले

खफा 'बे-तखल्लुस', है उन से तो फिर
जमाने से क्यों मुंह बना कर चले...

Saturday, July 10, 2010

शोला-ऐ-ग़म में जल रहा है कोई
लम्हा-लम्हा पिघल रहा है कोई

शाम यूं तीरगी में ढलती है
जैसे करवट बदल रहा है कोई

उसके वादे हैं जी लुभाने की शय
और झूठे बहल रहा है कोई

ख्वाब में भी गुमां ये होता है
जैसे पलकों पे चल रहा है कोई

दिल की आवारगी के दिन आये
फिर से अरमां मचल रहा है कोई

मुझको क्योंकर हो एतबारे-वफ़ा
मेरी जाने-ग़ज़ल रहा है कोई

Friday, July 2, 2010

दो जुलाई,


आज से ठीक एक साल पहले हिंद-युग्म पर अपनी एक ग़ज़ल आई थी....जिसका मतला था..

शोला-ऐ-ग़म में जल रहा है कोई,
लम्हा लम्हा पिघल रहा है कोई ..

उन दिनों दिमाग कुछ ज्यादा ही हवा में रहने लगा था...ठीक उसी दिन कुछ ऐसा हुआ कि हमने अपनी जॉब ही छोड़ दी ...हालांकि उस वक़्त जॉब छोड़ कर एक सुकून भी मिला ...लेकिन साथ ही मंदी के दौर में नयी जॉब और पेट पालने की फ़िक्र भी हुई..भरी दोपहरी ही उस दिन घर वापस आ गए थे हम...किसी से कुछ कहा नहीं..बस आकर ऊपर वाले रूम में कंप्यूटर ऑन कर के बैठ गए..हिंद-युग्म खोल कर देखा तो अपनी ये ग़ज़ल वहाँ छपी हुई थी..देखकर कुछ ठीक सा महसूस हुआ..
उसी पर नीचे एक कमेन्ट पर नज़र पड़ी...( इसे कहते हैं एक कामयाब ग़ज़ल....)

वाह रे हमारी उस दिन की बेबसी...और ये प्यारा सा कमेन्ट...

उस वक़्त एक शे'र हुआ...जो आगे ग़ज़ल की शक्ल में ना ढल सका...

हर ग़ज़ल कामयाब है उसकी
कितना नाकाम शख्स होगा वो


आज दिल किया ..ये ही अकेला शे'र आपसे साझा करने का...

Monday, June 28, 2010

था ख्याल अपना फक़त वो , प्यार समझे हम जिसे
इक अदा-ऐ-जानां थी , इज़हार समझे हम जिसे

अपनी बीनाई अजब है, शक्ल या इस दह्र की
गुल न था, गौहर था, अब तक खार समझे हम जिसे

तू हमारी तरह मौला, बख्श उनकी भी खता
फिक्रे-दीं उनका था वो, व्यौपार समझे हम जिसे

मुश्किलें वो जीस्त की लाजिम थी सेहत के लिए
जीने का सामां वो ही था, बार समझे हम जिसे

और खुल निकले दहाने, ज़ख्मों के हैरत से, हाय..!
ठहरा वो ही चारागर, बीमार समझे हम जिसे

Wednesday, June 2, 2010

2 june

आज दो जून है...हमारी शादी की साल गिरह..सवेरे ही याद आ गया था..साथ ही याद हो आयी एक बरसों पुरानी रचना.....
एक बे-मतला गजल ...
जब एक दफा बेगम साहिबा अपने बताये गए समय से कुछ ज्यादा ही रुक गयीं थी मायके में... तब हुयी थी ये....
आज इसे ही पढें आप ....

ये अहले दिल की महफ़िल है कभी वीरान नहीं होती
के जिस दम तू नहीं होता तेरा अहसास होता है

तेरे जलवों से रौशन हो रहे शामो-सहर मेरे
तू जलवागर कहीं भी हो तू दिल के पास होता है

चटखते हैं तस्सवुर में तेरी आवाज़ के गुंचे
जुदाई में तेरी कुर्बत का यूं अहसास होता है

निगाहों से नहीं होता जुदा वो सादा पैराहन
हर इक पल हर घड़ी बलखाता दामन पास होता है

विसाले-यार हो ख़्वाबों में चाहे हो हकीकत में
तेरे दीदार का हर एक लम्हा ख़ास होता है.

नहीं इक बावफा तू ही, तेरे इस हमनवा को भी
वफ़ा की फ़िक्र होती है, वफ़ा का पास होता है

Tuesday, May 25, 2010

purani ghazal...


हसरतों की उनके आगे यूँ नुमाईश हो गई
लब न हिल पाये निगाहों से गु्ज़ारिश हो गई

उम्र भर चाहा किए तुझको खुदा से भी सिवा
यूँ नहीं दिल में मेरे तेरी रिहाइश हो गई

अब कहीं जाना बुतों की आशनाई कहर है
जब किसी अहले-वफ़ा की आज़माइश हो गई

घर टपकता है मेरा, अब अब्र वापस जाएगा
हम भरम पाले हुए थे और बारिश हो गई

जब तलक वो ग़ौर फ़रमाते मेरी तहरीर पर
तब तलक मेरे रक़ीबों की सिफ़ारिश हो गई


Saturday, April 10, 2010

लॉन्ग-ड्राइव

हमने कहा...''आज आठ अप्रैल है....''
''तो.....??''

''तो..!!!!!!!!!!!!!
...अरे कुछ नहीं...बस बता रहे हैं...कि आज आठ..."
उसकी मुस्काती आँखों में और भी मुस्कराहट भर गयी...और पास खड़ी पारुल को आँखों में और भी सस्पेंस...नन्ही पारुल ने पहले हमें देखा ..फिर एकदम उसी नज़र से उसे....और उसने झुक कर उसके कान में, शायद हमें सुनाकर कहा...''आज के दिन तेरे मामा की सगाई हुई थी..''
''हाँ, हमारी अकेले की सगाई हुई थी आज...तुम्हारी थोड़े ही हुई थी.....!"
''हाँ जी, हमने भी तो पारुल से यही कहा है के आज तेरे मामा की सगाई हुई थी...''

राम जाने...कब सुधेरेंगे हम....या कब सुधरेगी वो...

अब पारुल कि आँखों में शरारत देखते ही हमें होश आया....और हमने कुछ और ज़्यादा जल्दी दिखाते हुए श्रीमती जी से कहा..
''थोड़ा जल्दी कर लो....हम पहले ही लेट हैं..''
हमारे इतना कहते ही उसने और जल्दी दिखाई और जाने कितना उतावलापन मुस्काती आँखों में समेटे साथ चलने के लिए बाईक के साथ में आ खड़ी हुई....

''अरे रुको...ऐसे मत बैठो...वैसे बैठो..जेंट्स कि तरह ...! दोनों पाँव एक तरफ किये तो हम से बैलेंस ठीक से नहीं बनता...खामख्वाह कहीं तुम्हें गिरा गिरू देंगे...''
उसने धीरे से कान में कहा...'' यहाँ तो हम ऐसे ही बैठेंगे...चाहे आप गिरायें चाहे जो करें...आखिर अपना मुहल्ला है , कोई क्या कहेगा...?
हाँ, बाहर निकलकर जैसे कहेंगे वैसे बैठ जायेंगे....''

''अरे, तो क्या मुहल्ला ये भी बतलाता है कि बाईक पर किसे, कैसे बैठना है...? और कहीं चोट फेट लग गयी तो क्या मुहल्ला....???? "

'' फ़ालतू कि बात मत करो...कहा ना...बाहर निकलकर वैसे बैठ जाऊंगी...!!! "

अपनी बीस साल की मैरिड लाइफ , और कुल जमा तीन महीने की ''ड्राईविंग-लाइफ'' में परसों पहला मौक़ा था इस तरह से साथ साथ जाने का..
इस में भी मुहल्ला बीच में आन टपका....

खैर ,
बाहर मेन रोड पर निकलकर श्रीमती जी हमारी मनचाही मुद्रा में बैठने को राजी हुईं... और उन्हें मनचाहे पोज में आते ही हमने बाईक के लेफ्ट वाले शीशे का डायरेक्शन ट्रैफिक की तरफ से हटाकर अपुन दोनों के मुखमंडल की तरफ घुमा दिया.....अभी नैन-मटक्का शुरू ही हुआ था कि बायें से ब्लू-लाईन बस का तेज..अंतिम वार्निंग वाला होर्न सुनाई दिया.और हमें एक आदिकालीन...रीतिकालीन कवि की ....ना जी..उस समय तो समकालीन ही था , वो मशहूर लाईने याद आ गयीं...

पानी करा बुलबुला, अस माणूस की जात..
देखत ही छिप जाएगा, ज्यूँ तारा परभात..

............................और..............

और हमने वापिस बाईक के शीशे का मुंह उसकी पुरानी पोजीशन पर कर घुमा दिया....अब शीशे में चंद्रमुखी के स्थान पर वही उबाऊ ट्रैफिक नज़र आ रहा था ....

हटाने से पहले हम उसकी तरफ देख कर बुदबुदाए थे....'' बाकी सब बाद में..सबसे पहले सेफ्टी है..."

अभी भी उस चेहरे पर दमकती खुशियाँ हमारी आँखों में बंद थीं.....एक बेहद मामूली गड्ढे को देखकर हमने जोर से ब्रेक लगाए...एक छोटी सी चीख सुनाई दी कानों में...अगर ये ब्रेक नहीं लगता तो ये चीख काफी ऊँची हो सकती थी..
ज़िन्दगी के हर ऊँचे नीचे रास्ते में उसने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया है हमारा...हर हाल में..हर घडी में..हर भले बुरे वक़्त में सहारा दिया है...ये बात और के अब दिल्ली के उबड़ खाबड़ रास्तों पर चलते वक़्त उसकी हालत खराब हो जाती है....अपने दायें काँधे पर नर्म हाथ का हल्का सा दबाव महसूस हुआ ,
हम जानते हैं कि ये दबाव उसका शुक्रिया है.. उस छोटे से गड्ढे का ध्यान रखने के लिए...उसे जोर से लगने वाले हिचकोले से बचाने के लिए..
आज वो बहुत खुश है...उसे कोई परवाह नहीं के अस्पताल में किस टेस्ट की क्या रिपोर्ट आयेगी...कौन सी नई बीमारी की पोल खुलेगी....क्या होगा...उसे कोई मतलब नहीं....

कान में धीरे से फुसफुसाहट हुई....''आज हम पहली बार लॉन्ग-ड्राइव पर जा रहे हैं...''
''हाँ,..पर ...क्या अस्पताल जाना भी तुम्हारे लिए लॉन्ग-ड्राइव की मस्ती है..?''


काँधे पर फिर एक हल्का सा दबाव पड़ता है ..और हम फिर शीशे का डायरेक्शन ट्रैफिक से हटा कर हम दोनों के चेहरों कि तरफ कर देते हैं.....

पानी केरा बुलबुला.....!!

नहीं....!!!
पास से एक थ्री-व्हीलर गुजरा है लता की आवाज़ में डूबा...

कह दो बहारों से आयें इधर...
उन तक उठ कर हम नहीं जाने वाले....

Sunday, March 21, 2010

मौत.....संशोधित पोस्ट...



उस दिन अपने इधर मोहल्ले में एक मौत हुईं थी.....
ऑफिस की बात नहीं है जी...मोहल्ले की बात है...
ऑफिस में तो आम बात है होना...
शमशान में जो ठहरा...

ऑफिस ही जा रहे थे तब हम..जब फोन आया घर से...


हमारे मुंह से निकला....चलो ठीक हुआ....
उमा हम पे ज़रा बरस सी पड़ी....
क्या ठीक हुआ...?
ऐसे में ऐसा नहीं कहते.....
आपको एकदम समझ नहीं है...कुछ भी कहने की.....जो दिल में आया कह देते हो...

सब कुछ भूल कर उसे समझाना चाहा..के तुम से ही तो कहा है...
किसी गैर से तो नहीं कहा...और तुम्हें तो मालूम है के हम कैसे हैं....
हमने हजार दलीलें दीं..
कल तक तो हर आदमी कहता था के बुढ़िया ने पूरी तरह से जीना हराम कर रखा है....हर कोई...तुम भी.....उसके सब दूर पास के रिश्तेदार...
नाती .पोते..नवासे....ये.. वो.. हम.. तुम ...एक भी बता दो कि फलां शख्स उसके जीने से रत्ती भर भी खुश था...

''नहीं जी, आप समझो, ऐसा नहीं कहना चाहिए आपको.....अब वो नहीं रही..."

अरे यार...वो पहले ही कब थी किसी के लिए .....वो बात और के मोहल्ले का हर छोटा बड़ा उसे नानी कहता था....
अब क्यूंकि नानी का क्रिया - कर्म हो चुका था ..अब बारी थी वहाँ , उसके घर पर जाने की..
हमेशा कि तरह हमारा मन नहीं था जाने का....इसलिए नहीं के कोई खुंदक थी..

बल्कि हमारा मानना है कि अगर कोई मरता है..और हम उसी वक़्त वहाँ जा सकें ....... तो बेहतर है..
अगर नहीं जा सकते तो जिस दिन तेरहवीं जैसा कुछ होता है तब जाया जाए...
पर उसके बीच तेरह दिन में हम जाना जरूरी नहीं समझते....जब तक कि हमें ये यकीन ना हो कि हमारे जाने से , जाने वाले के घर वालों को किसी तरह कि शान्ति मिलगी..कोई सुकून हासिल होगा..कोई मदद हो सकेगी हमारे जाने से...

तब तक हम नहीं जाना चाहते....

माँ के ख्याल , माँ की बातें आज भी वैसी ही हैं..इस बाबत...और हमारी मैडम का भी यही कहना है......
''आप किसी के ऐसे वक़्त में नहीं जायेंगे तो आपके में कौन आयेगा....?''
चाहे हम जितना भी समझा लें..के किसी के यहाँ सिर्फ और सिर्फ फोरमेलिटी पूरी करने के लिए जाना..असल में उसे कष्ट देना ही होता है..जब कि हम जानते हैं कि हमारे आने से उसकी तकलीफ कम होने कि बजाय बढेंगी ही...सब ही जानते हैं...


वो जिस हाल में भी होगा..उठकर हमें पानी देगा..
फिर चाय बनाना चाहेगा...ना चाह कर भी....हम कुछ हाथ बंटाना चाहें भी तो वो हमें नहीं बंटाने देगा....
जिसे ठीक से जानते भी नहीं.....मुंह देखे कि दुआ सलाम ही बची हो ..उसका हम क्या दुःख दूर कर देंगे उसके घर जाकर....??

पहले बस माँ कहती थी..अब उमा भी कहती है..
''आप किसी के ऐसे वक़्त में नहीं जायेंगे तो आपके में कौन आयेगा....?''


सटीक जवाब पहले भी नहीं थे हमारे पास..आज भी नहीं हैं.....
आज बस यही सोच रहे हैं...

गोया मौत ना हुई...
ब्लोगिंग हो गयी.....

Monday, March 15, 2010

एक पोस्ट अभी डाली.

एक पोस्ट अभी डाली..
अभी ही डिलीट भी कर डाली...

एक शे'र याद आ रहा है...मीना कुमारी का....


पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
रात खैरात की, सजदे कि सहर होती है...

Monday, March 8, 2010

रंग


कल आफिस में लंच करते समय उन्होंने कहा था.........

"मनु यार कम से कम हाथ तो धो ले।"

"धुले तो हैं " मैंने कहा पर उँगलियों पर हल्का गुलाबी रंग, और कहीं एक शोख आसमानी रंग नज़र आ रहा था

"तो ये क्या है....?"

"ये तो रंग हैं ,हाथ तो धो चुका हूँ पर ये नहीं छूट रहे.....आप ही बताओ क्या करुँ "

"दुबारा हाथ गीले कर के स्लैब के उलटी तरफ़ खुरदरी जगह पर जोर से रगड़ ले, सब छूट जाएगा "

मैंने उनके कहे पर अमल करना शुरू किया........पर जाने क्यूं इन शोख रंगों को जोर से रगड़ने की हिम्मत हाथों को ना हुई,
कुछ देर वो मेरा इंतज़ार देख के बोले " एक मिनट का काम है, बस,, पर तू ही नहीं चाहता...."

""जी शायद मैं ही नहीं चाहता,
आप चाहें तो मेरे बिना अकेले लंच कर सकते हैं ......."

Saturday, March 6, 2010

कुछ ख़ास नहीं है कहने को...

क्या कहें...?
कुछ ख़ास नहीं है कहने को...!
होली पर जाने क्या हुआ...पर..अभी तक होली बीती नहीं है....ऐसा कुछ ख़ास अलग खाया पीया भी नहीं था जो......

पर अब के ....बस....होली जैसी ही होली हो गयी.....

फैज़ साहिब कि सुने तो..
यूं तो कब से नहीं सुन सके हैं फैज को...

न गुल खिले हैं न उनसे मिले न मय पी है...
अजीब रंग में अब के बहार गुजरी है...

हमें छोडिये...फैज़ साहिब की बात सुनिए..

Sunday, February 28, 2010

ताज़ा ग़ज़ल

पिछली कुछ रातों को जाने क्या क्या ख्याल आये दिल में......
बस हम फर्क ढूंढते रहे
कभी चित्रकार और कलाकार में..
कभी गायक और गवैये में...
कभी ग़ज़लकार और शायर में....
तो कभी..
ब्लोगर्स में और खुद अपने में...
थोड़ा/ज़्यादा फर्क महसूस तो हुआ...
खैर.....
अपना क्या है,
हम तो ऐसे ही सोचते सोचते एक दिन निकल लेंगे...


आप ये ताज़ा ग़ज़ल देखिये..


आदमी ग़लतियों का पुतला है
तू, जो हरदम सही है, तू क्या है

मेरे बारे में लोग जो भी कहें
मेरे बारे में तू क्या कहता है

होश की बात ही नशे में भी
ये भी पीने का कुछ तरीका है

वक़्त जाएगा किस हिसाब में, जो
हमने इक दूसरे पे खरचा है

ईन्चना है तेरा तबस्सुम फिर
मेरे जाने से कैसा कुम्हला है




Wednesday, February 10, 2010

एक और पुरानी ग़ज़ल...






जो लोग कहते हैं, वो लगावट, हो अपने भी दरमियां तो कुछ हो
इस उडती-उडती खबर से हमपे, जो तू भी हो बदगुमां तो कुछ हो

ये ग़म हमारा तेरी जुबां से न हो सके गर बयां तो कुछ हो
हो खोयी-खोयी नज़र से तेरी, जो हाल अपना अयां तो कुछ हो

करें तगाफुल पे जत्न ऐसे, तो वस्ल में क्या न वो करेंगे
मेरी तरह जो ये खुश खयाली तुझे भी हो मेरी जां तो कुछ हो

है साकी का ग़ैर से भी वादा,हमें तलब आज कुछ ज्यादा
मेरी जुनूं-खेज तिशनगी का, हो और भी इम्तेहां तो कुछ हो

क्यूं इश्क से तो यूं बे-असर है, कि हव्वा जैसी ही बे-खबर है
वो खुल्द का फल, किसी तरह गर चखे जो तेरी जुबां तो कुछ हो

शिकन का खंजर, तेरी जबीं से जिगर में मेरे उतर गया है
ये नर्म खंज़र जो खुदकुशी की कहे अगर दास्ताँ तो कुछ हो

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,

रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है
हो मेल दोनों का 'बे-तखल्लुस', बंधे नया इक समां तो कुछ हो

Friday, January 15, 2010

जाने कौन था..



जाने कौन था...

आज ऑफिस में आया तो सुबह ११ बजे के करीब देखा..के बाजू में जो शमशान घाट है..वहाँ पर एक अर्थी आई है..महज ६ लोग हैं लाने वाले..
चार कंधे पे उठाये हैं..और एक दो..राम नाम सत्य हैं कह रहे हैं...
बुझी बुझी सी आवाजों में....
इतनी बुझी ..मानो राम नाम के ही सत्य होने में सबसे बड़ा संदेह हो...

खैर...

करीब तीन-चार घंटे के बाद दो आदमी मेरे पास आये...बोले.." बाबूजी, ये जो लकडियाँ आपके ऑफिस में पड़ी हैं पैकिंग वाली...इनमें से कुछ हमें दे दोगे...?"

बकवास सा सवाल लगा पहले तो मुझे ..और मैंने जवाब भी बकवास सा ही दिया....

लेकिन इस सारी बकवास के बाद मालूम हुआ के जो लाश सुबह आई थी, वो अभी तक नहीं जल सकी है..गीली लकड़ियों के कारण...
बड़ी हैरानी हुयी मुझे...
अरे.....!!!
आप लोग सुबह वाले ही हैं...?
अभी तक इधर ही हैं. ...!!

ले जाइए जितनी लकडियाँ भी चाहियें....ये तो ...आपने पहले ही बोलना था.....

और वो दोनों वूडन क्रेट वाली सूखी लकडियाँ लेकर शुक्रिया अदा करते हुए चले गए...

उनके जाने के कुछ देर बाद ही लगने लगा के जैसे मुझे भी वहाँ पर जाना चाहिए..
हाँ ..ना..हाँ..ना....

सोचते सोचते बस...उधर को चल ही पडा.....
ये लोग फिर से अर्थी को आग देने की नाकाम कोशिश कर रहे थे....
पता लगा के ५ लीटर पेट्रोल भी डाल चुके हैं इस काम के लिए....
जाने क्या हुआ.....मैंने एक सूखी जलती हुई लकड़ी हाथ में ली...और बढ़ा दी चिता की तरफ....

चिता ने भी उसी वक़्त आग पकड़ ली....मेरे साथ साथ वो लोग भी हैरान थे...
एक दो आवाज आयीं..''भाई साहब, शायद आपकी ही इन्तजार थी इन्हें..."


लकडियाँ वाकई में गीली थीं....

मैंने जेब से १०० रूपये निकाले और अपने एक आदमी से कहा के भागकर इसकी चीनी ले आ....

चीनी आई और मैंने पूरी चिता पर बिखेर दी...

चिता अब और ठीक से जलने लगी थी...
सब कुछ ठीक ठाक जानकर मैं वापिस आफिस में आया और अपने काम में लग गया...

करीब दो -तीन घंटे के बाद . ...एक आदमी ऑफिस में आया..और बोला...

बाबूजी,
थोड़ा सा पानी भी मिलेगा......?

मैंने कहा के हाँ, किसलिए चाहिए....???

तो उसने बताया के चिता पूरी जल चुकी है.....अब चलते वक़्त उस पर छींटा देना है...
मैंने पानी की बाल्टी का इंतज़ाम किया...दिवार पर टंगे छोटे से मंदिर से उठवाकर उस में गंगाजल भी मिलाया....
जब वो उठा कर चलने लगा
तो मैंने दोबारा पूछ लिया...क्या सचमुच चिता पूरी तरह से जल चुकी है.....???

जवाब आया.....
'' हाँ, बाबूजी, शायद इसे आपके हाथ से ही जलना था...अब तो पूरा जल चुका है....."

मैंने कहा....''चलो जी...शुक्र भगवान् का....हो गया ना....?''
जवाब में उसने हाथ जोड़ लिए..


यकीन कीजिएगा.......

उस के बाल्टी उठा कर चलने के बाद..जाने मुझे क्यूँ लगा...के लाश का बाँया पाँव अभी भी कच्चा है...
माना के मैंने सारी हालत की जानकारी ले ली थी....ये भी पता था के वहाँ पर एक दो ऐसे भी हैं जो कहते हैं के हमें क्रिया कर्म के बारे में सब पता है...
और इस ने भी तो धन्यवाद सहित कह दिया था .....
के चिता जल चुकी है पूरी तरह से...


लेकिन जाने क्या था....
के मैंने अपना काम फ़ौरन बंद किया...और जल्दी जल्दी चलकर उसके पीछे पीछे वहीँ जा पहुंचा....


मेरा ख़याल सही था....

बांये पाँव तक आग पहुंची ही नहीं थी.....

उन लोगों के छींटा देने से पहले ही मैं बोल पडा...की अभी रुको....
अभी नहीं जला है पूरा जिस्म.....!

फिर उन्होंने चेक किया....बांयें पाँव को आग की लपटों छू भी नहीं पायीं थीं....

मैं खामोश खडा देख रहा था...जाने क्या सोच रहा था....
शायद भगवान् से मांग रहा था मैं...के ये ना हो..कल सुबह इस बांये पाँव को इधर रहने वाले कुत्ते मुंह में दबाये घुमते नजर आयें....

वो सब लोग तब तक कई तरकीबें आजमा चुके थे...
पर सब नाकाम ही रहीं.....
अब सब लोग मुझे देखने लगे....मुझे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था के क्या करना चाहिए ऐसे में...???


मेरा पूरा ध्यान उसी में लगा हुआ था...
कभी भी वास्ता नहीं पडा था ऐसी स्थति से....जाने कितना सोचने के बाद....
मैंने चिता की तरफ बढ़कर एक लकड़ी उठायी...और उसका डायरेक्शन चेंज कर दिया.....एक दूसरी लकड़ी को उठाकर अलग तरह से रखा....
अब आग बांये पाँव की तरफ भी आने लगी...अब बाँया पाँव मेरी आंखों के सामने खुले में जल रहा था...मैंने जिंदगी में पहली बार ऐसा देखा ....

उसके बाद तो जैसे भुट्टे को आग पे भूनते हैं.....

जैसा के लोगों का मानना है....शमशान में जाकर कभी भी अलग से कोई वैराग का भाव मन में नहीं आता हमारे...जितना वैराग मन में है..उतना सदा ही है...
अभी भी उलझा हुआ हूँ कल वाली बात में...
वो आवाज अब भी कान में है....
'' भाई साहेब...शायद आपकी ही इंतज़ार थी इन्हें....."