बे-तख़ल्लुस

manu

manu

Monday, April 27, 2009

ghazal,,,,,

 
बेखुदी, और इंतज़ार नहीं,
छोड़ आई नज़र क़रार कहीं
 
तेरी रहमत है, बेपनाह मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं
 
निभे अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं
 
सख्त दो-इक, मुकाम और गुजरें,
फ़िर तो मुश्किल, ये रह्गुजार नहीं
 
काश! पहले से ये गुमाँ होता,
यूँ खिजाँ आती है, बहार नहीं
 
अपने टोटे-नफे के राग न गा,
उनकी महफिल, तेरा बाज़ार नहीं
 
जांनिसारी, कहो करें कैसे,
जां कहीं, और जांनिसार कहीं
 

25 comments:

Rajat Narula said...

nice galzal...

दिगम्बर नासवा said...

मनू जी........जीवन का दर्शन भरा है इस ग़ज़ल में.

तेरी रहमत है, बेपनाह मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं

जीवन मरण तो ऊपर वाले के हाथ में है...........तो फिर कोई भी करार कैसे हो ...........लाजवाब

निभे अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं

"अर्श" said...

shaam ko milta hun aaraaam se tippni ke liye....badhiya gazal kahi hai aapne...


arsh

"अर्श" said...

मैं खुद भी एहतियातन उस तरफ से कम गुजरता हूँ .. मेरे लिए कोई मासूम क्यूँ बदनाम हो जाए....

आपकी ग़ज़लों के बारे में क्या कहूँ मनु भाई साहिब...
और ऊपर से ये शे'र उफ्फ्फ कहर बरपा रहा है ...

जांनिसारी कहो करें कैसे
जां कहीं और जांनिसार कहीं ...

आपका
अर्श

Mumukshh Ki Rachanain said...

तेरी रहमत है, बेपनाह मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं

निभे अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं

लाजवाब ग़ज़ल, के लाजवाब शेर.

बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

अल्पना वर्मा said...

फ़िर तो मुश्किल, ये रह्गुजार नहीं
काश! पहले से ये गुमाँ होता,
bahut khuub!

gazal ek alag andaaz liye hue hai..
sabhi sher khuuub likhey hain.badhaaayee!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

निभे अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं

soofi andaaz ki gazal.. manu bhai..laazavaab he...pichhli gazlo se jo aapki chhavi bani thi usase bilkul ulat he ye gazal..aour yah saabit karti he aapki vichar shakti, lekhan ki vividhtaa aour jivan jeene kaa andaaz.
waah kyaa baat he,,,,//////

MUFLIS said...
This comment has been removed by the author.
MUFLIS said...

हुज़ूर !!!!!

तेरी रहमत है बेपना(ह) मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं

एक दम मुफक्केराना ख्याल .....
उम्दा और मेआरी...
लेकिन ये बताईये कि रदीफ़ तो "नहीं" है, तो दुसरे aur aakhiri मिसरे में "कहीं" ....??

huzoooooorrrr.....

ग़ज़ल में khyaal ki परवाज़ बहुत बहुत बहुत अच्छी है
नजरिया और सोच शानदार है

---मुफलिस---

दर्पण साह "दर्शन" said...

अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं

wah ye line to jaan leva hai...

..darshanshashta ka nichor dikht hai ismein...
..baaki sher ke baare main nahi likhoonga waise sabhi acche hain hamesha ki tarah...

sandhyagupta said...

सख्त दो-इक, मुकाम और गुजरें,
फ़िर तो मुश्किल, ये रह्गुजार नहीं
काश! पहले से ये गुमाँ होता,
यूँ खिजाँ आती है, बहार नहीं

Bahut achche.

Harkirat Haqeer said...

मनु जी ये खजाना इतने दिनों से किधर छुपा रखा था....???
सारे शे'र एक से बढ़कर एक हैं ...किसकी तारीफ करूँ और किसे छोडूं ....???

तेरी रहमत है बेपनाह मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं

वाह....मनु जी कमाल का शे'र........बहुत खूब......!!

काश ! पहले से गुमाँ होता
यूँ खिजां आती है, बहार नहीं..

बल्ले ...बल्ले........!!

जांनिसारी कहो करें कैसे
जां कहीं और जांनिसार कहीं ...

सुभानाल्लाह ....!!

Babli said...

मनु जी बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल पेश किया है आपने बिल्कुल दिल को छू लेने वाली!

Babli said...

बहुत बहुत शुक्रिया आपने मुझे आगाज़ शब्द के बारे में बताया!
धन्यवाद मनु जी आपको मेरी शायरी पसंद आई और आपने बिल्कुल सही फ़रमाया मैंने आयल पेंटिंग बनाई है !

Dr. Smt. ajit gupta said...

पहली बार ही आपके ब्‍लाग पर आयी हूँ, अब मुझे अच्‍छी गजलें पढ़ने का अवसर मिलेगा। बधाई।

Nirmla Kapila said...

मनु जी अगर किसी एक शे अर के बारे मे कहूंगी तो पूरी गज़ल से अन्याय होगा एक एक शब्द को आपने जिस करीने से पिरोया है वि काबिले तारीफ है शुभकामनायें

amarjeet kaunke said...

manu ji, aap bahut vadhia likhde ho.....amarjeet kaunke

Vijay Kumar Sappatti said...

manu bhai

deri se aane ke liye maafi chahunga .. ab main kis ki tareef karun aur kis ti nahi .... teen baar padh chuka hoon , man nahi bhar raha hai .. sufism ka bharpoor undertone hai .. bhaiyya , main to bus aapki lekhni ko salaam karta hoon ... thoda ye gazal ka hunar humko bhi sikha do yaar... [ Muflish ji sun rahe hai kya ? ]

very good work of words , yaar jiyo...

aapka
vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

M.A.Sharma "सेहर" said...

जांनिसारी, कहो करें कैसे,
जां कहीं, और जांनिसार कहीं

मनु जी

आपके पास शेर का बहुत बड़ा खजाना है लगता है...:))
उम्दा ग़ज़ल !!!!


'

manu said...

गौतम राजरिशी ने कहा…
निःशब्द...
इस मौन को जो आप पढ़ सको दरपण...!
अपने-आप को कोसे जा रहा हूँ कि अब तक इतने लोगों ने इस नज़्म-हीरे को परख लिया था, तो इसकी चमक मुझसे कैसे अब तलक छुपी हुई थी।
आपसे अनुमति लिये बगैर इसको कापी-पेस्ट कर लिया है...कल सुबह इसका प्रिंट यहाँ से रवाना होगा देहरादून संजीता के लिये-मेरी सहचरी।
अनुमति है ना?
इस एक नज़म पर अब तक मेरा लिखा कुछ भी अगर थोड़ा भी तारीफ़ के काबिल है सब आप पर कुरबान...
28 April, 2009 00:08
गौतम राजरिशी ने कहा…
कापी-पेस्ट का प्रयास विफल रहा। टाइप करता हूँ देखकर...
you are superb....hats-off
28 April, 2009 00:12

MEJAR SAAHEB,,,,,,,

AAP JAANE HAMAARI IS BE RADEEF SI GHAZAL PE COMEINT DEIN YAA NAA DEIN,,,,,,,,

SO HAMNE PAHLE HI AAPKAA COMMEINT UDAA LIYAA HAI,,,,
INTEZAAR DEKH KAR,,,,,,,,,,,

AB KARTE RAHIYE,,,,
THAK,,THAK,,THAK,,,THAKK,,,

RC said...

Beutiful! Superb! All of them!

God bles
RC

गौतम राजरिशी said...

हा हा हा....
इन इक्कीस टिप्पणियों के बोझ तले दबा हुआ मनु जी,...मतले को नजरअंदाज करते हुये {मुफ़लिस जी के सवाल पे गौर फरमाइयेगा} इसे पहले ही पढ़ लिया था मैंने। पूछिये कहाँ? कहीं और भी छपी है ना?
"निभे अस्सी बरस कि चार घड़ी..." का ऐलान करने वाला ये अद्‍भुत शायर अपनी बेतखल्लुसी में क्या कुछ कह जाता है कि हम तो अवाक रह जाते हैं...
कुछ खबर भी है साब कि क्या शेर गढ़ा है आपने?

और "उनकी महफ़िल तेरा बाज़ार नहीं..." हाय रेssssss !
हुजूssssssssss र!!!

जां कहीं, जानिसार कहीं...कह कर आप कई लेवल ऊपर चले गये हो सरकार। you are in a different league ....
हम तो वाकई खुशनसीब हैं कि आपके चेहतों की फ़ेहरिश्त में शामिल हैं, वर्ना इस शेर को कहने वाले के आगे मुझ अदने की बिसात क्या?

और देख लीजिये, रूपम जी की टिप्पणी और किसी ब्लौग पर शायद ही दिखे आपको। वो भी तारिफ़ कर रही हैं....

शोभना चौरे said...

यूँ खिजाँ आती है, बहार नहीं अपने टोटे-नफे के राग न गा,
उनकी महफिल, तेरा बाज़ार नहीं जांनिसारी, कहो करें कैसे,
जां कहीं, और जांनिसार कहीं
bhut khoob
badhai
shobhana

रश्मि प्रभा... said...

waah,bahut sundar

RC said...

I completely agree with Gautam ji.

निभे अस्सी बरस कि चार घड़ी...

You are in a different league undoubtedly.

God bless
RC