बे-तख़ल्लुस

manu

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Sunday, November 23, 2008

एम.एफ़.एवं एफ़.एम......!


एम.एफ। और एफ एम। दो ऐसे शब्द जिन से जब तब मुलाकात हो जाती है। एक एम एफ तो बहुतेरे लोगों के गले ही नहीं उतरता यानी अपना एम एफ हुसैन ! और एक एफ.एम.के बगैर बहुतेरों को दुनिया ही सूनी लगती है यानी एफ.एम.रेडियो! अपना मिजाज़ काफी लोगों से अक्सर मेल नहीं खाता। एम.एफ.बेचारे में तो अपने को ऐसी कोई ख़ास कमी नहीं लगती जिस के चलते इतना बवाल होता है। और आप भी सोच कर देखें ...कुछ ज़्यादा ही नहीं हो जाता भले आदमी के साथ..? और अब ज़रा एफ.एम.महोदय की भी सुध लें.... कितने ही लोग हैं जिनकी सुबह एफ.एम.के किसी न किसी चैनल से होती है जो अक्सर देर रात तक तारी रहता है। एफ.एम.गोल्ड की बात छोड़ दें तो ज्यादातर के साथ मेरा तज़ुर्बा कड़वा ही रहा है। हालांकि मैं चाह कर भी एफ.एम.नहीं सुन पाता लेकिन जब कभी भी न चाहते हुए भी सुना है तो मेरी चाहत ने इससे तौबा ही की है। गीत की पसंद की तो बात करना बेमानी होगा क्योंकि वो तो सब मुट्ठी भर लोगों की मर्ज़ी से ही बजते बनते हैं। हाँ !जब मुसलसल सुनते सुनते कान पक जाते हैं और मजबूरन इनके आदी जाते हैं तो मेरे जैसे बाकी बेबस श्रोताओं की तरह मुझे भी इनकी सुपर-डूपेर्टी कबूलनी पड़ती है। ये तो बात हुई संगीत माफिया की या कह लें के पूँजीवाद की जिनका के एक निरीह श्रोता कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इन उदघोषकों से अवश्य ही प्रार्थना करना चाहूँगा के कम से कम आप लोग अर्थपूर्ण गीत न बजाया किजीये। गलती से आ गयी फरमाइश पे भी नहीं!इनका बड़ा अनर्थ होता है।कोई भी गंभीरता से संगीतबद्द किया गीत सुनने के फ़ौरन बाद आर.जे.की बेसिर पैर की उन्मुक्त चटर पटर तमाचे जैसी लगती है। जैसे "बिछडे सभी बारी बारी....!" चल रहा है और आधे अधूरे रफी साहब को एन बीच में घोटकर पूरी मस्ती में चहकना 'ओ.के.फ्रेंड्स !ये साहब तो बिछड़ गए हैं अब आपके साथ है वैरी वैरी होट.......!!!!!!!!! भगवान् के लिए ऐसे ही गीत बजाएं जो आपके माहौल को सूट करें। अच्छे संगीत के मर्म की समझ जो आकाशवाणी के उदघोषकों को थी उसका तो अब एकदम अकाल है। ग़ालिब का शेर याद आ रहा है ....
"अब है इस मामूर में कहते-गम-ऐ-उल्फत असद,
हमने माना के रहे दिल्ली में पर खाएँगे क्या?"

3 comments:

Babli said...

बहुत बहुत शुक्रिया आपको मेरी शायरी पसंद आई ! पर ये पेंटिंग मैंने नहीं बनाई है !
आप ने बहुत ही सुंदर लिखा है खासकर आपकी बनाई हुई पेंटिंग तो लाजवाब है ! क्या खूब पेंटिंग करते हैं आप और कुछ नया पेंटिंग पोस्ट कीजिये।

'अदा' said...

hnm
अरे मनु साहब,
आप तो नाराज़ हुए बैठे है एम् एफ से भी और एफ एम् से भी, पहले एम् एफ की बात अगर एम्. एफ जनाब न होते तो माधुरी और उर्मिला के दीवानों की फेहरिस्त थोड़ी छोटी न हो जाती और रही एफ. एम्. की तो इतने सालों शार्ट वेव और मीडियम वेव ने जी भर कर राज किया है, थोडा इन्हें भी जीने दे...
मैं खुद एफ एम् रेडियो में उद्घोषक रह चुकी हूँ ऐसा नहीं है पुराने मधुर गाने वहां भी बजते हैं और सलीके से बजता हैं बस आप समय का पता करे और कार्क्रम का आपके मन-पसंद नगमे आपको ज़रूर गुदगुदाते हुए मिलेंगे....

sonuu said...

ye hi post hai ooper bhi