बे-तख़ल्लुस

manu

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Thursday, December 31, 2009

नए साल पर एक पुरानी ग़ज़ल डाल रहे हैं
आप सबको नया साल मुबारक हो


क्या अपने हाथ से निकली नज़र नहीं आती ?
ये नस्ल, कुछ तुझे बदली नज़र नहीं आती ?

किसी भी फूल पे तितली नज़र नहीं आती
हवा चमन की क्या बदली नज़र नहीं आती ?

ख़याल जलते हैं सेहरा की तपती रेतों पर
वो तेरी ज़ुल्फ़ की बदली नज़र नहीं आती

हज़ारों ख़्वाब लिपटते हैं निगाहों से मगर
ये तबीयत है कि बहली नज़र नहीं आती

न रात, रात के जैसी सियाह दिखती है
सहर भी, सहर-सी उजली नज़र नहीं आती

हमारी हार सियासत की मेहरबानी सही
ये तेरी जीत भी, असली नज़र नहीं आती

कहाँ गए वो, निशाने को नाज़ था जिनपे
कि अब तो आँख क्या, मछली नज़र नहीं आती

न जाने गुजरी हो क्या, उस जवां भिखारिन पर
कई दिनों से वो पगली, नज़र नहीं आती

Sunday, December 27, 2009

आज 28 दिसंबर है....दर्पण के ब्लॉग की सालगिरह

उस दिन फिर से उसके रूम में..खिड़की के पास रखी टेबल पर..जाना पहचाना सा तुड़ा मुडा कागज़ नजर आया....
और उस दिन फिर देख लिया उसे खोल कर.... प्राची के पार की शुरूआती पोस्ट थी वो...

मयकदे में जाते ही, इक कहानी हो गयी
कातिलाना शोखियाँ हैं, मय जवानी हो गयी....

नज्म उलझी होती थी उन दिनों उसकी....फिर पता ही नहीं चला के कब धीरे धीरे ...
हम...मुफलिस जी..मेजर साब.... और DWIJ भाई... अपने अपने ढंग से उसकी नज्मों को सुलझाने की कोशिश करते करते....इस भोली आँखों वाले बचवा के काफी करीब आ गए...आये तो और भी कई लोग थे उन दिनों....पर...जाने दीजिये...उन्हें शायद सिर्फ और सिर्फ गजल से वास्ता रहा होगा....!

तो मैं कह रहा था के उस दिन उस कागज़ को फिर से वहीँ पड़े देख के ख्याल आया...खुली खिड़की के आगे टेबल पे ये कागज़ अभी तक गुम क्यूँ नहीं हुआ...? इस रूम में क्या क्या नहीं गुम हो जाता...माचिसों के पूड़े के पूड़े गुम होते देखे हैं हमने...ढेरों डिब्बियों में से ढूंढना पड़ता है के किसमें सिगरेट है और किसमें सिर्फ राख.....!!

कितने लोग आते जाते हैं यहाँ पर...एकाध ऐसा भी जिसे इस कागज़ के पुर्जे से कोई वास्ता नहीं॥कोई लेना देना नहीं....

और वो नटखट संजू....!!!!!!!!!!!!!!!!हे राम....!क्या जाने कभी इसी नज्म का हवाई जहाज बना के गली में उड़ा दे तो.......!!!!!!!!!!!!!!

हालांकि हमारे रूम से भी काफी कुछ खो जाया करता है...पर उस वक़्त जाने क्या सोच कर हमने वो कागज़ सहेजा अपनी जेब में डाल लिया... एकदम अजीब सा...बेमतलब का कान्फिडेंस आ गया के शायद ये हमारे पास ज्यादा ठीक रहेगा...

आप भी पढ़ें...हमारे jhon के हाथ से लिखी उलझी नज्म...

मयकदे में जाते ही, इक कहानी हो गयी
कातिलाना शोखियाँ हैं, मय जवानी हो गयी

ढूंढूं तो ढूंढूं किसे इस शहरे-नामुराद में
याद में मेरी सुना है, वो दीवानी हो गयी

कहता हूँ आज लोगो, आपसे, ईमान से
ज़िन्दगी जीने में मुझसे, बेईमानी हो गयी

गम भी अब मिलते हैं मुझको, खुशियों के वर्क ओढ के
मौत तो मासूम है , ये जिंदगी सयानी हो गयी

आईने ने जब सुनाई उसको सच्ची दास्ताँ शर्म से
वो, आज फिर से, पानी पानी हो गयी

पी भी ले दो घूँट ''दर्शन'' उस खुदा का नाम ले.........

मक्ता कुछ साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा है ....बाकी सारी गजल ज्यूँ की त्यूँ उतार दी है कागज़ से पढ़कर....बिना कोई करेक्शन किये.......किसी का दिल चाहे तो करेक्शन कर सकता है...हम नहीं करेंगे..... हमें अपने ब्लॉग की सालगिरह का पता ही नहीं चला के कब आई और कब गयी.....पिछले महीने थी नवम्बर में...दिन याद नहीं है....

पर आज 28 दिसंबर है....दर्पण के ब्लॉग की सालगिरह....... दिल किया के अपने ब्लॉग पे ही मना लूं ये दिन.... :)

Sunday, December 13, 2009

मटमैले लबादे वाला सान्ताक्लोज़




आज ऑफिस से ही उमा को फोन कर दिया है हमेशा की तरह| पुरानी हिदायतें जो बरसों से दोहराता आ रहा हूँ, फिर समझा दी हैं के बच्चों की जुराबें खूब अच्छे से धोकर जैसे भी हो रात तक सुखा ले| टॉफी-चाकलेट वगैरह मैं ख़ुद ही लेता आऊंगा| आज क्रिसमस है ना? उनके बहुत छुटपन से ही सांताक्लोज़ के नाम से और बहुत से पिताओं की तरह मैं भी उनकी मासूम कल्पना को उड़ान देता रहा हूँ| सुबह दोनों पूछते है आपस में एक दूसरे से कि क्या रात को उसने किसी सान्ताक्लोज जैसी चीज का घर में आना महसूस किया था या नहीं| पर हमेशा की तरह किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते और अपनी अपनी चाकलेट और टॉफी खाने जुट जाते हैं बगैर पेस्ट किए| कभी भी तो ये सोचना नहीं चाहते के रात को थका-हारा इनका बाप ही ये सब अपने मटमैले से लबादे में से निकाल कर ठूंसता होगा उस दिन की स्पेशल से धुली जुराबों में| इनकी कल्पना में तो आज भी वो ही सुर्ख लाल लबादे वाला सांता क्लॉज बसा है| पहले तो हम भी इस बैठक में शामिल होते थे, इनकी कल्पनाओं में अपने भी रंग भरने के लिए ....हाँ रात को कुछ आवाज सी सुनी तो थी पर दिखा कुछ नहीं था, सांता क्लोज ही रहा होगा और भला इत्ती रात में कौन आएगा तुम लोगों के लिए ये गिफ्ट लेकर| पर अब भीतर उदासीनता सी हो गयी है इस ड्रामे के प्रति| अब ये बचपना ही चिंता का कारण हो गया है| आख़िर आठवीं-दसवीं क्लास के बच्चों का सान्ताक्लोज से क्या काम| क्या अब इन्हें थोड़ा समझदार नहीं हो जाना चाहिए? टॉफी-चाकलेट तो यूँ भी खाते रहते हैं पर क्या आज के दिन ये उतावलापन शोभा देता है इतने बड़े बच्चों को? जीवन की बाकी सच्चाइयों को किस उमर में जानना शुरू करेंगे फिर| अब तो ध्यान जब तब इनके साथ के और बच्चों पर जाने लगा है| अकल भी अब मसरूफ रहती है जिस्मानी उठान और समझ के बीच ताल मेल बैठाने में| कभी इनके स्कूल का कोई और बच्चा घर आ जाता है तो आँखें ख्यालों के साथ मिलकर उसकी समझदानी का साइज़ समझने बैठ जाती है| पता नहीं स्कूल में ये लोग सांताक्लाज के बारे कोई बात करते हैं या नहीं? हो सकता है के इन दिनों पड़ रही छुट्टियों के कारण इस विषय पर चर्चा न हो पाती हो ...वरना इतने बड़े बच्चे और ऐसी बचकानी..| कई बार चाहा है के ख़ुद ही इन्हें रूबरू करा दूँ सच्चाई से पर जाने क्यूं ये भरम इस तरह नहीं तोड़ना चाहता| इनके विकास को लेकर मन का ज्वार-भाटा बढ़ता ही जाता है| अखबारों में निगाहें अब बाल-मनोचिकित्सकों के लेख ही तलाशती रहती हैं| आई क्यू., ई क्यू. ऐसे 'क्यूं' वैसे 'क्यूँ' कुछ समझ नहीं पाता| कद के साथ बढ़ता बचपना दो तीन साल से हताशा को और बढ़ा ही रहा है| कई बार ख़ुद को दोषी पाता हूँ कि शायद मैं ही स्वार्थवश बाल्यावस्था को समुचित रूप से....| हमेशा जुराबों से चाकलेट निकालते समय मेरी आँखें इनके चेहरे पर गड़ी होती हैं, बस एक नज़र इनकी बेएतबारी की दिख जाए तो कुछ सुकून मिले, कभी तो एहसास कराएँ मुझे बड़े होने का| कैसे जानें के मटमैले लबादे वाला इनका सांताक्लाज अब कैसा बेसब्र है इनकी उम्र का भेद जानने को|

आज तो आफिस में ही काफ़ी देर हो गयी है| बाहर आया तो देखा के बाज़ार भी बंद हो चला है| इलाके की बत्ती भी जाने कब से गुल है| चाल काफ़ी तेज हो चली है, निगाहें तेजी से दायें-बाएँ किसी खुली दूकान को तलाश रही हैं....दिल बैठ रहा है ..अब कि शायद आँगन में टंगी चक-दक धुली सफ़ेद जुराबें बस टंगी ही रह जायेंगी...क्या ऐसे टूटेगा मासूमों का भरम ...क्या गुजरेगी बेचारों पर...? बेबस सा आख़िर में आफिस के उस अर्जेंट काम को ही कोसने लगा हूँ| इसके अलावा और कर भी क्या सकता है एक मटमैले लबादे वाला| सुबह उसे एक अलग ही रूप लिए जगना होगा अब की बार| मन के भीतर किसी छोटे से कोने मैं इसकी भी रिहर्सल चल रही है| इन सब के बीच नज़र में किसी थकी हुई सी लालटेन की धुंधलाती रौशनी आ गयी है| मुझ से भी ज्यादा थका सा लग रहा कोई दूकानदार अपनी दूकान बढ़ाने को तैयार है शायद "ज़रा एक मिनट ठहरो......!!" कहता हुआ थका हारा सान्ताक्लोज दौड़ पडा है इस आखिरी उम्मीद की तरफ़| इसी उम्मीद से तो बच्चों का वो भरम बरकरार रह सकता है जिसे वो कब से तोड़ना चाहता है| जल्दी से जेब से पैसे निकाले और उखड़ी साँसों पे लगाम लगाते हुए दोनों बच्चों के फेवरिट ब्रांड याद करके बता दिए हैं| दूकानदार किलसने के बजाय खुश है| और एक वो है के आफिस से निकलते-निकलते एक अर्जेंट काम के आने पे कितना खीझ रहा था| बमुश्किल दस-पन्द्रह कदम दौड़ने पर ही साँसें कैसी उखड़ चली हैं| दुकानदार ने सामान निकाल कर काउंटर पर सजा दिया है| चॉकलेट के गोल्डन कलर के रैपर कुछ ज़्यादा ही पीलापन लिए चमक रहे हैं| शायद लालटेन की रौशनी की इन्हें भी मेरी तरह आदत नहीं है| मैंने सामान उठा कर लबादे में छुपाया और घर की तरफ़ बढ़ गया| तेज़ रफ़्तार चाल अब बेफिक्र सी चहल कदमी में तब्दील हो गई है| अब कोई ज़ल्दी नहीं है बल्कि अच्छा है कि बच्चे सोये हुए ही मिलें|
मेरा अंदाज़ा सही निकला | दोनों बच्चे नींद की गहरी आगोश में सोये हैं.....एकदम निश्छल, शांत....दीन-दुनिया से बेफिक्र| मैं और उमा खुले आँगन में आ गए हैं, बाहर से कमरे की चिटकनी लगा दी है ताकि किसी बच्चे की आँख खुल भी जाए तो हमारी इस चोरी का पता न चल सके| मोमबत्ती जला कर हमने धुली जुराबों में बच्चों की पसंद के अनुसार सौगातें जचा-जचा कर रखना शुरू किया| जुराबों में हल्का सीलापन अब भी है जो की रात भर आँगन में टंगे-टंगे और बढ़ जाएगा मगर रैपर बंद चीज़ों का क्या बिगड़ता है|
सुबह आँखें लगभग पूरे परिवार की एक साथ ही खुली| दोनों बच्चों ने भरपूर उतावलेपन से अपनी-अपनी रजाइयां फेंक दी और कुण्डी खोल के खुले आँगन में लपक लिए बगैर जाड़े की परवाह किए| दोनों जोशीले तार में लटकी-उलझी अपनी-अपनी जुराबें खींच रहे हैं भले ही उधडती-फटती रहें, उनकी बला से| उन्हें क्या फर्क पड़ता है| उन्हें तो बस सांताक्लोज के तोहफों से मतलब है हमेशा की तरह| बेकरारी पूरे शबाब पर है .....चक-दक जुराबों में तले तक पैबस्त उपहारों को उंगलिया सरका सरका के पट्टीदार दहानों से उगलवाया जा रहा है| सान्ताक्लोज की नेमतें सोफे पर टपक रही हैं मगर आज बच्चे इन्हें अजीब सी नज़रों से देख रहे हैं| जाने उपहारों में आज ऐसा क्या खुल गया है कि इनके चेहरे पर उत्साह के रंग मायूसी में बदल गए| सबसे पहले तो ज़रूरत से ज्यादा पीलापन लिए गोल्डन कलर की जांच हुई और फिर पारखी नजरें प्रोडक्ट की स्पेलिंग चेक करती हुई नीचे लिखा अस्पष्ट मैनुफक्चारिंग एड्रेस समझने लगीं| मेरे कुछ समझ पाने से पहले ही दोनों अपनी अजीब सी शक्लें बनाते हुए और भी ज्यादा बचपने में भर गए ........

"पापू....!! ये क्या ले आए......?...डुप्लीकेट है सारा कुछ..!! ये टॉफी भी ...."
"हाँ .. पापू..! मेरे वाला भी बेकार है एकदम से ...!!"
"आप भी ज्यादा ही सीधे हो ..बस..कोई भी आपको बेवकूफ बना दे...हाँ नहीं तो .."
"आज के बाद उस दूकान पे आप ...!!!!"

बच्चे अचानक संभल गए| गोल-गोल आँखें मटकाती दो शक्लें, दांतों के तले दबी जीभ.. | इस अचानक की पर्दाफाशी से मैं भी हैरान हूँ | दोनों दबी-दबी मुस्कान लिए, मुझसे आँखें बचाते हुए अपनी-अपनी चाकलेट का ज़रूरत से ज्यादा पीला रैपर उतार रहे हैं| एक बार फिर नजरें उठ कर मिली हैं और अब कमरे में ठहाके फूट चले हैं....बच्चों के मस्ती भरे और हमारे छलछलाई आंखों से..!!
बच्चे अभी छोटे हैं शायद ..हमारा ये भरम टूट चुका है..बिलंग्नी पर टंगे मटमैले लबादे से कहीं कोई सुर्ख लाल रंग भी झांकता दिख रहा है..|

Saturday, November 21, 2009

कितनी बार...

अक्सर ही होता है ऐसा....
फोन पे उसे हमेशा ही परेशान पाया है मैंने....
कहाँ गयी....?
अभी तो यहीं थी....!!!!!!!
मधुर.... तूने देखी है...?
देख तो तूने कही रखी होगी....!
अरे , भाई साहिब आपके पास माचिस है...?
नहीं...?
रिक्शे वाले भैया , माचिस है....?????????

और मैं मोबाइल फोन कान से लगाए चुप चाप होल्ड पे रह कर उसे तडपते देखता हूँ....और उसके साथ खुद भी तडपने लग जाता हूँ....
मेरी दोनों जेबों में माचिस है....एक सामने टेबिल पे पड़ी है...दो चार और इधर उधर बिखरी होंगी...!!!!
लेकिन उसे बस इस वक्त एक तिल्ली की जरूरत है...!
उसे क्या फायदा है मेरा दिल्ली में रहने का...?
जब के वो एक तिल्ली के लिए यूं आदमी आदमी को पूछता फिरे...???

शायद मिल गयी है उसे...
हाँ मनु जी,
अब बताइये ....कुछ नवीईईईन ........?????
( नवीईईन बोले तो....नवीन......)

मेरी भी रुकी सांस उसकी सिगरेट जलते ही खुद बा खुद चलने लगती है.....पहले जेबों में हाथ लगा कर माचिस को छूता हूँ..फिर सामने टेबल पर पड़ी माचिस को देखने लगता हूँ......चलो शुक्र है मिल गयी...

कल दिन दहाड़े यही काम मेरे साथ हो गया...पता नहीं कहाँ गिरी ..क्या हुआ....
लेकिन कल जब मुंह में सिगरेट रखी तो पाया के पास में माचिस है ही नहीं..जल्दी से सारी जेबें टटोल डालीं...तेज तेज क़दमों से पूरा ऑफिस नाप दिया...फिर बस.... लगा जैसे मैं दर्पण हो गया....
अरे माचिस है किसी के पास ...?
है क्या...?
है क्याआआआ.........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


पास खडा एक ड्राइवर अपनी जेब से माचिस निकाल कर मेरी तरफ उछाल देता है...और मैं आसानी से कैच कर लेता हूँ...यूं अक्सर मुझ से चीजें छूट जाया करती हैं...!
अब जल्दी से तिल्ली जलाई और मुंह की तरफ बढ़ा दी...होंठ ...नाक अब झुलस गया ...नहीं झुलसी तो बस वो कमबख्त आखिरी सिगरेट ............जो इस हडबडाहट में जाने कहाँ गिर गयी थी...?

जाने दो ...कोई टेंशन नहीं...बाद की बात है...

अभी तो मैंने एक बीडी मुंह में दबाई और दूसरी तिल्ली से सुलगा ली....
इसने बस बीडी ही सुलगाई...और कुछ नहीं....

अब मैं इत्मीनान से पेड़ के निचे कुर्सी डाल कर बैठा सोच रहा हूँ......
उसका मुंह आये दिन कितनी बार जलता होगा

Thursday, November 12, 2009

गजल...

नहीं हो रही है....
जब गजल की मर्जी होती तो ही होती है.....

हमारी मर्जी से कब हुई है ग़ज़ल......?

दिवाली का दिन.....
दर्पण मेरे घर के रास्ते में रिक्शा पे सवार बैठा था...बड़ी भीड़ थी उस मेले में..... पता लगा के लोग उसे ठेल रहे हैं ... और वो अडा हुआ है...
पटरी वाले.. दूकानदार...सिपाही....ट्रेफिक वाले.......
और आजू बाजू से गुजरते लोग....!

सभी तो मिल कर धकिया रहे थे गरीब को.......

उस को भी जाने क्या सूझ गयी.......

बोला........ अभी मेरी वाइफ आ रही है... बस ..ज़रा शौपिंग करने गयी है....

बस.....!!!
फिर क्या था....?
सारे जुल्मो-सितम थम गए

अब इत्ता चिकना छोकरा है...तो उसकी वाइफ कैसी होगी......?????????

????????????????????????
???????


रिक्शा ...वहीँ रुका रहा...दर्पण को लिए....
आने-जाने वाले भी,
पटरी वाले भी ...और सब दूकानदार भी......

एक टक...!!!!!!!

घूरते रहे खाली खाली रिक्शे में बैठे दर्पण को.....
हाँ जी,
वो सिपाही भी......
हा हा हा हा हा .....( ठरकी .............)

कुछ देर बाद वहाँ पर हम प्रगट हुए....

हारे थके....
टमाटर-खीरे-प्याज
हरी मिर्ची.....

एक पोलीथिन में समेटे हुए ... ( एकदम नार्मल से...)

और सब कुछ ले जाकर दर्पण के बराबर में जा धंसे............
और रिक्शा वाले को कहा ..... चल भाई, अब चल जल्दी से.....!


पटरी वाले ने अपने मुंह से तुंरत नेवला छाप की पिचकारी सड़क पे छोड़ दी,
दूकानदार ...खिसिया कर अपने ग्राहकों को पटाने में लग गए....

और सिपहिया बाबू.....???

हमारे रिक्शा में धंसते ही पिछले टायर पर उनके डंडे की सारी खुंदक निकल गई...

आजू बाजू में ठिठके लोग...
बेचारे,,,,,,!!!!!!

''अपना-सा'' मुंह लेकर .........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!



एक शे'र याद आ गया.... फैज अहमद फैज का.....

वो तो वो है तुम्हे हो जायेगी उल्फत मुझ से
इक नजर तुम मेरा महबूबे-नज़र तो देखो......

Monday, November 2, 2009



एम.एफ। और एफ एम। दो ऐसे शब्द जिन से जब तब मुलाकात हो जाती है। एक एम एफ तो बहुतेरे लोगों के गले ही नहीं उतरता यानी अपना एम एफ हुसैन ! और एक एफ.एम.के बगैर बहुतेरों को दुनिया ही सूनी लगती है यानी एफ.एम.रेडियो! अपना मिजाज़ काफी लोगों से अक्सर मेल नहीं खाता। एम.एफ.बेचारे में तो अपने को ऐसी कोई ख़ास कमी नहीं लगती जिस के चलते इतना बवाल होता है। और आप भी सोच कर देखें ...कुछ ज़्यादा ही नहीं हो जाता भले आदमी के साथ..? और अब ज़रा एफ.एम.महोदय की भी सुध लें.... कितने ही लोग हैं जिनकी सुबह एफ.एम.के किसी न किसी चैनल से होती है जो अक्सर देर रात तक तारी रहता है। एफ.एम.गोल्ड की बात छोड़ दें तो ज्यादातर के साथ मेरा तज़ुर्बा कड़वा ही रहा है। हालांकि मैं चाह कर भी एफ.एम.नहीं सुन पाता लेकिन जब कभी भी न चाहते हुए भी सुना है तो मेरी चाहत ने इससे तौबा ही की है। गीत की पसंद की तो बात करना बेमानी होगा क्योंकि वो तो सब मुट्ठी भर लोगों की मर्ज़ी से ही बजते बनते हैं। हाँ !जब मुसलसल सुनते सुनते कान पक जाते हैं और मजबूरन इनके आदी जाते हैं तो मेरे जैसे बाकी बेबस श्रोताओं की तरह मुझे भी इनकी सुपर-डूपेर्टी कबूलनी पड़ती है। ये तो बात हुई संगीत माफिया की या कह लें के पूँजीवाद की जिनका के एक निरीह श्रोता कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इन उदघोषकों से अवश्य ही प्रार्थना करना चाहूँगा के कम से कम आप लोग अर्थपूर्ण गीत न बजाया किजीये। गलती से आ गयी फरमाइश पे भी नहीं!इनका बड़ा अनर्थ होता है।कोई भी गंभीरता से संगीतबद्द किया गीत सुनने के फ़ौरन बाद आर.जे.की बेसिर पैर की उन्मुक्त चटर पटर तमाचे जैसी लगती है। जैसे "बिछडे सभी बारी बारी....!" चल रहा है और आधे अधूरे रफी साहब को एन बीच में घोटकर पूरी मस्ती में चहकना 'ओ.के.फ्रेंड्स !ये साहब तो बिछड़ गए हैं अब आपके साथ है वैरी वैरी होट.......!!!!!!!!! भगवान् के लिए ऐसे ही गीत बजाएं जो आपके माहौल को सूट करें। अच्छे संगीत के मर्म की समझ जो आकाशवाणी के उदघोषकों को थी उसका तो अब एकदम अकाल है। ग़ालिब का शेर याद आ रहा है ....
"अब है इस मामूर में कहते-गम-ऐ-उल्फत असद,
हमने माना के रहे दिल्ली में पर खाएँगे क्या?"

Friday, October 16, 2009

इतना नंगा आदमी (लघुकथा)

पिछले साल हिंद युग्म पर एक छोटी सी कहानी जैसी छपी थी...
फिलहाल वही डाल रहा हूँ....

काफी दिन से कुछ नहीं पोस्ट हुआ ना...?



आज और दिनों की अपेक्षा मुख्य मार्ग वाले बाज़ार में कुछ ज्यादा ही भीड़ भड़क्का है | कुछ वार त्योहारों का सीज़न और कुछ साप्ताहिक सोम बाज़ार की वजह से | भीड़ में घिच -पिच के चलते हुए ऐसा लग रहा है जैसे किसी मशहूर मन्दिर में दर्शन के लिए लाइन में चल रहे हों | इतनी मंदी के दौर में भी हर कोई बेहिसाब खरीदारी को तत्पर | सड़क के दोनों तरफ़ बाज़ार लगा है | अजमल खान रोड पर मैं जैसे-तैसे धकेलता-धकियाता सरक रहा हूँ | भीड़ में चलना मुझे सदा से असुविधाजनक लगता है, पर क्या करें, मज़बूरी है | अचानक कुछ आगे खाली सी जगह दिख पड़ी | चार-छः कदम दूर पर एक पागल कहीं से भीड़ में आ घुसा है | एकदम नंग-धड़ंग, काला कलूटा, सूगला सा | साँसों में सड़ांध के डेरे, मुंह पर भिनकती मक्खियाँ, सिर में काटती जूएँ | इसीलिए यहाँ कुछ स्पेस दिख रहा है | अति सभ्य भीड़ इस अति विशिष्ट नागरिक से छिटककर कुछ दूर-दूर चल रही है |
पर मैं समय की नजाकत को समझते हुए उस पागल की ओर लपका और साथ हो लिया | हाँ! अब ठीक है | उसका उघड़ा तन मुझे शेषनाग की तरह सुरक्षित छाया प्रदान कर रहा है | मैं पूर्णतः आश्वस्त हूँ | हाँ! इतना नंगा आदमी कम से कम मानव बम तो नहीं हो सकता......|

Dhyaan seDekho di....
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Tuesday, September 22, 2009

दास्ताँ-ए-इश्क को बस मेरा अफ़साना कहें
इस तरह सब इश्क से क्यूं खुद को बेगाना कहें

अक्स उनका,चाह उनकी,दर्द उनके, उनका दिल,
दिल में हो जिसके उसे सब, क्यों न दीवाना कहें

जाम आखिर जाम की सूरत कभी तो चाहिए
कब तलक तेरी हसीं आँखों को, मयखाना कहें

साथ जीने की ही जब उम्मीद तक बाकी नहीं
तेरे बिन जीने को फिर हम,क्यों न मर जाना कहें.

"बे-तखल्लुस" ये जहां वाले भला समझेंगे क्या.?
जां का जाना है, जिसे सब दिल का आ जाना कहें।

Thursday, August 20, 2009

वैसे तो मतले कहाँ बनते हैं ,,,,
पता नहीं क्या हुआ के मतला ही बन के रह गया.....
बस ....
छाप ही दिया ...
कब से कुछ नहीं लिखा था...



कुछ न ईमां पर कहें , जो साहिबे-ईमां नहीं
लफ्ज़ आसां है मगर ये इतना भी आसां नहीं

क्यूं ख़याल अपने हों, फैज़-औ-मीर-ग़ालिब से जुदा
या तो वो कुछ और थे, और या हमीं इन्सां नहीं.

Sunday, August 2, 2009

hind-yugm se...........


शामे-तन्हाई में क्या-क्या कहर बरपाता है दिल
क्या-क्या कह जाता है जब कहने पे आ जाता है दिल

फिक्र में डूबे सफे जब दर्द से हों रूबरू
इक ग़ज़ल उम्मीद की हौले से लिख जाता है दिल

चुगलियाँ रंगीन प्याले की, सुराही के गिले
दोनों की सुनता है और दोनों को समझाता है दिल

चुप लगाकर धड़कनें और गुनगुना कर खामुशी
सुनती हैं तकरीरे-उल्फत, और फरमाता है दिल

खुश ख्यालों से घनेरी चांदनी की जुल्फ को
आप उलझा हो वले, पर हंस के सुलझाता है दिल

जब वो तेरे हैं तो फिर क्या दूरियां-नजदीकियां
जिंदगी को और कभी यूं खुद को बहलाता है दिल

Thursday, July 16, 2009

DARPAN.....!

अभी पिछले दिनों की तो बात ही है....
एक सवाल .....
किया था तुमने मुझ से...

तुम कितना बेजार थे उस दिन....!

कितनी उम्मीद थी ....
आवाज़ में तुम्हारी.. ...
और..
सवाल में तुम्हारे....
कितनी बेचारगी ....!

और मैंने भी समझा था तुम्हारी पीडा को..
जाना था हाल....
तुम्हारे भीतर का.....
हाँ...बेशक...
या.
शायद.......!!!!!!
उस दिन..एकाएक मैं, मैं से उठकर....मैं से थोडा आगे बढ़कर...
कोई सुकरात..या
शायद..
कोई अरस्तू हो गया था मैं..

क्या गफलत थी उस ऊंचाई की...
मैंने चुटकी में सुलझा डाला था ..तुम्हारा हर सवाल.....

कितने लाजवाब हो गए थे तुम भी....
या
शायद ज्ञानी.....................
जैसे जान गए हो स्रष्टी का हर भेद...
हर तौर-तरीका...ब्रह्माड का..
पूरी कायनात का..............
तुम्हे उस हाल में देख ...
मैं अपने मैं से कितना और ऊपर उठ गया था...
नहीं.....?????
ह्म्म्म्म्म


क्या यार...
एकदम वही सवाल तो लादे
खडा हूँ मैं आज...
ठीक तुम्हारे ही सामने...

क्या तुम भी मुझे वैसे ही बहला दोगे....
या बनोगे मेरे .....

सच्चे अरस्तू....!!!!

Thursday, July 2, 2009

बस आदमी से उखडा हुआ आदमी मिले
हमसे कभी तो हँसता हुआ आदमी मिले

इस आदमी की भीड़ में तू भी तलाश कर,
शायद इसी में भटका हुआ आदमी मिले

सब तेजगाम जा रहे हैं जाने किस तरफ़,
कोई कहीं तो ठहरा हुआ आदमी मिले

रौनक भरा ये रात-दिन जगता हुआ शहर
इसमें कहाँ, सुलगता हुआ आदमी मिले

इक जल्दबाज कार लो रिक्शे पे जा चढी
इस पर तो कोई ठिठका हुआ आदमी मिले

बाहर से चहकी दिखती हैं ये मोटरें मगर
इनमें, इन्हीं पे ऐंठा हुआ आदमी मिले

देखें कहीं, तो हमको भी दिखलाइये ज़रूर
गर आदमी में ढलता हुआ आदमी मिले

Thursday, June 25, 2009

तू जो सबसे जुदा नहीं होता,
तुझपे दिल आशना नहीं होता,

कैसे होती कलाम में खुशबू,
दिल अगर फूल सा नहीं होता.........!!!!!

मेरी बेचैन धडकनों से बता,
कब तेरा वास्ता नहीं होता

खामुशी के मकाम पर कुछ भी
अनकहा, अनसुना नहीं होता

आरजू और डगमगाती है
जब तेरा आसरा नहीं होता

आजमाइश जो तू नहीं करता
इम्तेहान ये कडा नहीं होता

हो खुदा से बड़ा वले इंसां
आदमी से बड़ा नहीं होता

ज़ख्म देखे हैं हर तरह भरकर
पर कोई फायदा नही होता

राह चलतों को राजदार न कर
कुछ किसी का पता नहीं होता,

जिसका खाना खराब तू करदे
उसका फिर कुछ बुरा नहीं होता

मय को ऐसे बिखेर मत जाहिद
यूं किसी का भला नहीं होता

इक तराजू में सब को मत तौलो
हर कोई एक सा नही होता

मेरा सिर धूप से बचाने को
अब वो आँचल रवा नहीं होता

रात होती है दिन निकलता है
और तो कुछ नया नहीं होता

हम कहाँ, कब कयाम कर बैठें
हम को अक्सर पता नहीं होता

सोचता हूँ, के काश हव्वा ने
इल्म का फल चखा नहीं होता

होता कुछ और, तेरी राह पे जो
'बे-तखल्लुस' गया नहीं होता

Tuesday, June 2, 2009

दो जून....

आज दो जून है...हमारी शादी की साल गिरह..सवेरे ही याद आ गया था..साथ ही याद हो आयी एक बरसों पुरानी रचना.....
एक बे-मतला गजल ...
जब एक दफा बेगम साहिबा  अपने बताये गए समय से कुछ ज्यादा ही रुक गयीं थी मायके में... तब हुयी थी ये....
आज इसे ही पढें आप ....

ये अहले दिल की महफ़िल है कभी वीरान नहीं होती
के जिस दम तू नहीं होता तेरा अहसास होता है

तेरे जलवों से रौशन हो रहे शामो-सहर मेरे
तू जलवागर कहीं भी हो तू दिल के पास होता है

चटखते हैं तस्सवुर में तेरी आवाज़ के गुंचे
जुदाई में तेरी कुर्बत का यूं अहसास होता है

निगाहों से  नहीं होता जुदा वो सादा पैराहन 
हर  इक पल हर घड़ी बलखाता दामन पास होता है

विसाले-यार हो ख़्वाबों में चाहे हो हकीकत में
तेरे दीदार का हर एक लम्हा ख़ास होता है.

नहीं इक बावफा तू ही, तेरे इस हमनवा को भी
वफ़ा की फ़िक्र होती है, वफ़ा का पास होता है

Friday, May 22, 2009

मेरी निगाह ने वा कर दिए बवाल कई,
हुए हैं जान के दुश्मन ही हमखयाल कई

नज़र मिलाते ही मुझसे वो लाज़वाब हुआ,
कहा था जिसने के, आ पूछ ले सवाल कई

उलट पलट दिया सब कुछ नई हवाओं ने,
कई निकाल दिए, हो गए बहाल कई

कहीं पे नूर, कहीं ज़ुल्मतें बरसती रहीं,
दिखाए रौशनी ने ऐसे भी कमाल कई

है बादे-मर्ग की बस्ती ज़रा अदब से चल,
यहाँ पे सोये हैं, तुझ जैसे बेमिसाल कई

Monday, May 4, 2009


दोस्तों, हिंद युग्म पर छपी ये ग़ज़ल आज पोस्ट कर रहा हूँ,,,, हम अल्मोडा जा रहे थे और इस जगह हमारी बस खराब हो गयी थी,,, पहले के दो शेर इसी लैंड स्केप के साथ साथ हुए थे,,,,,


ये हरी बस्तियां महफूज बनाए रखना,
इस अमानत पे कड़े पहरे बिठाए रखना

अगले मौसम में परिंदे जरूर लौटेंगे
सब्ज़ पेडों को,kiसी तौर बचाए रखना

जिंदगी इन के बिना और भी मुश्किल होगी
सुर्ख उम्मीद के ये फूल खिलाए रखना

शब कटी है तो कभी आफताब चमकेगा
सुनहरी मछलियों पे जाल लगाए रखना

तेरी गफलत से न रह जाए कहीं राहों में
ख्वाब की फिक्र में आँखों को जगाए रखना


मिल गया मुफलिस जी का शेर,,,,,,,


रात गुजरी है , तो सूरज भी यहाँ चमकेगा


 
नूर की बूँद से धरती को सजाये रखना 


(उम्मीद भी आ गयी , पर्यावरण का पहलु भी )
 

Monday, April 27, 2009

ghazal,,,,,

 
बेखुदी, और इंतज़ार नहीं,
छोड़ आई नज़र क़रार कहीं
 
तेरी रहमत है, बेपनाह मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं
 
निभे अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं
 
सख्त दो-इक, मुकाम और गुजरें,
फ़िर तो मुश्किल, ये रह्गुजार नहीं
 
काश! पहले से ये गुमाँ होता,
यूँ खिजाँ आती है, बहार नहीं
 
अपने टोटे-नफे के राग न गा,
उनकी महफिल, तेरा बाज़ार नहीं
 
जांनिसारी, कहो करें कैसे,
जां कहीं, और जांनिसार कहीं
 

Monday, April 20, 2009

ghazal........

खाली प्याले, निचुड नीम्बू, टूटे बुत सा अपना हाल

कब सुलगी दोबारा सिगरेट ,होकर जूते से पामाल


रैली,परचम और नारों से कर डाला बदरंग शहर

वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल


चन्दा पर या मंगल पर बसने की जल्दी फिक्र करो

बढती जाती भीड़, सिमटती जाती धरती सालों साल


गांधी-गर्दी ठीक है लेकिन ऐसी भी नाचारी क्या

झापड़ खाकर एक पे आगे कर देते हो दूजा गाल


यार, बना कर मुझको सीढी, तू बेशक सूरज हो जा

देख कभी मेरी भी जानिब,मुझको भी कुछ बख्श जलाल


उनके चांदी के प्यालों में गुमसुम देखी लालपरी

अपने कांच के प्याले में क्या रहती थी खुशरंग-जमाल

Monday, April 6, 2009

Satpal ji ke Tarhi Mushaayre se

कभी इन्कार चुटकी मे,कभी इक़रार चुटकी मे
हज़ारों रंग बदले है निगाहे-यार चुटकी में

मैं रूठा सौ दफ़ा लेकिन मना इक बार चुटकी में
ये क्या जादू किया है आपने सरकार चुटकी में

बड़े फ़रमा गए, यूँ देखिये तस्वीरे-जाना को,
ज़रा गर्दन झुकाकर कीजिये दीदार चुटकी में

कहो फिर सब्र का दामन कोई थामे भला कैसे,
अगर ख़्वाबों में हो जाए विसाले-यार चुटकी में

ग़ज़ल का रंग फीका हो चला है धुन बदल अपनी
तराने छेड़ ख़ुशबू के, भुलाकर ख़ार चुटकी में

न होना हो तो ये ता-उम्र भी होता नहीं यारो
मगर होना हो तो होता है ऐसे प्यार चुटकी में

वजूद अपना बहुत बिखरा हुआ था अब तलक लेकिन
वो आकर दे गया मुझको नया आकार चुटकी में


जो मेरे ज़हन में रहता था गुमगश्ता किताबों-सा
मुझे पढ़कर हुआ वो सुबह का अखबार चुटकी

कभी बरसों बरस दो काफ़िये तक जुड़ नहीं पाते
कभी होने को होते हैं कई अश'आर चुटकी में

Tuesday, March 24, 2009

GHAZAL,,,


कड़कती धूप को सुबहे-चमन लिखा होगा

फ़रेब खा के सुहाना सुखन लिखा होगा


कटे यूँ होंगे शबे-हिज़्र में पहाड़ से पल

ख़ुद को शीरी औ मुझे कोहकन लिखा होगा


लगे उतरने सितारे फलक से उसने ज़रूर

बाम को अपनी कुआरा गगन लिखा होगा


शौके-परवाज़ को किस रंग में ढाला होगा

कफ़स को तो चलो सब्ज़ा-चमन लिखा होगा


हर इक किताब के आख़िर सफे के पिछली तरफ़

मुझी को रूह, मुझी को बदन लिखा होगा


ये ख़त आख़िर का मुझे उसने अपनी गुरबत को

सुनहरी कब्र में करके दफ़न लिखा होगा |