बे-तख़ल्लुस

manu

manu

Monday, November 24, 2008


हमने समझा

सिमट

रही है ज़मीन

फासले

तंग होते

जा रहे हैं

अब ये जाना

बढ़ी है

भीड़ बहुत

जो थोड़े से थे

वो लोग

खोते जा रहे हैं



अब ना

परदा उठा

ऐ शाम-ऐ-हयात

अब ना

मंज़र में

वो सबाहत है

अब ना

नज़रों में

वो उजाले हैं

अश्क हर

नक्श धोते जा रहे हैं

5 comments:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

बहुत खूब मनुजी, शानदार अभिव्यक्ति..

Harkirat Haqeer said...

Manu ji, pehle to ye word verification hta len isse tippani karne walon ko paresani hoti hai dusre blog jagat me aane k liye sukriya, teesre aapki paktiyan aachi lagin...bhvisya me isse bhi acchi padhne ko milegi ummeed hai...

neelam said...

wo naqs kya hua ,jo asqon se hi dhul jaaye ,dil ki gahraai tak jaati hai ,aapki bat ,khuda aapki

kalam ko sundar syaahi se,aur aapko aur bhi sunder alfaajon se nawaaje .
aaaaaaammmmmmmmmmmeeeeeeennnnnnnn

bahadur patel said...

bahut khoob.

Babli said...

पैन्टिग मेरी बनाई हुई है और जितने सारे पैन्टिग मैने शायरी के साथ लगाये है वो मेरी बनाई हुई है पर सब नही वो तो देखने से ही मालूम चलता है ! अरे नही मनु जी मै कोई मस्टर नही बस थोडी बहुत पैन्टिग कर लेती हू !
आप ने मेरी तारीफ़ की उसके लिये बहुत बहुत शुक्रिया !
बहुत शानदार लिखा है आपने !