बे-तख़ल्लुस

My photo
'बेतख़ल्लुस' हूं मुझे कोई भी अपना लेगा

manu

manu

Saturday, April 10, 2010

लॉन्ग-ड्राइव

हमने कहा...''आज आठ अप्रैल है....''
''तो.....??''

''तो..!!!!!!!!!!!!!
...अरे कुछ नहीं...बस बता रहे हैं...कि आज आठ..."
उसकी मुस्काती आँखों में और भी मुस्कराहट भर गयी...और पास खड़ी पारुल को आँखों में और भी सस्पेंस...नन्ही पारुल ने पहले हमें देखा ..फिर एकदम उसी नज़र से उसे....और उसने झुक कर उसके कान में, शायद हमें सुनाकर कहा...''आज के दिन तेरे मामा की सगाई हुई थी..''
''हाँ, हमारी अकेले की सगाई हुई थी आज...तुम्हारी थोड़े ही हुई थी.....!"
''हाँ जी, हमने भी तो पारुल से यही कहा है के आज तेरे मामा की सगाई हुई थी...''

राम जाने...कब सुधेरेंगे हम....या कब सुधरेगी वो...

अब पारुल कि आँखों में शरारत देखते ही हमें होश आया....और हमने कुछ और ज़्यादा जल्दी दिखाते हुए श्रीमती जी से कहा..
''थोड़ा जल्दी कर लो....हम पहले ही लेट हैं..''
हमारे इतना कहते ही उसने और जल्दी दिखाई और जाने कितना उतावलापन मुस्काती आँखों में समेटे साथ चलने के लिए बाईक के साथ में आ खड़ी हुई....

''अरे रुको...ऐसे मत बैठो...वैसे बैठो..जेंट्स कि तरह ...! दोनों पाँव एक तरफ किये तो हम से बैलेंस ठीक से नहीं बनता...खामख्वाह कहीं तुम्हें गिरा गिरू देंगे...''
उसने धीरे से कान में कहा...'' यहाँ तो हम ऐसे ही बैठेंगे...चाहे आप गिरायें चाहे जो करें...आखिर अपना मुहल्ला है , कोई क्या कहेगा...?
हाँ, बाहर निकलकर जैसे कहेंगे वैसे बैठ जायेंगे....''

''अरे, तो क्या मुहल्ला ये भी बतलाता है कि बाईक पर किसे, कैसे बैठना है...? और कहीं चोट फेट लग गयी तो क्या मुहल्ला....???? "

'' फ़ालतू कि बात मत करो...कहा ना...बाहर निकलकर वैसे बैठ जाऊंगी...!!! "

अपनी बीस साल की मैरिड लाइफ , और कुल जमा तीन महीने की ''ड्राईविंग-लाइफ'' में परसों पहला मौक़ा था इस तरह से साथ साथ जाने का..
इस में भी मुहल्ला बीच में आन टपका....

खैर ,
बाहर मेन रोड पर निकलकर श्रीमती जी हमारी मनचाही मुद्रा में बैठने को राजी हुईं... और उन्हें मनचाहे पोज में आते ही हमने बाईक के लेफ्ट वाले शीशे का डायरेक्शन ट्रैफिक की तरफ से हटाकर अपुन दोनों के मुखमंडल की तरफ घुमा दिया.....अभी नैन-मटक्का शुरू ही हुआ था कि बायें से ब्लू-लाईन बस का तेज..अंतिम वार्निंग वाला होर्न सुनाई दिया.और हमें एक आदिकालीन...रीतिकालीन कवि की ....ना जी..उस समय तो समकालीन ही था , वो मशहूर लाईने याद आ गयीं...

पानी करा बुलबुला, अस माणूस की जात..
देखत ही छिप जाएगा, ज्यूँ तारा परभात..

............................और..............

और हमने वापिस बाईक के शीशे का मुंह उसकी पुरानी पोजीशन पर कर घुमा दिया....अब शीशे में चंद्रमुखी के स्थान पर वही उबाऊ ट्रैफिक नज़र आ रहा था ....

हटाने से पहले हम उसकी तरफ देख कर बुदबुदाए थे....'' बाकी सब बाद में..सबसे पहले सेफ्टी है..."

अभी भी उस चेहरे पर दमकती खुशियाँ हमारी आँखों में बंद थीं.....एक बेहद मामूली गड्ढे को देखकर हमने जोर से ब्रेक लगाए...एक छोटी सी चीख सुनाई दी कानों में...अगर ये ब्रेक नहीं लगता तो ये चीख काफी ऊँची हो सकती थी..
ज़िन्दगी के हर ऊँचे नीचे रास्ते में उसने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया है हमारा...हर हाल में..हर घडी में..हर भले बुरे वक़्त में सहारा दिया है...ये बात और के अब दिल्ली के उबड़ खाबड़ रास्तों पर चलते वक़्त उसकी हालत खराब हो जाती है....अपने दायें काँधे पर नर्म हाथ का हल्का सा दबाव महसूस हुआ ,
हम जानते हैं कि ये दबाव उसका शुक्रिया है.. उस छोटे से गड्ढे का ध्यान रखने के लिए...उसे जोर से लगने वाले हिचकोले से बचाने के लिए..
आज वो बहुत खुश है...उसे कोई परवाह नहीं के अस्पताल में किस टेस्ट की क्या रिपोर्ट आयेगी...कौन सी नई बीमारी की पोल खुलेगी....क्या होगा...उसे कोई मतलब नहीं....

कान में धीरे से फुसफुसाहट हुई....''आज हम पहली बार लॉन्ग-ड्राइव पर जा रहे हैं...''
''हाँ,..पर ...क्या अस्पताल जाना भी तुम्हारे लिए लॉन्ग-ड्राइव की मस्ती है..?''


काँधे पर फिर एक हल्का सा दबाव पड़ता है ..और हम फिर शीशे का डायरेक्शन ट्रैफिक से हटा कर हम दोनों के चेहरों कि तरफ कर देते हैं.....

पानी केरा बुलबुला.....!!

नहीं....!!!
पास से एक थ्री-व्हीलर गुजरा है लता की आवाज़ में डूबा...

कह दो बहारों से आयें इधर...
उन तक उठ कर हम नहीं जाने वाले....

Sunday, March 21, 2010

मौत.....संशोधित पोस्ट...



उस दिन अपने इधर मोहल्ले में एक मौत हुईं थी.....
ऑफिस की बात नहीं है जी...मोहल्ले की बात है...
ऑफिस में तो आम बात है होना...
शमशान में जो ठहरा...

ऑफिस ही जा रहे थे तब हम..जब फोन आया घर से...


हमारे मुंह से निकला....चलो ठीक हुआ....
उमा हम पे ज़रा बरस सी पड़ी....
क्या ठीक हुआ...?
ऐसे में ऐसा नहीं कहते.....
आपको एकदम समझ नहीं है...कुछ भी कहने की.....जो दिल में आया कह देते हो...

सब कुछ भूल कर उसे समझाना चाहा..के तुम से ही तो कहा है...
किसी गैर से तो नहीं कहा...और तुम्हें तो मालूम है के हम कैसे हैं....
हमने हजार दलीलें दीं..
कल तक तो हर आदमी कहता था के बुढ़िया ने पूरी तरह से जीना हराम कर रखा है....हर कोई...तुम भी.....उसके सब दूर पास के रिश्तेदार...
नाती .पोते..नवासे....ये.. वो.. हम.. तुम ...एक भी बता दो कि फलां शख्स उसके जीने से रत्ती भर भी खुश था...

''नहीं जी, आप समझो, ऐसा नहीं कहना चाहिए आपको.....अब वो नहीं रही..."

अरे यार...वो पहले ही कब थी किसी के लिए .....वो बात और के मोहल्ले का हर छोटा बड़ा उसे नानी कहता था....
अब क्यूंकि नानी का क्रिया - कर्म हो चुका था ..अब बारी थी वहाँ , उसके घर पर जाने की..
हमेशा कि तरह हमारा मन नहीं था जाने का....इसलिए नहीं के कोई खुंदक थी..

बल्कि हमारा मानना है कि अगर कोई मरता है..और हम उसी वक़्त वहाँ जा सकें ....... तो बेहतर है..
अगर नहीं जा सकते तो जिस दिन तेरहवीं जैसा कुछ होता है तब जाया जाए...
पर उसके बीच तेरह दिन में हम जाना जरूरी नहीं समझते....जब तक कि हमें ये यकीन ना हो कि हमारे जाने से , जाने वाले के घर वालों को किसी तरह कि शान्ति मिलगी..कोई सुकून हासिल होगा..कोई मदद हो सकेगी हमारे जाने से...

तब तक हम नहीं जाना चाहते....

माँ के ख्याल , माँ की बातें आज भी वैसी ही हैं..इस बाबत...और हमारी मैडम का भी यही कहना है......
''आप किसी के ऐसे वक़्त में नहीं जायेंगे तो आपके में कौन आयेगा....?''
चाहे हम जितना भी समझा लें..के किसी के यहाँ सिर्फ और सिर्फ फोरमेलिटी पूरी करने के लिए जाना..असल में उसे कष्ट देना ही होता है..जब कि हम जानते हैं कि हमारे आने से उसकी तकलीफ कम होने कि बजाय बढेंगी ही...सब ही जानते हैं...


वो जिस हाल में भी होगा..उठकर हमें पानी देगा..
फिर चाय बनाना चाहेगा...ना चाह कर भी....हम कुछ हाथ बंटाना चाहें भी तो वो हमें नहीं बंटाने देगा....
जिसे ठीक से जानते भी नहीं.....मुंह देखे कि दुआ सलाम ही बची हो ..उसका हम क्या दुःख दूर कर देंगे उसके घर जाकर....??

पहले बस माँ कहती थी..अब उमा भी कहती है..
''आप किसी के ऐसे वक़्त में नहीं जायेंगे तो आपके में कौन आयेगा....?''


सटीक जवाब पहले भी नहीं थे हमारे पास..आज भी नहीं हैं.....
आज बस यही सोच रहे हैं...

गोया मौत ना हुई...
ब्लोगिंग हो गयी.....

Monday, March 15, 2010

एक पोस्ट अभी डाली.

एक पोस्ट अभी डाली..
अभी ही डिलीट भी कर डाली...

एक शे'र याद आ रहा है...मीना कुमारी का....


पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है...
रात खैरात की, सजदे कि सहर होती है...

Monday, March 8, 2010

रंग


कल आफिस में लंच करते समय उन्होंने कहा था.........

"मनु यार कम से कम हाथ तो धो ले।"

"धुले तो हैं " मैंने कहा पर उँगलियों पर हल्का गुलाबी रंग, और कहीं एक शोख आसमानी रंग नज़र आ रहा था

"तो ये क्या है....?"

"ये तो रंग हैं ,हाथ तो धो चुका हूँ पर ये नहीं छूट रहे.....आप ही बताओ क्या करुँ "

"दुबारा हाथ गीले कर के स्लैब के उलटी तरफ़ खुरदरी जगह पर जोर से रगड़ ले, सब छूट जाएगा "

मैंने उनके कहे पर अमल करना शुरू किया........पर जाने क्यूं इन शोख रंगों को जोर से रगड़ने की हिम्मत हाथों को ना हुई,
कुछ देर वो मेरा इंतज़ार देख के बोले " एक मिनट का काम है, बस,, पर तू ही नहीं चाहता...."

""जी शायद मैं ही नहीं चाहता,
आप चाहें तो मेरे बिना अकेले लंच कर सकते हैं ......."

Saturday, March 6, 2010

कुछ ख़ास नहीं है कहने को...

क्या कहें...?
कुछ ख़ास नहीं है कहने को...!
होली पर जाने क्या हुआ...पर..अभी तक होली बीती नहीं है....ऐसा कुछ ख़ास अलग खाया पीया भी नहीं था जो......

पर अब के ....बस....होली जैसी ही होली हो गयी.....

फैज़ साहिब कि सुने तो..
यूं तो कब से नहीं सुन सके हैं फैज को...

न गुल खिले हैं न उनसे मिले न मय पी है...
अजीब रंग में अब के बहार गुजरी है...

हमें छोडिये...फैज़ साहिब की बात सुनिए..

Sunday, February 28, 2010

ताज़ा ग़ज़ल

पिछली कुछ रातों को जाने क्या क्या ख्याल आये दिल में......
बस हम फर्क ढूंढते रहे
कभी चित्रकार और कलाकार में..
कभी गायक और गवैये में...
कभी ग़ज़लकार और शायर में....
तो कभी..
ब्लोगर्स में और खुद अपने में...
थोड़ा/ज़्यादा फर्क महसूस तो हुआ...
खैर.....
अपना क्या है,
हम तो ऐसे ही सोचते सोचते एक दिन निकल लेंगे...


आप ये ताज़ा ग़ज़ल देखिये..


आदमी ग़लतियों का पुतला है
तू, जो हरदम सही है, तू क्या है

मेरे बारे में लोग जो भी कहें
मेरे बारे में तू क्या कहता है

होश की बात ही नशे में भी
ये भी पीने का कुछ तरीका है

वक़्त जाएगा किस हिसाब में, जो
हमने इक दूसरे पे खरचा है

ईन्चना है तेरा तबस्सुम फिर
मेरे जाने से कैसा कुम्हला है




Wednesday, February 10, 2010

एक और पुरानी ग़ज़ल...






जो लोग कहते हैं, वो लगावट, हो अपने भी दरमियां तो कुछ हो
इस उडती-उडती खबर से हमपे, जो तू भी हो बदगुमां तो कुछ हो

ये ग़म हमारा तेरी जुबां से न हो सके गर बयां तो कुछ हो
हो खोयी-खोयी नज़र से तेरी, जो हाल अपना अयां तो कुछ हो

करें तगाफुल पे जत्न ऐसे, तो वस्ल में क्या न वो करेंगे
मेरी तरह जो ये खुश खयाली तुझे भी हो मेरी जां तो कुछ हो

है साकी का ग़ैर से भी वादा,हमें तलब आज कुछ ज्यादा
मेरी जुनूं-खेज तिशनगी का, हो और भी इम्तेहां तो कुछ हो

क्यूं इश्क से तो यूं बे-असर है, कि हव्वा जैसी ही बे-खबर है
वो खुल्द का फल, किसी तरह गर चखे जो तेरी जुबां तो कुछ हो

शिकन का खंजर, तेरी जबीं से जिगर में मेरे उतर गया है
ये नर्म खंज़र जो खुदकुशी की कहे अगर दास्ताँ तो कुछ हो

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,

रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है
हो मेल दोनों का 'बे-तखल्लुस', बंधे नया इक समां तो कुछ हो

Friday, January 15, 2010

जाने कौन था..



जाने कौन था...

आज ऑफिस में आया तो सुबह ११ बजे के करीब देखा..के बाजू में जो शमशान घाट है..वहाँ पर एक अर्थी आई है..महज ६ लोग हैं लाने वाले..
चार कंधे पे उठाये हैं..और एक दो..राम नाम सत्य हैं कह रहे हैं...
बुझी बुझी सी आवाजों में....
इतनी बुझी ..मानो राम नाम के ही सत्य होने में सबसे बड़ा संदेह हो...

खैर...

करीब तीन-चार घंटे के बाद दो आदमी मेरे पास आये...बोले.." बाबूजी, ये जो लकडियाँ आपके ऑफिस में पड़ी हैं पैकिंग वाली...इनमें से कुछ हमें दे दोगे...?"

बकवास सा सवाल लगा पहले तो मुझे ..और मैंने जवाब भी बकवास सा ही दिया....

लेकिन इस सारी बकवास के बाद मालूम हुआ के जो लाश सुबह आई थी, वो अभी तक नहीं जल सकी है..गीली लकड़ियों के कारण...
बड़ी हैरानी हुयी मुझे...
अरे.....!!!
आप लोग सुबह वाले ही हैं...?
अभी तक इधर ही हैं. ...!!

ले जाइए जितनी लकडियाँ भी चाहियें....ये तो ...आपने पहले ही बोलना था.....

और वो दोनों वूडन क्रेट वाली सूखी लकडियाँ लेकर शुक्रिया अदा करते हुए चले गए...

उनके जाने के कुछ देर बाद ही लगने लगा के जैसे मुझे भी वहाँ पर जाना चाहिए..
हाँ ..ना..हाँ..ना....

सोचते सोचते बस...उधर को चल ही पडा.....
ये लोग फिर से अर्थी को आग देने की नाकाम कोशिश कर रहे थे....
पता लगा के ५ लीटर पेट्रोल भी डाल चुके हैं इस काम के लिए....
जाने क्या हुआ.....मैंने एक सूखी जलती हुई लकड़ी हाथ में ली...और बढ़ा दी चिता की तरफ....

चिता ने भी उसी वक़्त आग पकड़ ली....मेरे साथ साथ वो लोग भी हैरान थे...
एक दो आवाज आयीं..''भाई साहब, शायद आपकी ही इन्तजार थी इन्हें..."


लकडियाँ वाकई में गीली थीं....

मैंने जेब से १०० रूपये निकाले और अपने एक आदमी से कहा के भागकर इसकी चीनी ले आ....

चीनी आई और मैंने पूरी चिता पर बिखेर दी...

चिता अब और ठीक से जलने लगी थी...
सब कुछ ठीक ठाक जानकर मैं वापिस आफिस में आया और अपने काम में लग गया...

करीब दो -तीन घंटे के बाद . ...एक आदमी ऑफिस में आया..और बोला...

बाबूजी,
थोड़ा सा पानी भी मिलेगा......?

मैंने कहा के हाँ, किसलिए चाहिए....???

तो उसने बताया के चिता पूरी जल चुकी है.....अब चलते वक़्त उस पर छींटा देना है...
मैंने पानी की बाल्टी का इंतज़ाम किया...दिवार पर टंगे छोटे से मंदिर से उठवाकर उस में गंगाजल भी मिलाया....
जब वो उठा कर चलने लगा
तो मैंने दोबारा पूछ लिया...क्या सचमुच चिता पूरी तरह से जल चुकी है.....???

जवाब आया.....
'' हाँ, बाबूजी, शायद इसे आपके हाथ से ही जलना था...अब तो पूरा जल चुका है....."

मैंने कहा....''चलो जी...शुक्र भगवान् का....हो गया ना....?''
जवाब में उसने हाथ जोड़ लिए..


यकीन कीजिएगा.......

उस के बाल्टी उठा कर चलने के बाद..जाने मुझे क्यूँ लगा...के लाश का बाँया पाँव अभी भी कच्चा है...
माना के मैंने सारी हालत की जानकारी ले ली थी....ये भी पता था के वहाँ पर एक दो ऐसे भी हैं जो कहते हैं के हमें क्रिया कर्म के बारे में सब पता है...
और इस ने भी तो धन्यवाद सहित कह दिया था .....
के चिता जल चुकी है पूरी तरह से...


लेकिन जाने क्या था....
के मैंने अपना काम फ़ौरन बंद किया...और जल्दी जल्दी चलकर उसके पीछे पीछे वहीँ जा पहुंचा....


मेरा ख़याल सही था....

बांये पाँव तक आग पहुंची ही नहीं थी.....

उन लोगों के छींटा देने से पहले ही मैं बोल पडा...की अभी रुको....
अभी नहीं जला है पूरा जिस्म.....!

फिर उन्होंने चेक किया....बांयें पाँव को आग की लपटों छू भी नहीं पायीं थीं....

मैं खामोश खडा देख रहा था...जाने क्या सोच रहा था....
शायद भगवान् से मांग रहा था मैं...के ये ना हो..कल सुबह इस बांये पाँव को इधर रहने वाले कुत्ते मुंह में दबाये घुमते नजर आयें....

वो सब लोग तब तक कई तरकीबें आजमा चुके थे...
पर सब नाकाम ही रहीं.....
अब सब लोग मुझे देखने लगे....मुझे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था के क्या करना चाहिए ऐसे में...???


मेरा पूरा ध्यान उसी में लगा हुआ था...
कभी भी वास्ता नहीं पडा था ऐसी स्थति से....जाने कितना सोचने के बाद....
मैंने चिता की तरफ बढ़कर एक लकड़ी उठायी...और उसका डायरेक्शन चेंज कर दिया.....एक दूसरी लकड़ी को उठाकर अलग तरह से रखा....
अब आग बांये पाँव की तरफ भी आने लगी...अब बाँया पाँव मेरी आंखों के सामने खुले में जल रहा था...मैंने जिंदगी में पहली बार ऐसा देखा ....

उसके बाद तो जैसे भुट्टे को आग पे भूनते हैं.....

जैसा के लोगों का मानना है....शमशान में जाकर कभी भी अलग से कोई वैराग का भाव मन में नहीं आता हमारे...जितना वैराग मन में है..उतना सदा ही है...
अभी भी उलझा हुआ हूँ कल वाली बात में...
वो आवाज अब भी कान में है....
'' भाई साहेब...शायद आपकी ही इंतज़ार थी इन्हें....."









Thursday, December 31, 2009

नए साल पर एक पुरानी ग़ज़ल डाल रहे हैं
आप सबको नया साल मुबारक हो


क्या अपने हाथ से निकली नज़र नहीं आती ?
ये नस्ल, कुछ तुझे बदली नज़र नहीं आती ?

किसी भी फूल पे तितली नज़र नहीं आती
हवा चमन की क्या बदली नज़र नहीं आती ?

ख़याल जलते हैं सेहरा की तपती रेतों पर
वो तेरी ज़ुल्फ़ की बदली नज़र नहीं आती

हज़ारों ख़्वाब लिपटते हैं निगाहों से मगर
ये तबीयत है कि बहली नज़र नहीं आती

न रात, रात के जैसी सियाह दिखती है
सहर भी, सहर-सी उजली नज़र नहीं आती

हमारी हार सियासत की मेहरबानी सही
ये तेरी जीत भी, असली नज़र नहीं आती

कहाँ गए वो, निशाने को नाज़ था जिनपे
कि अब तो आँख क्या, मछली नज़र नहीं आती

न जाने गुजरी हो क्या, उस जवां भिखारिन पर
कई दिनों से वो पगली, नज़र नहीं आती

Sunday, December 27, 2009

आज 28 दिसंबर है....दर्पण के ब्लॉग की सालगिरह

उस दिन फिर से उसके रूम में..खिड़की के पास रखी टेबल पर..जाना पहचाना सा तुड़ा मुडा कागज़ नजर आया....
और उस दिन फिर देख लिया उसे खोल कर.... प्राची के पार की शुरूआती पोस्ट थी वो...

मयकदे में जाते ही, इक कहानी हो गयी
कातिलाना शोखियाँ हैं, मय जवानी हो गयी....

नज्म उलझी होती थी उन दिनों उसकी....फिर पता ही नहीं चला के कब धीरे धीरे ...
हम...मुफलिस जी..मेजर साब.... और DWIJ भाई... अपने अपने ढंग से उसकी नज्मों को सुलझाने की कोशिश करते करते....इस भोली आँखों वाले बचवा के काफी करीब आ गए...आये तो और भी कई लोग थे उन दिनों....पर...जाने दीजिये...उन्हें शायद सिर्फ और सिर्फ गजल से वास्ता रहा होगा....!

तो मैं कह रहा था के उस दिन उस कागज़ को फिर से वहीँ पड़े देख के ख्याल आया...खुली खिड़की के आगे टेबल पे ये कागज़ अभी तक गुम क्यूँ नहीं हुआ...? इस रूम में क्या क्या नहीं गुम हो जाता...माचिसों के पूड़े के पूड़े गुम होते देखे हैं हमने...ढेरों डिब्बियों में से ढूंढना पड़ता है के किसमें सिगरेट है और किसमें सिर्फ राख.....!!

कितने लोग आते जाते हैं यहाँ पर...एकाध ऐसा भी जिसे इस कागज़ के पुर्जे से कोई वास्ता नहीं॥कोई लेना देना नहीं....

और वो नटखट संजू....!!!!!!!!!!!!!!!!हे राम....!क्या जाने कभी इसी नज्म का हवाई जहाज बना के गली में उड़ा दे तो.......!!!!!!!!!!!!!!

हालांकि हमारे रूम से भी काफी कुछ खो जाया करता है...पर उस वक़्त जाने क्या सोच कर हमने वो कागज़ सहेजा अपनी जेब में डाल लिया... एकदम अजीब सा...बेमतलब का कान्फिडेंस आ गया के शायद ये हमारे पास ज्यादा ठीक रहेगा...

आप भी पढ़ें...हमारे jhon के हाथ से लिखी उलझी नज्म...

मयकदे में जाते ही, इक कहानी हो गयी
कातिलाना शोखियाँ हैं, मय जवानी हो गयी

ढूंढूं तो ढूंढूं किसे इस शहरे-नामुराद में
याद में मेरी सुना है, वो दीवानी हो गयी

कहता हूँ आज लोगो, आपसे, ईमान से
ज़िन्दगी जीने में मुझसे, बेईमानी हो गयी

गम भी अब मिलते हैं मुझको, खुशियों के वर्क ओढ के
मौत तो मासूम है , ये जिंदगी सयानी हो गयी

आईने ने जब सुनाई उसको सच्ची दास्ताँ शर्म से
वो, आज फिर से, पानी पानी हो गयी

पी भी ले दो घूँट ''दर्शन'' उस खुदा का नाम ले.........

मक्ता कुछ साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा है ....बाकी सारी गजल ज्यूँ की त्यूँ उतार दी है कागज़ से पढ़कर....बिना कोई करेक्शन किये.......किसी का दिल चाहे तो करेक्शन कर सकता है...हम नहीं करेंगे..... हमें अपने ब्लॉग की सालगिरह का पता ही नहीं चला के कब आई और कब गयी.....पिछले महीने थी नवम्बर में...दिन याद नहीं है....

पर आज 28 दिसंबर है....दर्पण के ब्लॉग की सालगिरह....... दिल किया के अपने ब्लॉग पे ही मना लूं ये दिन.... :)

Sunday, December 13, 2009

मटमैले लबादे वाला सान्ताक्लोज़




आज ऑफिस से ही उमा को फोन कर दिया है हमेशा की तरह| पुरानी हिदायतें जो बरसों से दोहराता आ रहा हूँ, फिर समझा दी हैं के बच्चों की जुराबें खूब अच्छे से धोकर जैसे भी हो रात तक सुखा ले| टॉफी-चाकलेट वगैरह मैं ख़ुद ही लेता आऊंगा| आज क्रिसमस है ना? उनके बहुत छुटपन से ही सांताक्लोज़ के नाम से और बहुत से पिताओं की तरह मैं भी उनकी मासूम कल्पना को उड़ान देता रहा हूँ| सुबह दोनों पूछते है आपस में एक दूसरे से कि क्या रात को उसने किसी सान्ताक्लोज जैसी चीज का घर में आना महसूस किया था या नहीं| पर हमेशा की तरह किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते और अपनी अपनी चाकलेट और टॉफी खाने जुट जाते हैं बगैर पेस्ट किए| कभी भी तो ये सोचना नहीं चाहते के रात को थका-हारा इनका बाप ही ये सब अपने मटमैले से लबादे में से निकाल कर ठूंसता होगा उस दिन की स्पेशल से धुली जुराबों में| इनकी कल्पना में तो आज भी वो ही सुर्ख लाल लबादे वाला सांता क्लॉज बसा है| पहले तो हम भी इस बैठक में शामिल होते थे, इनकी कल्पनाओं में अपने भी रंग भरने के लिए ....हाँ रात को कुछ आवाज सी सुनी तो थी पर दिखा कुछ नहीं था, सांता क्लोज ही रहा होगा और भला इत्ती रात में कौन आएगा तुम लोगों के लिए ये गिफ्ट लेकर| पर अब भीतर उदासीनता सी हो गयी है इस ड्रामे के प्रति| अब ये बचपना ही चिंता का कारण हो गया है| आख़िर आठवीं-दसवीं क्लास के बच्चों का सान्ताक्लोज से क्या काम| क्या अब इन्हें थोड़ा समझदार नहीं हो जाना चाहिए? टॉफी-चाकलेट तो यूँ भी खाते रहते हैं पर क्या आज के दिन ये उतावलापन शोभा देता है इतने बड़े बच्चों को? जीवन की बाकी सच्चाइयों को किस उमर में जानना शुरू करेंगे फिर| अब तो ध्यान जब तब इनके साथ के और बच्चों पर जाने लगा है| अकल भी अब मसरूफ रहती है जिस्मानी उठान और समझ के बीच ताल मेल बैठाने में| कभी इनके स्कूल का कोई और बच्चा घर आ जाता है तो आँखें ख्यालों के साथ मिलकर उसकी समझदानी का साइज़ समझने बैठ जाती है| पता नहीं स्कूल में ये लोग सांताक्लाज के बारे कोई बात करते हैं या नहीं? हो सकता है के इन दिनों पड़ रही छुट्टियों के कारण इस विषय पर चर्चा न हो पाती हो ...वरना इतने बड़े बच्चे और ऐसी बचकानी..| कई बार चाहा है के ख़ुद ही इन्हें रूबरू करा दूँ सच्चाई से पर जाने क्यूं ये भरम इस तरह नहीं तोड़ना चाहता| इनके विकास को लेकर मन का ज्वार-भाटा बढ़ता ही जाता है| अखबारों में निगाहें अब बाल-मनोचिकित्सकों के लेख ही तलाशती रहती हैं| आई क्यू., ई क्यू. ऐसे 'क्यूं' वैसे 'क्यूँ' कुछ समझ नहीं पाता| कद के साथ बढ़ता बचपना दो तीन साल से हताशा को और बढ़ा ही रहा है| कई बार ख़ुद को दोषी पाता हूँ कि शायद मैं ही स्वार्थवश बाल्यावस्था को समुचित रूप से....| हमेशा जुराबों से चाकलेट निकालते समय मेरी आँखें इनके चेहरे पर गड़ी होती हैं, बस एक नज़र इनकी बेएतबारी की दिख जाए तो कुछ सुकून मिले, कभी तो एहसास कराएँ मुझे बड़े होने का| कैसे जानें के मटमैले लबादे वाला इनका सांताक्लाज अब कैसा बेसब्र है इनकी उम्र का भेद जानने को|

आज तो आफिस में ही काफ़ी देर हो गयी है| बाहर आया तो देखा के बाज़ार भी बंद हो चला है| इलाके की बत्ती भी जाने कब से गुल है| चाल काफ़ी तेज हो चली है, निगाहें तेजी से दायें-बाएँ किसी खुली दूकान को तलाश रही हैं....दिल बैठ रहा है ..अब कि शायद आँगन में टंगी चक-दक धुली सफ़ेद जुराबें बस टंगी ही रह जायेंगी...क्या ऐसे टूटेगा मासूमों का भरम ...क्या गुजरेगी बेचारों पर...? बेबस सा आख़िर में आफिस के उस अर्जेंट काम को ही कोसने लगा हूँ| इसके अलावा और कर भी क्या सकता है एक मटमैले लबादे वाला| सुबह उसे एक अलग ही रूप लिए जगना होगा अब की बार| मन के भीतर किसी छोटे से कोने मैं इसकी भी रिहर्सल चल रही है| इन सब के बीच नज़र में किसी थकी हुई सी लालटेन की धुंधलाती रौशनी आ गयी है| मुझ से भी ज्यादा थका सा लग रहा कोई दूकानदार अपनी दूकान बढ़ाने को तैयार है शायद "ज़रा एक मिनट ठहरो......!!" कहता हुआ थका हारा सान्ताक्लोज दौड़ पडा है इस आखिरी उम्मीद की तरफ़| इसी उम्मीद से तो बच्चों का वो भरम बरकरार रह सकता है जिसे वो कब से तोड़ना चाहता है| जल्दी से जेब से पैसे निकाले और उखड़ी साँसों पे लगाम लगाते हुए दोनों बच्चों के फेवरिट ब्रांड याद करके बता दिए हैं| दूकानदार किलसने के बजाय खुश है| और एक वो है के आफिस से निकलते-निकलते एक अर्जेंट काम के आने पे कितना खीझ रहा था| बमुश्किल दस-पन्द्रह कदम दौड़ने पर ही साँसें कैसी उखड़ चली हैं| दुकानदार ने सामान निकाल कर काउंटर पर सजा दिया है| चॉकलेट के गोल्डन कलर के रैपर कुछ ज़्यादा ही पीलापन लिए चमक रहे हैं| शायद लालटेन की रौशनी की इन्हें भी मेरी तरह आदत नहीं है| मैंने सामान उठा कर लबादे में छुपाया और घर की तरफ़ बढ़ गया| तेज़ रफ़्तार चाल अब बेफिक्र सी चहल कदमी में तब्दील हो गई है| अब कोई ज़ल्दी नहीं है बल्कि अच्छा है कि बच्चे सोये हुए ही मिलें|
मेरा अंदाज़ा सही निकला | दोनों बच्चे नींद की गहरी आगोश में सोये हैं.....एकदम निश्छल, शांत....दीन-दुनिया से बेफिक्र| मैं और उमा खुले आँगन में आ गए हैं, बाहर से कमरे की चिटकनी लगा दी है ताकि किसी बच्चे की आँख खुल भी जाए तो हमारी इस चोरी का पता न चल सके| मोमबत्ती जला कर हमने धुली जुराबों में बच्चों की पसंद के अनुसार सौगातें जचा-जचा कर रखना शुरू किया| जुराबों में हल्का सीलापन अब भी है जो की रात भर आँगन में टंगे-टंगे और बढ़ जाएगा मगर रैपर बंद चीज़ों का क्या बिगड़ता है|
सुबह आँखें लगभग पूरे परिवार की एक साथ ही खुली| दोनों बच्चों ने भरपूर उतावलेपन से अपनी-अपनी रजाइयां फेंक दी और कुण्डी खोल के खुले आँगन में लपक लिए बगैर जाड़े की परवाह किए| दोनों जोशीले तार में लटकी-उलझी अपनी-अपनी जुराबें खींच रहे हैं भले ही उधडती-फटती रहें, उनकी बला से| उन्हें क्या फर्क पड़ता है| उन्हें तो बस सांताक्लोज के तोहफों से मतलब है हमेशा की तरह| बेकरारी पूरे शबाब पर है .....चक-दक जुराबों में तले तक पैबस्त उपहारों को उंगलिया सरका सरका के पट्टीदार दहानों से उगलवाया जा रहा है| सान्ताक्लोज की नेमतें सोफे पर टपक रही हैं मगर आज बच्चे इन्हें अजीब सी नज़रों से देख रहे हैं| जाने उपहारों में आज ऐसा क्या खुल गया है कि इनके चेहरे पर उत्साह के रंग मायूसी में बदल गए| सबसे पहले तो ज़रूरत से ज्यादा पीलापन लिए गोल्डन कलर की जांच हुई और फिर पारखी नजरें प्रोडक्ट की स्पेलिंग चेक करती हुई नीचे लिखा अस्पष्ट मैनुफक्चारिंग एड्रेस समझने लगीं| मेरे कुछ समझ पाने से पहले ही दोनों अपनी अजीब सी शक्लें बनाते हुए और भी ज्यादा बचपने में भर गए ........

"पापू....!! ये क्या ले आए......?...डुप्लीकेट है सारा कुछ..!! ये टॉफी भी ...."
"हाँ .. पापू..! मेरे वाला भी बेकार है एकदम से ...!!"
"आप भी ज्यादा ही सीधे हो ..बस..कोई भी आपको बेवकूफ बना दे...हाँ नहीं तो .."
"आज के बाद उस दूकान पे आप ...!!!!"

बच्चे अचानक संभल गए| गोल-गोल आँखें मटकाती दो शक्लें, दांतों के तले दबी जीभ.. | इस अचानक की पर्दाफाशी से मैं भी हैरान हूँ | दोनों दबी-दबी मुस्कान लिए, मुझसे आँखें बचाते हुए अपनी-अपनी चाकलेट का ज़रूरत से ज्यादा पीला रैपर उतार रहे हैं| एक बार फिर नजरें उठ कर मिली हैं और अब कमरे में ठहाके फूट चले हैं....बच्चों के मस्ती भरे और हमारे छलछलाई आंखों से..!!
बच्चे अभी छोटे हैं शायद ..हमारा ये भरम टूट चुका है..बिलंग्नी पर टंगे मटमैले लबादे से कहीं कोई सुर्ख लाल रंग भी झांकता दिख रहा है..|

Saturday, November 21, 2009

कितनी बार...

अक्सर ही होता है ऐसा....
फोन पे उसे हमेशा ही परेशान पाया है मैंने....
कहाँ गयी....?
अभी तो यहीं थी....!!!!!!!
मधुर.... तूने देखी है...?
देख तो तूने कही रखी होगी....!
अरे , भाई साहिब आपके पास माचिस है...?
नहीं...?
रिक्शे वाले भैया , माचिस है....?????????

और मैं मोबाइल फोन कान से लगाए चुप चाप होल्ड पे रह कर उसे तडपते देखता हूँ....और उसके साथ खुद भी तडपने लग जाता हूँ....
मेरी दोनों जेबों में माचिस है....एक सामने टेबिल पे पड़ी है...दो चार और इधर उधर बिखरी होंगी...!!!!
लेकिन उसे बस इस वक्त एक तिल्ली की जरूरत है...!
उसे क्या फायदा है मेरा दिल्ली में रहने का...?
जब के वो एक तिल्ली के लिए यूं आदमी आदमी को पूछता फिरे...???

शायद मिल गयी है उसे...
हाँ मनु जी,
अब बताइये ....कुछ नवीईईईन ........?????
( नवीईईन बोले तो....नवीन......)

मेरी भी रुकी सांस उसकी सिगरेट जलते ही खुद बा खुद चलने लगती है.....पहले जेबों में हाथ लगा कर माचिस को छूता हूँ..फिर सामने टेबल पर पड़ी माचिस को देखने लगता हूँ......चलो शुक्र है मिल गयी...

कल दिन दहाड़े यही काम मेरे साथ हो गया...पता नहीं कहाँ गिरी ..क्या हुआ....
लेकिन कल जब मुंह में सिगरेट रखी तो पाया के पास में माचिस है ही नहीं..जल्दी से सारी जेबें टटोल डालीं...तेज तेज क़दमों से पूरा ऑफिस नाप दिया...फिर बस.... लगा जैसे मैं दर्पण हो गया....
अरे माचिस है किसी के पास ...?
है क्या...?
है क्याआआआ.........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


पास खडा एक ड्राइवर अपनी जेब से माचिस निकाल कर मेरी तरफ उछाल देता है...और मैं आसानी से कैच कर लेता हूँ...यूं अक्सर मुझ से चीजें छूट जाया करती हैं...!
अब जल्दी से तिल्ली जलाई और मुंह की तरफ बढ़ा दी...होंठ ...नाक अब झुलस गया ...नहीं झुलसी तो बस वो कमबख्त आखिरी सिगरेट ............जो इस हडबडाहट में जाने कहाँ गिर गयी थी...?

जाने दो ...कोई टेंशन नहीं...बाद की बात है...

अभी तो मैंने एक बीडी मुंह में दबाई और दूसरी तिल्ली से सुलगा ली....
इसने बस बीडी ही सुलगाई...और कुछ नहीं....

अब मैं इत्मीनान से पेड़ के निचे कुर्सी डाल कर बैठा सोच रहा हूँ......
उसका मुंह आये दिन कितनी बार जलता होगा

Thursday, November 12, 2009

गजल...

नहीं हो रही है....
जब गजल की मर्जी होती तो ही होती है.....

हमारी मर्जी से कब हुई है ग़ज़ल......?

दिवाली का दिन.....
दर्पण मेरे घर के रास्ते में रिक्शा पे सवार बैठा था...बड़ी भीड़ थी उस मेले में..... पता लगा के लोग उसे ठेल रहे हैं ... और वो अडा हुआ है...
पटरी वाले.. दूकानदार...सिपाही....ट्रेफिक वाले.......
और आजू बाजू से गुजरते लोग....!

सभी तो मिल कर धकिया रहे थे गरीब को.......

उस को भी जाने क्या सूझ गयी.......

बोला........ अभी मेरी वाइफ आ रही है... बस ..ज़रा शौपिंग करने गयी है....

बस.....!!!
फिर क्या था....?
सारे जुल्मो-सितम थम गए

अब इत्ता चिकना छोकरा है...तो उसकी वाइफ कैसी होगी......?????????

????????????????????????
???????


रिक्शा ...वहीँ रुका रहा...दर्पण को लिए....
आने-जाने वाले भी,
पटरी वाले भी ...और सब दूकानदार भी......

एक टक...!!!!!!!

घूरते रहे खाली खाली रिक्शे में बैठे दर्पण को.....
हाँ जी,
वो सिपाही भी......
हा हा हा हा हा .....( ठरकी .............)

कुछ देर बाद वहाँ पर हम प्रगट हुए....

हारे थके....
टमाटर-खीरे-प्याज
हरी मिर्ची.....

एक पोलीथिन में समेटे हुए ... ( एकदम नार्मल से...)

और सब कुछ ले जाकर दर्पण के बराबर में जा धंसे............
और रिक्शा वाले को कहा ..... चल भाई, अब चल जल्दी से.....!


पटरी वाले ने अपने मुंह से तुंरत नेवला छाप की पिचकारी सड़क पे छोड़ दी,
दूकानदार ...खिसिया कर अपने ग्राहकों को पटाने में लग गए....

और सिपहिया बाबू.....???

हमारे रिक्शा में धंसते ही पिछले टायर पर उनके डंडे की सारी खुंदक निकल गई...

आजू बाजू में ठिठके लोग...
बेचारे,,,,,,!!!!!!

''अपना-सा'' मुंह लेकर .........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!



एक शे'र याद आ गया.... फैज अहमद फैज का.....

वो तो वो है तुम्हे हो जायेगी उल्फत मुझ से
इक नजर तुम मेरा महबूबे-नज़र तो देखो......

Monday, November 2, 2009



एम.एफ। और एफ एम। दो ऐसे शब्द जिन से जब तब मुलाकात हो जाती है। एक एम एफ तो बहुतेरे लोगों के गले ही नहीं उतरता यानी अपना एम एफ हुसैन ! और एक एफ.एम.के बगैर बहुतेरों को दुनिया ही सूनी लगती है यानी एफ.एम.रेडियो! अपना मिजाज़ काफी लोगों से अक्सर मेल नहीं खाता। एम.एफ.बेचारे में तो अपने को ऐसी कोई ख़ास कमी नहीं लगती जिस के चलते इतना बवाल होता है। और आप भी सोच कर देखें ...कुछ ज़्यादा ही नहीं हो जाता भले आदमी के साथ..? और अब ज़रा एफ.एम.महोदय की भी सुध लें.... कितने ही लोग हैं जिनकी सुबह एफ.एम.के किसी न किसी चैनल से होती है जो अक्सर देर रात तक तारी रहता है। एफ.एम.गोल्ड की बात छोड़ दें तो ज्यादातर के साथ मेरा तज़ुर्बा कड़वा ही रहा है। हालांकि मैं चाह कर भी एफ.एम.नहीं सुन पाता लेकिन जब कभी भी न चाहते हुए भी सुना है तो मेरी चाहत ने इससे तौबा ही की है। गीत की पसंद की तो बात करना बेमानी होगा क्योंकि वो तो सब मुट्ठी भर लोगों की मर्ज़ी से ही बजते बनते हैं। हाँ !जब मुसलसल सुनते सुनते कान पक जाते हैं और मजबूरन इनके आदी जाते हैं तो मेरे जैसे बाकी बेबस श्रोताओं की तरह मुझे भी इनकी सुपर-डूपेर्टी कबूलनी पड़ती है। ये तो बात हुई संगीत माफिया की या कह लें के पूँजीवाद की जिनका के एक निरीह श्रोता कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इन उदघोषकों से अवश्य ही प्रार्थना करना चाहूँगा के कम से कम आप लोग अर्थपूर्ण गीत न बजाया किजीये। गलती से आ गयी फरमाइश पे भी नहीं!इनका बड़ा अनर्थ होता है।कोई भी गंभीरता से संगीतबद्द किया गीत सुनने के फ़ौरन बाद आर.जे.की बेसिर पैर की उन्मुक्त चटर पटर तमाचे जैसी लगती है। जैसे "बिछडे सभी बारी बारी....!" चल रहा है और आधे अधूरे रफी साहब को एन बीच में घोटकर पूरी मस्ती में चहकना 'ओ.के.फ्रेंड्स !ये साहब तो बिछड़ गए हैं अब आपके साथ है वैरी वैरी होट.......!!!!!!!!! भगवान् के लिए ऐसे ही गीत बजाएं जो आपके माहौल को सूट करें। अच्छे संगीत के मर्म की समझ जो आकाशवाणी के उदघोषकों को थी उसका तो अब एकदम अकाल है। ग़ालिब का शेर याद आ रहा है ....
"अब है इस मामूर में कहते-गम-ऐ-उल्फत असद,
हमने माना के रहे दिल्ली में पर खाएँगे क्या?"

Friday, October 16, 2009

इतना नंगा आदमी (लघुकथा)

पिछले साल हिंद युग्म पर एक छोटी सी कहानी जैसी छपी थी...
फिलहाल वही डाल रहा हूँ....

काफी दिन से कुछ नहीं पोस्ट हुआ ना...?



आज और दिनों की अपेक्षा मुख्य मार्ग वाले बाज़ार में कुछ ज्यादा ही भीड़ भड़क्का है | कुछ वार त्योहारों का सीज़न और कुछ साप्ताहिक सोम बाज़ार की वजह से | भीड़ में घिच -पिच के चलते हुए ऐसा लग रहा है जैसे किसी मशहूर मन्दिर में दर्शन के लिए लाइन में चल रहे हों | इतनी मंदी के दौर में भी हर कोई बेहिसाब खरीदारी को तत्पर | सड़क के दोनों तरफ़ बाज़ार लगा है | अजमल खान रोड पर मैं जैसे-तैसे धकेलता-धकियाता सरक रहा हूँ | भीड़ में चलना मुझे सदा से असुविधाजनक लगता है, पर क्या करें, मज़बूरी है | अचानक कुछ आगे खाली सी जगह दिख पड़ी | चार-छः कदम दूर पर एक पागल कहीं से भीड़ में आ घुसा है | एकदम नंग-धड़ंग, काला कलूटा, सूगला सा | साँसों में सड़ांध के डेरे, मुंह पर भिनकती मक्खियाँ, सिर में काटती जूएँ | इसीलिए यहाँ कुछ स्पेस दिख रहा है | अति सभ्य भीड़ इस अति विशिष्ट नागरिक से छिटककर कुछ दूर-दूर चल रही है |
पर मैं समय की नजाकत को समझते हुए उस पागल की ओर लपका और साथ हो लिया | हाँ! अब ठीक है | उसका उघड़ा तन मुझे शेषनाग की तरह सुरक्षित छाया प्रदान कर रहा है | मैं पूर्णतः आश्वस्त हूँ | हाँ! इतना नंगा आदमी कम से कम मानव बम तो नहीं हो सकता......|

Dhyaan seDekho di....
Kiska Comment Pehla hai?

Tuesday, September 22, 2009

दास्ताँ-ए-इश्क को बस मेरा अफ़साना कहें
इस तरह सब इश्क से क्यूं खुद को बेगाना कहें

अक्स उनका,चाह उनकी,दर्द उनके, उनका दिल,
दिल में हो जिसके उसे सब, क्यों न दीवाना कहें

जाम आखिर जाम की सूरत कभी तो चाहिए
कब तलक तेरी हसीं आँखों को, मयखाना कहें

साथ जीने की ही जब उम्मीद तक बाकी नहीं
तेरे बिन जीने को फिर हम,क्यों न मर जाना कहें.

"बे-तखल्लुस" ये जहां वाले भला समझेंगे क्या.?
जां का जाना है, जिसे सब दिल का आ जाना कहें।

Thursday, August 20, 2009

वैसे तो मतले कहाँ बनते हैं ,,,,
पता नहीं क्या हुआ के मतला ही बन के रह गया.....
बस ....
छाप ही दिया ...
कब से कुछ नहीं लिखा था...



कुछ न ईमां पर कहें , जो साहिबे-ईमां नहीं
लफ्ज़ आसां है मगर ये इतना भी आसां नहीं

क्यूं ख़याल अपने हों, फैज़-औ-मीर-ग़ालिब से जुदा
या तो वो कुछ और थे, और या हमीं इन्सां नहीं.

Sunday, August 2, 2009

hind-yugm se...........


शामे-तन्हाई में क्या-क्या कहर बरपाता है दिल
क्या-क्या कह जाता है जब कहने पे आ जाता है दिल

फिक्र में डूबे सफे जब दर्द से हों रूबरू
इक ग़ज़ल उम्मीद की हौले से लिख जाता है दिल

चुगलियाँ रंगीन प्याले की, सुराही के गिले
दोनों की सुनता है और दोनों को समझाता है दिल

चुप लगाकर धड़कनें और गुनगुना कर खामुशी
सुनती हैं तकरीरे-उल्फत, और फरमाता है दिल

खुश ख्यालों से घनेरी चांदनी की जुल्फ को
आप उलझा हो वले, पर हंस के सुलझाता है दिल

जब वो तेरे हैं तो फिर क्या दूरियां-नजदीकियां
जिंदगी को और कभी यूं खुद को बहलाता है दिल

Thursday, July 16, 2009

DARPAN.....!

अभी पिछले दिनों की तो बात ही है....
एक सवाल .....
किया था तुमने मुझ से...

तुम कितना बेजार थे उस दिन....!

कितनी उम्मीद थी ....
आवाज़ में तुम्हारी.. ...
और..
सवाल में तुम्हारे....
कितनी बेचारगी ....!

और मैंने भी समझा था तुम्हारी पीडा को..
जाना था हाल....
तुम्हारे भीतर का.....
हाँ...बेशक...
या.
शायद.......!!!!!!
उस दिन..एकाएक मैं, मैं से उठकर....मैं से थोडा आगे बढ़कर...
कोई सुकरात..या
शायद..
कोई अरस्तू हो गया था मैं..

क्या गफलत थी उस ऊंचाई की...
मैंने चुटकी में सुलझा डाला था ..तुम्हारा हर सवाल.....

कितने लाजवाब हो गए थे तुम भी....
या
शायद ज्ञानी.....................
जैसे जान गए हो स्रष्टी का हर भेद...
हर तौर-तरीका...ब्रह्माड का..
पूरी कायनात का..............
तुम्हे उस हाल में देख ...
मैं अपने मैं से कितना और ऊपर उठ गया था...
नहीं.....?????
ह्म्म्म्म्म


क्या यार...
एकदम वही सवाल तो लादे
खडा हूँ मैं आज...
ठीक तुम्हारे ही सामने...

क्या तुम भी मुझे वैसे ही बहला दोगे....
या बनोगे मेरे .....

सच्चे अरस्तू....!!!!