बे-तख़ल्लुस
manu

Saturday, April 10, 2010
लॉन्ग-ड्राइव
Sunday, March 21, 2010
मौत.....संशोधित पोस्ट...
Monday, March 15, 2010
एक पोस्ट अभी डाली.
Monday, March 8, 2010
रंग
कल आफिस में लंच करते समय उन्होंने कहा था.........
"मनु यार कम से कम हाथ तो धो ले।"
"धुले तो हैं " मैंने कहा पर उँगलियों पर हल्का गुलाबी रंग, और कहीं एक शोख आसमानी रंग नज़र आ रहा था
"तो ये क्या है....?"
"ये तो रंग हैं ,हाथ तो धो चुका हूँ पर ये नहीं छूट रहे.....आप ही बताओ क्या करुँ "
"दुबारा हाथ गीले कर के स्लैब के उलटी तरफ़ खुरदरी जगह पर जोर से रगड़ ले, सब छूट जाएगा "
मैंने उनके कहे पर अमल करना शुरू किया........पर जाने क्यूं इन शोख रंगों को जोर से रगड़ने की हिम्मत हाथों को ना हुई,
""जी शायद मैं ही नहीं चाहता,
Saturday, March 6, 2010
कुछ ख़ास नहीं है कहने को...
Sunday, February 28, 2010
ताज़ा ग़ज़ल
Wednesday, February 10, 2010
एक और पुरानी ग़ज़ल...
जो लोग कहते हैं, वो लगावट, हो अपने भी दरमियां तो कुछ हो
Friday, January 15, 2010
जाने कौन था..
जाने कौन था...
Thursday, December 31, 2009
ये नस्ल, कुछ तुझे बदली नज़र नहीं आती ?
किसी भी फूल पे तितली नज़र नहीं आती
हवा चमन की क्या बदली नज़र नहीं आती ?
ख़याल जलते हैं सेहरा की तपती रेतों पर
वो तेरी ज़ुल्फ़ की बदली नज़र नहीं आती
हज़ारों ख़्वाब लिपटते हैं निगाहों से मगर
ये तबीयत है कि बहली नज़र नहीं आती
न रात, रात के जैसी सियाह दिखती है
सहर भी, सहर-सी उजली नज़र नहीं आती
हमारी हार सियासत की मेहरबानी सही
ये तेरी जीत भी, असली नज़र नहीं आती
कहाँ गए वो, निशाने को नाज़ था जिनपे
कि अब तो आँख क्या, मछली नज़र नहीं आती
न जाने गुजरी हो क्या, उस जवां भिखारिन पर
कई दिनों से वो पगली, नज़र नहीं आती
Sunday, December 27, 2009
आज 28 दिसंबर है....दर्पण के ब्लॉग की सालगिरह
उस दिन फिर से उसके रूम में..खिड़की के पास रखी टेबल पर..जाना पहचाना सा तुड़ा मुडा कागज़ नजर आया....
और उस दिन फिर देख लिया उसे खोल कर.... प्राची के पार की शुरूआती पोस्ट थी वो...
मयकदे में जाते ही, इक कहानी हो गयी
कातिलाना शोखियाँ हैं, मय जवानी हो गयी....
नज्म उलझी होती थी उन दिनों उसकी....फिर पता ही नहीं चला के कब धीरे धीरे ...
हम...मुफलिस जी..मेजर साब.... और DWIJ भाई... अपने अपने ढंग से उसकी नज्मों को सुलझाने की कोशिश करते करते....इस भोली आँखों वाले बचवा के काफी करीब आ गए...आये तो और भी कई लोग थे उन दिनों....पर...जाने दीजिये...उन्हें शायद सिर्फ और सिर्फ गजल से वास्ता रहा होगा....!
तो मैं कह रहा था के उस दिन उस कागज़ को फिर से वहीँ पड़े देख के ख्याल आया...खुली खिड़की के आगे टेबल पे ये कागज़ अभी तक गुम क्यूँ नहीं हुआ...? इस रूम में क्या क्या नहीं गुम हो जाता...माचिसों के पूड़े के पूड़े गुम होते देखे हैं हमने...ढेरों डिब्बियों में से ढूंढना पड़ता है के किसमें सिगरेट है और किसमें सिर्फ राख.....!!
कितने लोग आते जाते हैं यहाँ पर...एकाध ऐसा भी जिसे इस कागज़ के पुर्जे से कोई वास्ता नहीं॥कोई लेना देना नहीं....
और वो नटखट संजू....!!!!!!!!!!!!!!!!हे राम....!क्या जाने कभी इसी नज्म का हवाई जहाज बना के गली में उड़ा दे तो.......!!!!!!!!!!!!!!
हालांकि हमारे रूम से भी काफी कुछ खो जाया करता है...पर उस वक़्त जाने क्या सोच कर हमने वो कागज़ सहेजा अपनी जेब में डाल लिया... एकदम अजीब सा...बेमतलब का कान्फिडेंस आ गया के शायद ये हमारे पास ज्यादा ठीक रहेगा...
आप भी पढ़ें...हमारे jhon के हाथ से लिखी उलझी नज्म...
मयकदे में जाते ही, इक कहानी हो गयी
कातिलाना शोखियाँ हैं, मय जवानी हो गयी
ढूंढूं तो ढूंढूं किसे इस शहरे-नामुराद में
याद में मेरी सुना है, वो दीवानी हो गयी
कहता हूँ आज लोगो, आपसे, ईमान से
ज़िन्दगी जीने में मुझसे, बेईमानी हो गयी
गम भी अब मिलते हैं मुझको, खुशियों के वर्क ओढ के
मौत तो मासूम है , ये जिंदगी सयानी हो गयी
आईने ने जब सुनाई उसको सच्ची दास्ताँ शर्म से
वो, आज फिर से, पानी पानी हो गयी
पी भी ले दो घूँट ''दर्शन'' उस खुदा का नाम ले.........
मक्ता कुछ साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा है ....बाकी सारी गजल ज्यूँ की त्यूँ उतार दी है कागज़ से पढ़कर....बिना कोई करेक्शन किये.......किसी का दिल चाहे तो करेक्शन कर सकता है...हम नहीं करेंगे..... हमें अपने ब्लॉग की सालगिरह का पता ही नहीं चला के कब आई और कब गयी.....पिछले महीने थी नवम्बर में...दिन याद नहीं है....
पर आज 28 दिसंबर है....दर्पण के ब्लॉग की सालगिरह....... दिल किया के अपने ब्लॉग पे ही मना लूं ये दिन.... :)
Sunday, December 13, 2009
मटमैले लबादे वाला सान्ताक्लोज़

आज ऑफिस से ही उमा को फोन कर दिया है हमेशा की तरह| पुरानी हिदायतें जो बरसों से दोहराता आ रहा हूँ, फिर समझा दी हैं के बच्चों की जुराबें खूब अच्छे से धोकर जैसे भी हो रात तक सुखा ले| टॉफी-चाकलेट वगैरह मैं ख़ुद ही लेता आऊंगा| आज क्रिसमस है ना? उनके बहुत छुटपन से ही सांताक्लोज़ के नाम से और बहुत से पिताओं की तरह मैं भी उनकी मासूम कल्पना को उड़ान देता रहा हूँ| सुबह दोनों पूछते है आपस में एक दूसरे से कि क्या रात को उसने किसी सान्ताक्लोज जैसी चीज का घर में आना महसूस किया था या नहीं| पर हमेशा की तरह किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते और अपनी अपनी चाकलेट और टॉफी खाने जुट जाते हैं बगैर पेस्ट किए| कभी भी तो ये सोचना नहीं चाहते के रात को थका-हारा इनका बाप ही ये सब अपने मटमैले से लबादे में से निकाल कर ठूंसता होगा उस दिन की स्पेशल से धुली जुराबों में| इनकी कल्पना में तो आज भी वो ही सुर्ख लाल लबादे वाला सांता क्लॉज बसा है| पहले तो हम भी इस बैठक में शामिल होते थे, इनकी कल्पनाओं में अपने भी रंग भरने के लिए ....हाँ रात को कुछ आवाज सी सुनी तो थी पर दिखा कुछ नहीं था, सांता क्लोज ही रहा होगा और भला इत्ती रात में कौन आएगा तुम लोगों के लिए ये गिफ्ट लेकर| पर अब भीतर उदासीनता सी हो गयी है इस ड्रामे के प्रति| अब ये बचपना ही चिंता का कारण हो गया है| आख़िर आठवीं-दसवीं क्लास के बच्चों का सान्ताक्लोज से क्या काम| क्या अब इन्हें थोड़ा समझदार नहीं हो जाना चाहिए? टॉफी-चाकलेट तो यूँ भी खाते रहते हैं पर क्या आज के दिन ये उतावलापन शोभा देता है इतने बड़े बच्चों को? जीवन की बाकी सच्चाइयों को किस उमर में जानना शुरू करेंगे फिर| अब तो ध्यान जब तब इनके साथ के और बच्चों पर जाने लगा है| अकल भी अब मसरूफ रहती है जिस्मानी उठान और समझ के बीच ताल मेल बैठाने में| कभी इनके स्कूल का कोई और बच्चा घर आ जाता है तो आँखें ख्यालों के साथ मिलकर उसकी समझदानी का साइज़ समझने बैठ जाती है| पता नहीं स्कूल में ये लोग सांताक्लाज के बारे कोई बात करते हैं या नहीं? हो सकता है के इन दिनों पड़ रही छुट्टियों के कारण इस विषय पर चर्चा न हो पाती हो ...वरना इतने बड़े बच्चे और ऐसी बचकानी..| कई बार चाहा है के ख़ुद ही इन्हें रूबरू करा दूँ सच्चाई से पर जाने क्यूं ये भरम इस तरह नहीं तोड़ना चाहता| इनके विकास को लेकर मन का ज्वार-भाटा बढ़ता ही जाता है| अखबारों में निगाहें अब बाल-मनोचिकित्सकों के लेख ही तलाशती रहती हैं| आई क्यू., ई क्यू. ऐसे 'क्यूं' वैसे 'क्यूँ' कुछ समझ नहीं पाता| कद के साथ बढ़ता बचपना दो तीन साल से हताशा को और बढ़ा ही रहा है| कई बार ख़ुद को दोषी पाता हूँ कि शायद मैं ही स्वार्थवश बाल्यावस्था को समुचित रूप से....| हमेशा जुराबों से चाकलेट निकालते समय मेरी आँखें इनके चेहरे पर गड़ी होती हैं, बस एक नज़र इनकी बेएतबारी की दिख जाए तो कुछ सुकून मिले, कभी तो एहसास कराएँ मुझे बड़े होने का| कैसे जानें के मटमैले लबादे वाला इनका सांताक्लाज अब कैसा बेसब्र है इनकी उम्र का भेद जानने को|
आज तो आफिस में ही काफ़ी देर हो गयी है| बाहर आया तो देखा के बाज़ार भी बंद हो चला है| इलाके की बत्ती भी जाने कब से गुल है| चाल काफ़ी तेज हो चली है, निगाहें तेजी से दायें-बाएँ किसी खुली दूकान को तलाश रही हैं....दिल बैठ रहा है ..अब कि शायद आँगन में टंगी चक-दक धुली सफ़ेद जुराबें बस टंगी ही रह जायेंगी...क्या ऐसे टूटेगा मासूमों का भरम ...क्या गुजरेगी बेचारों पर...? बेबस सा आख़िर में आफिस के उस अर्जेंट काम को ही कोसने लगा हूँ| इसके अलावा और कर भी क्या सकता है एक मटमैले लबादे वाला| सुबह उसे एक अलग ही रूप लिए जगना होगा अब की बार| मन के भीतर किसी छोटे से कोने मैं इसकी भी रिहर्सल चल रही है| इन सब के बीच नज़र में किसी थकी हुई सी लालटेन की धुंधलाती रौशनी आ गयी है| मुझ से भी ज्यादा थका सा लग रहा कोई दूकानदार अपनी दूकान बढ़ाने को तैयार है शायद "ज़रा एक मिनट ठहरो......!!" कहता हुआ थका हारा सान्ताक्लोज दौड़ पडा है इस आखिरी उम्मीद की तरफ़| इसी उम्मीद से तो बच्चों का वो भरम बरकरार रह सकता है जिसे वो कब से तोड़ना चाहता है| जल्दी से जेब से पैसे निकाले और उखड़ी साँसों पे लगाम लगाते हुए दोनों बच्चों के फेवरिट ब्रांड याद करके बता दिए हैं| दूकानदार किलसने के बजाय खुश है| और एक वो है के आफिस से निकलते-निकलते एक अर्जेंट काम के आने पे कितना खीझ रहा था| बमुश्किल दस-पन्द्रह कदम दौड़ने पर ही साँसें कैसी उखड़ चली हैं| दुकानदार ने सामान निकाल कर काउंटर पर सजा दिया है| चॉकलेट के गोल्डन कलर के रैपर कुछ ज़्यादा ही पीलापन लिए चमक रहे हैं| शायद लालटेन की रौशनी की इन्हें भी मेरी तरह आदत नहीं है| मैंने सामान उठा कर लबादे में छुपाया और घर की तरफ़ बढ़ गया| तेज़ रफ़्तार चाल अब बेफिक्र सी चहल कदमी में तब्दील हो गई है| अब कोई ज़ल्दी नहीं है बल्कि अच्छा है कि बच्चे सोये हुए ही मिलें|
मेरा अंदाज़ा सही निकला | दोनों बच्चे नींद की गहरी आगोश में सोये हैं.....एकदम निश्छल, शांत....दीन-दुनिया से बेफिक्र| मैं और उमा खुले आँगन में आ गए हैं, बाहर से कमरे की चिटकनी लगा दी है ताकि किसी बच्चे की आँख खुल भी जाए तो हमारी इस चोरी का पता न चल सके| मोमबत्ती जला कर हमने धुली जुराबों में बच्चों की पसंद के अनुसार सौगातें जचा-जचा कर रखना शुरू किया| जुराबों में हल्का सीलापन अब भी है जो की रात भर आँगन में टंगे-टंगे और बढ़ जाएगा मगर रैपर बंद चीज़ों का क्या बिगड़ता है|
सुबह आँखें लगभग पूरे परिवार की एक साथ ही खुली| दोनों बच्चों ने भरपूर उतावलेपन से अपनी-अपनी रजाइयां फेंक दी और कुण्डी खोल के खुले आँगन में लपक लिए बगैर जाड़े की परवाह किए| दोनों जोशीले तार में लटकी-उलझी अपनी-अपनी जुराबें खींच रहे हैं भले ही उधडती-फटती रहें, उनकी बला से| उन्हें क्या फर्क पड़ता है| उन्हें तो बस सांताक्लोज के तोहफों से मतलब है हमेशा की तरह| बेकरारी पूरे शबाब पर है .....चक-दक जुराबों में तले तक पैबस्त उपहारों को उंगलिया सरका सरका के पट्टीदार दहानों से उगलवाया जा रहा है| सान्ताक्लोज की नेमतें सोफे पर टपक रही हैं मगर आज बच्चे इन्हें अजीब सी नज़रों से देख रहे हैं| जाने उपहारों में आज ऐसा क्या खुल गया है कि इनके चेहरे पर उत्साह के रंग मायूसी में बदल गए| सबसे पहले तो ज़रूरत से ज्यादा पीलापन लिए गोल्डन कलर की जांच हुई और फिर पारखी नजरें प्रोडक्ट की स्पेलिंग चेक करती हुई नीचे लिखा अस्पष्ट मैनुफक्चारिंग एड्रेस समझने लगीं| मेरे कुछ समझ पाने से पहले ही दोनों अपनी अजीब सी शक्लें बनाते हुए और भी ज्यादा बचपने में भर गए ........
"पापू....!! ये क्या ले आए......?...डुप्लीकेट है सारा कुछ..!! ये टॉफी भी ...."
"हाँ .. पापू..! मेरे वाला भी बेकार है एकदम से ...!!"
"आप भी ज्यादा ही सीधे हो ..बस..कोई भी आपको बेवकूफ बना दे...हाँ नहीं तो .."
"आज के बाद उस दूकान पे आप ...!!!!"
बच्चे अचानक संभल गए| गोल-गोल आँखें मटकाती दो शक्लें, दांतों के तले दबी जीभ.. | इस अचानक की पर्दाफाशी से मैं भी हैरान हूँ | दोनों दबी-दबी मुस्कान लिए, मुझसे आँखें बचाते हुए अपनी-अपनी चाकलेट का ज़रूरत से ज्यादा पीला रैपर उतार रहे हैं| एक बार फिर नजरें उठ कर मिली हैं और अब कमरे में ठहाके फूट चले हैं....बच्चों के मस्ती भरे और हमारे छलछलाई आंखों से..!!
बच्चे अभी छोटे हैं शायद ..हमारा ये भरम टूट चुका है..बिलंग्नी पर टंगे मटमैले लबादे से कहीं कोई सुर्ख लाल रंग भी झांकता दिख रहा है..|
Saturday, November 21, 2009
कितनी बार...
Thursday, November 12, 2009
Monday, November 2, 2009

"अब है इस मामूर में कहते-गम-ऐ-उल्फत असद,
हमने माना के रहे दिल्ली में पर खाएँगे क्या?"
Friday, October 16, 2009
इतना नंगा आदमी (लघुकथा)
पर मैं समय की नजाकत को समझते हुए उस पागल की ओर लपका और साथ हो लिया | हाँ! अब ठीक है | उसका उघड़ा तन मुझे शेषनाग की तरह सुरक्षित छाया प्रदान कर रहा है | मैं पूर्णतः आश्वस्त हूँ | हाँ! इतना नंगा आदमी कम से कम मानव बम तो नहीं हो सकता......|
Tuesday, September 22, 2009
इस तरह सब इश्क से क्यूं खुद को बेगाना कहें
अक्स उनका,चाह उनकी,दर्द उनके, उनका दिल,
दिल में हो जिसके उसे सब, क्यों न दीवाना कहें
जाम आखिर जाम की सूरत कभी तो चाहिए
कब तलक तेरी हसीं आँखों को, मयखाना कहें
साथ जीने की ही जब उम्मीद तक बाकी नहीं
तेरे बिन जीने को फिर हम,क्यों न मर जाना कहें.
"बे-तखल्लुस" ये जहां वाले भला समझेंगे क्या.?
जां का जाना है, जिसे सब दिल का आ जाना कहें।
Thursday, August 20, 2009
Sunday, August 2, 2009
hind-yugm se...........
शामे-तन्हाई में क्या-क्या कहर बरपाता है दिल