बे-तख़ल्लुस

manu

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Wednesday, February 10, 2010

एक और पुरानी ग़ज़ल...






जो लोग कहते हैं, वो लगावट, हो अपने भी दरमियां तो कुछ हो
इस उडती-उडती खबर से हमपे, जो तू भी हो बदगुमां तो कुछ हो

ये ग़म हमारा तेरी जुबां से न हो सके गर बयां तो कुछ हो
हो खोयी-खोयी नज़र से तेरी, जो हाल अपना अयां तो कुछ हो

करें तगाफुल पे जत्न ऐसे, तो वस्ल में क्या न वो करेंगे
मेरी तरह जो ये खुश खयाली तुझे भी हो मेरी जां तो कुछ हो

है साकी का ग़ैर से भी वादा,हमें तलब आज कुछ ज्यादा
मेरी जुनूं-खेज तिशनगी का, हो और भी इम्तेहां तो कुछ हो

क्यूं इश्क से तो यूं बे-असर है, कि हव्वा जैसी ही बे-खबर है
वो खुल्द का फल, किसी तरह गर चखे जो तेरी जुबां तो कुछ हो

शिकन का खंजर, तेरी जबीं से जिगर में मेरे उतर गया है
ये नर्म खंज़र जो खुदकुशी की कहे अगर दास्ताँ तो कुछ हो

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,

रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है
हो मेल दोनों का 'बे-तखल्लुस', बंधे नया इक समां तो कुछ हो

27 comments:

manu said...

क्यूं इश्क से तो यूं बे-असर है, कि हव्वा जैसी ही बे-खबर है

इसमें पहला शब्द क्यूं...२ का वज्न होते हुए भी इश्क के साथ मिलकर १ का वज्न देता लग रहा है हमें...

जाने क्यूं....??
क्या आप को भी ऐसा कुछ महसूस हो रहा है.....?????

नीरज गोस्वामी said...

शिकन का खंजर, तेरी जबीं से जिगर में मेरे उतर गया है
ये नर्म खंज़र जो खुदकुशी की कहे अगर दास्ताँ तो कुछ हो

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,

रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है
हो मेल दोनों का 'बे-तखल्लुस', बंधे नया इक समां तो कुछ हो

मनु भाई इस मुश्किल काफिये रदीफ़ वाली बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली दाद कबूल करें...हम तो भाई इस मुश्किल बहर में लिख ही नहीं सकते...लफ्ज़ भी आप खूब चुन चुन कर लायें हैं...यूँ तो सारे के सारे शेर उम्दा है लेकिन ऊपर वाले तीनो ने तो बस हमें आपका दीवाना बना दिया...वाह भाई वाह...

क्यूँ इश्क के साथ मिल कर अपने वज़न से गिर रहा है इसके बारे में तो उस्ताद लोग ही बताएँगे हम तो ग़ज़ल का मजा उठा रहे हैं उठाने दीजिये...
नीरज

Madhur Maurya *Madhukar* said...

शिकन का खंजर, तेरी जबीं से जिगर में मेरे उतर गया है
ये नर्म खंज़र जो खुदकुशी की कहे अगर दास्ताँ तो कुछ हो...
bahut badiya....
isiliye to hum aapke kayal hain...

योगेश स्वप्न said...

antim do sher to gazab ke lage , vaise sabhi ek se badhkar ek, badhaai.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

manuji,
क्यूं इश्क से तो यूं बे-असर है, कि हव्वा जैसी ही बे-खबर हैवो खुल्द का फल,,, raag me lekar dekha..mujhe kuchh samajh nahi aaya ki wazan ki koi problm ho..
aapne kuchh mushkil un logo ke liye kar di jinhe gazal ke ese roopo se mukhatib hone ka mouka nahi milaa he , mashaallah..hindi me kahte he na 'KLISHTH"..kher../ kuchh kathin to he hi.../
vese bhi aapne likh hi diya he ki- ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो.../

manu said...

अमिताभ जी,
जब हमने इसे कहा था तो एकदम सही लगा था...
काफी बाद में नोट किया..तो ध्यान दिया की क्यूं शब्द गुरू होकर भी लघु कहा जा रहा है...जबकि इसकी मात्रा भी नहीं गिर सकती..
अपने तरीके से फिर देखा ...तो भी ठीक आया...
जबकि गलत है..
क्यूं इश्क से तू यूं....(ठीक लग रहा है...)

शायद इश्क का असर है.....
:)

मनोज कुमार said...

इस ग़ज़ल में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

"अर्श" said...

उस रात इस ग़ज़ल से भी दो एक शे'र होने चाहिए थे .. क्या हम इस काबिल नहीं के इसे सुन सकते ...
बहरहाल सारे ही शे'र पसंद आये लम्बी बहर में भी शे'र निकालना हिम्मत की बात हिया गुरु ..

अभी मतले के लिए सिर्फ कमेन्ट कर रहा है आगे के लिए फिर से आता हं
अर्श

neelam said...

शिकन का खंजर, तेरी जबीं से जिगर में मेरे उतर गया है
ये नर्म खंज़र जो खुदकुशी की कहे अगर दास्ताँ तो कुछ हो

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,

shaayri ki samajh to kuch khaas nahi par ye waaale ...........
baaki to aapko gunijan hi bataayenge

MUFLIS said...

hindi font gaayab ho gaye haiN
kuchh bhi padh nahi paa rahaa hooN...apne blog par bhi kuchh nahi
kaheeN bhi...sb jagah....
bs is tarah ke square (dabbe-dabbe-se)dikhte haiN....kuch copy paste kar rahaa hoon....jaise
क्यूं इश्क से तो यूं बे-
pataa nahi wahaan kaise dikhegaa jiiii
aur,,,rachna,,,
pataa nahi kaisi hai ??!!

'अदा' said...

मनु जी,
यूँ तो आपकी पूरी ग़ज़ल ही अपने पूरे शबाब पर है ..
पर इस शेर की शोख़ी क्या कहने.....!!

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,

हमेशा की तरह सब कुछ बहुत ही आला-दर्जे का ...
शुक्रिया...

Devendra said...

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो
...वाह क्या शेर है!

RC said...

Ghazal achchi lagi, kuchh Sher bahut achche lage ... magar dubara itminaan se padhoongi phir tippani doongi.
Second last Sher mein kuchh ajeeb sa lag raha hai ... kya aapko bhi?

दर्शन said...

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,


आह निकली है जो...
...तो दूर तलक जियेगी.

दर्शन said...

Muflis sir ke liye fauran ek roman bolg pesh kiya jaiye....

Reetika said...

behad khoobsoorat....

गौतम राजरिशी said...

अहा! ये ग़ज़ल...ये हमारे पास सुरक्षित है आपकी "कशिश"{दर्पण सुन रहे हो?} भरी आवाज में।

"क्यूं इश्क" के मिलन पर उस्ताद लोग तो उंगलियां उठायेंगे ही। अब मुफ़लिस जी ने बचने का अच्छा रास्ता निकाला है, तो हम क्या कहें साब।

कंचन सिंह चौहान said...

रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है
हो मेल दोनों का 'बे-तखल्लुस', बंधे नया इक समां तो कुछ हो


waah waaaah..kya baat hai bhai jaan

MUFLIS said...

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है ख़याल में पिन्हा तू ही तू है
ऐ मेरी वजह-ए-ग़ज़ल तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो

हज़ारों - हज़ारों दीवान
ऐसे खूबसूरत और तरहदार शेर पर निसार ...!
हुज़ूर....हालाँकि ये पूरी ग़ज़ल आपकी ज़बानी सुन
ही चूका हूँ ...रु-ब-रु....
लेकिन बार बार पढने पर हर बार
इक नया-सा असर छोड़ जाती है
और
ये गम हमारा तेरी जुबां से न हो सके गर बयाँ.....
एक अलग सी सोच की तर्जुमानी कर रहा है

इस तरह की मुश्किल और बड़ी बहर में
खयालात और अलफ़ाज़ को बाँध पाना
बड़ा टेढा और जोखिम भरा अमल है
लेकिन सलाम है आपकी लेखनी को ......
वाह-वा !!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

मनु जी, आदाब
मतले से लेकर मक़ते तक
हर शेर पर दिल खोलकर दाद दे रहा हूं...कबूल फ़रमायें
ये आप एक मिसरे में बिना वजह परेशान होना छोड़िये
हिन्दी की आप जानें, उर्दू की ’गारंटी’ हमारी रही...
जिसमें कुछ हरुफ़ गिराये जाने की इजाज़त है
इसमें ही देखिये-
क्यूं इश्क से तो यूं बे-असर है, कि हव्वा जैसी ही बे-खबर है
इसमें उर्दू के लिहाज से ’यूं’ बे-असर है...यहां भी ’यूं’ की ’वाव’ यानी मात्रा गिराये जाने की ज़रूरत है, जो मेरे इल्म के मुताबिक ग़लत नहीं है....
खैर....
आपका एक मिसरा तो ’चुराने’ को दिल कर रहा है-
रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है...
चलो....’गिफ़्ट कर देना....जब चाहो...

Guftugu said...

मनुजी,बेहतरीन ग़ज़ल व् उम्दा पेंटिंग्स से रूबरू करने के लिए शुक्रिया.
'उमा' सीरीज अच्छी लगी.आपने मेरे ब्लॉग पर visit किया शुक्रिया काफी समय
बाद उत्तर देरही हूँ.'पैसे की कीमत ' मेरी ही कविता है.'बूढी औरतें 'कविता पर
आपने लिखा है की 'वर्ड वैरी फिकेशन ' हो रहा है .मै इस बात को समझ
नहीं पा रही हूँ .please समय हो तो बताइयेगा .थैंक्स,स्मिता मिश्रा

psingh said...

sundar vichar liye rachna
abhar.......

श्रद्धा जैन said...

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,


bahut khoobsurat sher


रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है
हो मेल दोनों का 'बे-तखल्लुस', बंधे नया इक समां तो कुछ हो

waah waah ji

Manu ji khoobsurat gazal hai

दर्पण साह 'दर्शन' said...
This comment has been removed by the author.
दर्पण साह 'दर्शन' said...

zihal e masti mukund ranjish bahal e hizra hamara dil hai.

ya,

meri mohabbart jawan rahegi...

तिलक राज कपूर said...

एक अच्‍छी ग़ज़ल के लिये बधाई।

kshama said...

Holi anek shubhkamnayen!