बे-तख़ल्लुस

manu

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Sunday, February 28, 2010

ताज़ा ग़ज़ल

पिछली कुछ रातों को जाने क्या क्या ख्याल आये दिल में......
बस हम फर्क ढूंढते रहे
कभी चित्रकार और कलाकार में..
कभी गायक और गवैये में...
कभी ग़ज़लकार और शायर में....
तो कभी..
ब्लोगर्स में और खुद अपने में...
थोड़ा/ज़्यादा फर्क महसूस तो हुआ...
खैर.....
अपना क्या है,
हम तो ऐसे ही सोचते सोचते एक दिन निकल लेंगे...


आप ये ताज़ा ग़ज़ल देखिये..


आदमी ग़लतियों का पुतला है
तू, जो हरदम सही है, तू क्या है

मेरे बारे में लोग जो भी कहें
मेरे बारे में तू क्या कहता है

होश की बात ही नशे में भी
ये भी पीने का कुछ तरीका है

वक़्त जाएगा किस हिसाब में, जो
हमने इक दूसरे पे खरचा है

ईन्चना है तेरा तबस्सुम फिर
मेरे जाने से कैसा कुम्हला है




21 comments:

manu said...

अपनी तबियत ज़रा नासाज़ है..
डॉक्टर ने मना किया है होली पर बाहर निकलने के लिए..


आप सभी को यहीं से होली की शुभकामनायें..

:)
:)

'अदा' said...

मनु जी,
हो सकता है यह बहुत सुन्दर ग़ज़ल हो...लेकिन पता नहीं क्यूँ ..आपने इससे कहीं ज्यादा अच्छे शेर लिखे हैं...थोड़ी सी और मेहनत कर लेते तो कुछ और बात होती..
होली की बहुत बहुत शुभकामना...!!

Suman said...

होली की शुभकामनाए.nice

नीरज गोस्वामी said...

"वक्त जायेगा किस हिसाब में...." वाह मनु जी वाह...बेजोड़ शेर है और कमाल की ग़ज़ल...होली मन गयी अपनी तो...होली की शुभकामनयें...
नीरज

Babli said...

आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

निर्मला कपिला said...

अदा जी ने सही कहा है मै तो आपकी गज़लें पढ कर कई बार कमेन्ट दिये बिना चली जाती थी मेरे पास शब्द ही नही होते थे आपकी गज़ल के कद के। फिर भी बहुत अच्छी लगी। आपको व परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें। देर बाद ब्लाग पर आने के लिये क्षमा चाहती हूँ।

manu said...

है नज़र तेरी कुछ अलग ही, या..
मैं ही तुझ को अलग सा दिखता हूँ..

MUFLIS said...

क्या भला मैं हूँ, और वो क्या है
शाम ढलते ही फिर ये झगडा है

जान कर भी, हताश हूँ खुद पर
सोच अपनी , ख़याल अपना है

मैं कहाँ था ब-वक्ते-तन्हाई
होश आया, तो खुद से पूछा है

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

मनु जी, आदाब
वाह...वाह...पूरी ग़ज़ल पर......
और ये शेर-
होश की बात ही नशे में भी
ये भी पीने का कुछ तरीका है...
लाजवाब.....
पढ़ा...और याद हो गया....
यही आपकी कामयाबी की दलील है.

गौतम राजरिशी said...

जन्म-दिन की हार्दिक शुभकामनायें मनु जी...और ये इस दिन को क्या बातें कर रहे हैं कि "हम तो ऐसे ही सोचते सोचते एक दिन निकल लेंगे..."
वैसे ग़ज़ल लाजवाब बनी है। दिल से कह रहा हूं। पता नहीं, अदा जी को क्या नहीं पसंद आया....किंतु मुझे सारे के सारे अशआर पसंद आये। जबरदस्त मतले से शुरूआत और दूसरे शेर का अंदाजे-बयां...अहा! और तीसरे शेर में आपका अपना वाला अंदाज़ झांकता हुआ...क्या कहने!

ऐसे ही ताजी ग़ज़लें सुनाते रहिये जनाब...

M.A.Sharma "सेहर" said...

आदमी ग़लतियों का पुतला है
तू,जो हरदम सही है, तू क्या है

मेरे बारे में लोग जो भी कहें
मेरे बारे में तू क्या कहता है

gazab likha manuji

yahee to samajhna hai ji !

हरकीरत ' हीर' said...

सबसे पहले तो जन्म दिन की ढेरों बधाई ........!!

और अब ये फर्क ढूँढने के ख्याल क्यों .....??

और फिर आप तो चित्रकार और कलाकार दोनों हैं ........

और ये किसके लिए है ......

आदमी गलतियों का पुतला है
तू, जो हरदम सही है,तू क्या है ....

कहीं मेरे लिए तो नहीं था ......???

मेरे बारे में लोग जो भी कहें
मेरे बारे में तू क्या कहता है

किसी से कोई बात तो नहीं हुई मनु जी .......पर शे,र सीधे वार करता है .....बहुत गहरा और तल्ख़ भी .....!!

वक़्त जायेगा किस हिसाब में , जो
हमने इक दुसरे पे खर्चा है

वाह......रुपये -पैसे को तो कोई मांग भी ले ....पर यर वक़्त भला कोईं लौटा पता है ......!!

पर ये वक़्त चुराने वाली .....वाला है कौन .....????

हरकीरत ' हीर' said...

है नज़र तेरी कुछ अलग ही, या..
मैं ही तुझ को अलग सा दिखता हूँ..

इस पर तो बल्ले- बल्ले.....!!

Manoj Bharti said...

उम्दा,जीवन को तलाशती ग़ज़ल ...

पंकज said...

सुंदर रचना.

"अर्श" said...

जन्म दिन विशेष की ढेरों बधाईयाँ ....

एक कामयाब मतले से जब किसी ग़ज़ल की शुरुयात की जाती है तभी उस ग़ज़ल को मुकम्मल करार दे दिया जाता है ... जिस खयालात से आपने इस मतले को लिखा है मनु जी कमाल की बात की है आपने ....
और दुसरे शे'र में जो सवाल आपने किये है करीने से ... वो अपने अआप में कुशल शिल्प की बात हो गयी है ...
और ये तरिका बेहद पसंद आया पीने का , कहूँ तो अंदाज़ ... पूरी तरह से नयापन लिए हुए है यह शे'र ... बरबस वाह वाह के लिए आतुर है जहन-ओ-जबान...
और मैं भी आतुर हूँ इस तरह से वख्त को खर्चने के लिए ... :)
और सिंचाई क्या खूब की है आपने तबस्सुम की ... उफ्फ्फ्फ़ इस शे'र ने ... हाय रे ...वाली बात है इसमें तो ...

पूरी ग़ज़ल ही मुकम्मल है ... हर शे'र में एक अलग सा भोलापन ... जल्दी जल्दी आया करें... अच्छा लगता है .... और ऐसे चले जाने की बात फिर कभी ना करें... :)

अर्श

neelam said...

ये भी कोई बात हुई सारे फ़र्क खुद ही किये खुद ही समझ लिए ,हम सब लोग तो ...........
खैर आप निकल कहाँ रहें हैं ,ये ब्लोग्गेर्स आपको कहीं से भी ढूंढ के यहीं ला पटक देंगे ,आखिर इनका भी तो कुछ फर्ज है ,आपके लिए .हा हा हा हा हा हा
जो आप लिखते हैं ,उतनी ....... नहीं पर वो क्या है कि
अंग्रेज कह गए हैं "something is better than nothing "
वो जो आखिर में एक शब्द हैं ईन्चना...........इसका मतलब कुछ अच्छे अर्थ में ही है ,इनके अर्थ हिंदी में लिख दिया करें तो हम जैसे अनाड़ियों को थोड़ी मदद मिल जायेगी
ईन्चना है तेरा तबस्सुम फिर मेरे जाने से कैसा कुम्हला है

सबसे उम्दा और आसान तो यही है बस

है नज़र तेरी कुछ अलग ही, या..
मैं ही तुझ को अलग सा दिखता हूँ.

manu said...

@ नीलम जी...
बेहद जल्दबाजी में ये पोस्ट डाली है...
असल में ईंचना नहीं..

( '' सींचना'' ) है....
शायद S पर हाथ नहीं पडा होगा टाइप करते वक़्त...
एक बार पोस्ट कर देने के बाद एडिट करने में बड़ी आफत लगती है ....

@ हरकीरत जी...
आपको भला हम ऐसा लिख सकते हैं...?

हाँ ,आपने जो इस शे'र का ज़िक्र किया...
है नज़र तेरी कुछ अलग ही, या..
मैं ही तुझ को अलग सा दिखता हूँ..

तो इसके काफिये पर ध्यान गया...हम ने जाने किस झोंक में इसे इसी ज़मीं का समझ कर कह डाला था....

रदीफ़ काफिया..अक्सर ध्यान नहीं जा पाता इन पर...
आपका आभार..

manu said...

@ मुफलिस जी....

@ अर्श भाई....

हम कभी पूछते हैं आपसे.....
वजहे ग़ज़ल...

:)
:)
:)
:)
:)

manu said...

सबसे पहले मिर्ज़ा साहिब से हाथ जोड़कर माफ़ी चाहते हैं....

हुज़ूर...
वो कोई पोस्ट नहीं थी...बस पोस्ट हो गयी थी....
बस हम अपनी पोस्ट को एडिट करना सीख रहे थे... नीचे वाली ग़ज़ल में ईंचना/सींचना नहीं कर सके तो कमेन्ट डालना पडा..ऐसे ही इस पोस्ट में सोचा के एडिट करके देखते हैं..पर हमसे हो नहीं सका...

हमारे ब्लॉग का बैक ग्राउंड ही कुछ ऐसा है...

सीधे सीधे काले अक्षर लिखें तो कुछ नजर नहीं आता...
अगर एक पोस्ट को सिर्फ एक ही रंग से लिखें तो अपनी तसल्ली नहीं होती....
अगर एक से ज्यादा रंग का इस्तेमाल करें तो एडिट नहीं कर पाते....
जरूरत से ज्यादा हल्का रंग हो तो गूगल रीडर पर सुना है नहीं दिखता.....


सारे बवाल की जड़...
ब्लॉग का बैक ग्राउंड ........................
जो की हम नहीं बदल सकते..ना ही बदलना चाहते हैं....

ब्लॉग पर आये थे तो इसे देख कर,,,सोच कर ही अपनाया था....
अब बेशक दिक्कत आती है..मगर हमसे नहीं बदला जाता....
एक बार फिर आपके आने का आभार...
और इमानदार कमेन्ट के लिए दिल से आभार...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

(sarvpratham sorry, roman me tippani ke)
farq dhoondhna aour dhoondhate rahna..bas aadami ho jaanaa hotaa he.., yahi fitrat he usaki, pata nahi use isame kyaa mil jaanaa hotaa he? kher.., manu ji..late ho gaye aane me, magar durust aaye he, kyonki fursat he aour chhooti hui saari post itminaan se padhh rahe he, lutf bhi le rahe he aour bahut kuchh soch bhi rahe he, yahi gazalo ki saarthakataa he ki aadami sochane lag jaaye...kuchh bhi, apna ateet, apna pyaar, apna kuchh bhi.../
मेरे बारे में लोग जो भी कहेंमेरे बारे में तू क्या कहता है
yah to sach hi likhaa he, yadi itana bharosaa apne yaar par ho to yaar yaani khuda bhi ho saktaa he..to waah kyaa baat he..jeevan sanvar jaaye...