बे-तख़ल्लुस

manu

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Monday, March 8, 2010

रंग


कल आफिस में लंच करते समय उन्होंने कहा था.........

"मनु यार कम से कम हाथ तो धो ले।"

"धुले तो हैं " मैंने कहा पर उँगलियों पर हल्का गुलाबी रंग, और कहीं एक शोख आसमानी रंग नज़र आ रहा था

"तो ये क्या है....?"

"ये तो रंग हैं ,हाथ तो धो चुका हूँ पर ये नहीं छूट रहे.....आप ही बताओ क्या करुँ "

"दुबारा हाथ गीले कर के स्लैब के उलटी तरफ़ खुरदरी जगह पर जोर से रगड़ ले, सब छूट जाएगा "

मैंने उनके कहे पर अमल करना शुरू किया........पर जाने क्यूं इन शोख रंगों को जोर से रगड़ने की हिम्मत हाथों को ना हुई,
कुछ देर वो मेरा इंतज़ार देख के बोले " एक मिनट का काम है, बस,, पर तू ही नहीं चाहता...."

""जी शायद मैं ही नहीं चाहता,
आप चाहें तो मेरे बिना अकेले लंच कर सकते हैं ......."

16 comments:

manu said...

जब एक तस्वीर बनाने की हिम्मत ना रहे..
एक शे'र कहने की ताब ना बचे....तो कोई क्या करे................?

बस...
पुराना कुछ पोस्ट करे..

कभी कमेन्ट को पोस्ट बनाए..
और कभी............

kshama said...

Bahut achha laga!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

मनु जी, आदाब
काम तो वाकई मुश्किल नहीं,
बस आप ही रंगों में उलझ गये शायद.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

yah rang hi he jo jeevan ko rangeen banaate he, bhalaa log ise kyu kar chhudaate he?

अमिताभ श्रीवास्तव said...

manuji, aapki teeno posto par aaj itminaan se nazar jamaai..aur kuchh likha kar syaahi bhi jamaai.../ mazaa aa gayaa saahab../ dil ko achchaa lagaa..jo bhi lagaa..

'अदा' said...

कम शब्दों में गहरी बात...
वैसे मुझे हमेशा ही आपकी बात समझने में मुश्किलात हुई है...लेकिन इस बार समझ में आ गई है...
आभार..

निर्मला कपिला said...

ाप हमेशा ही इतनी गहरी बात क्यों करते हैं साफ क्यों नही कहते कि कुछ रंग जीवन मे रहें तो बेहतर रहता है। बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है । शुभकामनायें

"अर्श" said...

hameshaa hi chup ho jata hun aapke saamne .... jaane kyun shabd mera saath chhod dete hain.... shapake pas chale jaate pasand aapko hi karte hain wo bhi .... main saath me lunch karne ko taiyaar hun rangin saath aur haath ke saath . :)



arsh

RC said...

bahut pyara post hai Manu ji ... bina kahe bahut kuchh keh jata hai ...

God bless
RC

Arvind Mishra said...

अच्छा किया मनु ,रगड़ने से रंग तो छूट जाते मगर जख्म छिलने का इक सिलसिला ......
आखिर वे रंग खुद से कोई छुडाये क्यूं ?वे खुद ही भले छूट जायं -तन छूटने के साथ तो छूटना ही है !

दर्पण साह 'दर्शन' said...

ये रंग असल में ..एक और आयाम है.....जब मनु (...........)
बचपन के रंग हैं....सबसे शोख रंग तब ही हो सकते हैं.....
है ना....?

बेचैन आत्मा said...

शोख रंग इसलिए नहीं छूटते कि हम उन्हें छुड़ाना ही नहीं चाहते.
..वाह!
..कम शब्दों में बड़ी बात.

MUFLIS said...

ab agar chaahoge bhi
to bhi nahi chhoot paaenge
ye rng....
andar kee baat hai !!

MUFLIS said...

jitne bhi mile rng wo,,,,
sb bhar diye tujh mei,,,
ik rang-e-wafaa aur hai.......!?!

हरकीरत ' हीर' said...

ਬੱਲੇ..... ਅੱਜਕੱਲ ਤੇ ਜਿਧਰ ਦੇਖੋ ਰੰਗ ਹੀ ਰੰਗ ਨਜ਼ਰ ਆ ਰਹੇ ਨੇ ਜੀ ........ਵਧਾਈਆਂ ....!!

पर जाने क्यूँ .......ओये होए .......!!

जाने क्यूँ.....तेरा रंग धोने को जी नहीं करता ....

धो लीजिये मनु जी ....बड़ी खतरनाक बिमारी हो जाती है इससे ......
आदमी मिट्टी में बैठ नक्श बनाने-मिटाने लगता है ....
और कुछ दिनों में .........फिर बताउंगी ......!!

neelam said...

mother india ka gana hai shaayad uski line thi kahin

"dhobnia dhoe chaahe saari umria "

usi rang ki baat ho rahi hai shaayad,
par aajkal to kai " removers" aane lage hain .hahhaahahahaha

harqeerat ji hum sahi kah rahe hain naa .