बे-तख़ल्लुस

manu

manu

Thursday, July 16, 2009

DARPAN.....!

अभी पिछले दिनों की तो बात ही है....
एक सवाल .....
किया था तुमने मुझ से...

तुम कितना बेजार थे उस दिन....!

कितनी उम्मीद थी ....
आवाज़ में तुम्हारी.. ...
और..
सवाल में तुम्हारे....
कितनी बेचारगी ....!

और मैंने भी समझा था तुम्हारी पीडा को..
जाना था हाल....
तुम्हारे भीतर का.....
हाँ...बेशक...
या.
शायद.......!!!!!!
उस दिन..एकाएक मैं, मैं से उठकर....मैं से थोडा आगे बढ़कर...
कोई सुकरात..या
शायद..
कोई अरस्तू हो गया था मैं..

क्या गफलत थी उस ऊंचाई की...
मैंने चुटकी में सुलझा डाला था ..तुम्हारा हर सवाल.....

कितने लाजवाब हो गए थे तुम भी....
या
शायद ज्ञानी.....................
जैसे जान गए हो स्रष्टी का हर भेद...
हर तौर-तरीका...ब्रह्माड का..
पूरी कायनात का..............
तुम्हे उस हाल में देख ...
मैं अपने मैं से कितना और ऊपर उठ गया था...
नहीं.....?????
ह्म्म्म्म्म


क्या यार...
एकदम वही सवाल तो लादे
खडा हूँ मैं आज...
ठीक तुम्हारे ही सामने...

क्या तुम भी मुझे वैसे ही बहला दोगे....
या बनोगे मेरे .....

सच्चे अरस्तू....!!!!

32 comments:

दर्पण साह "दर्शन" said...

ये तो बातों -बातों में ही चोरी हो गयी.........
ऐसे तो ये दिल भी नहीं हुआ था...
अब आप भी दो न पहला कमेन्ट....
पर चोरी का नहीं....

दर्पण साह "दर्शन" said...

accha mere comment ki bhi chori...

manu said...

ऐसे ना करो दर्पण....
सब मुझ पे ही शक करेंगे ...
इस कविता की और कमेन्ट की चोरी का...

दर्पण साह "दर्शन" said...

jokes apart: is kavita ka saravdhikaar, manu ji ka hai tatha iska kisi bhi jivit athva mrit 'Darpan' se koi lena dena nahi hai...
..yadi aisa paaya jaata hai toye matr ek sayoog hoga....

Udan Tashtari said...

ये क्या हो रहा है भाई-कोई मुझे भी तो बताओ.

manu said...

कुछ नहीं साहब...
ये सब इस्लाह का नतीजा है...

manu said...

iska kisi bhi jivit athva mrit 'Darpan' se koi lena dena nahi hai...

aise bhi mat bolo darpan..

'अदा' said...
This comment has been removed by the author.
'अदा' said...

युंकी, हम आये तो थे टिपण्णी करने लेकिन हम समझ गए हैं की मामला कुछ आउर ही है, अब हम आप दोनों को गाँव के चार चक्कर लगवा कर टेसन पर छोड़ कर आ तो नहीं सकते इसीलिए हम ही चलते हैं, जय राम जी की ....

Vijay Kumar Sappatti said...

manu ji

mitrata me jab bhi ek dusare ko smjhane ki baat hoti hai to yeahi jazbaat hote hai ..darpan ji aur aap me ye sanvaad mitrata ki sabse badi dharohar hai ...

is rachna me ek philosphical approch hai ..jiske liye aap badhai ke paatr hai ..

jai ho gurudev..

aapka

vijay

"अर्श" said...

kya baat hai huzur ye andaaz bhi ... aap aise to nahi the .... ye sukraat aur aarastu ...? magar jo bhi ho aapke ye nayaa andaaj pasand aaya bahot badhiya aur mukammal tarike se aaapne apnaa hak aada kiya hai aur darpan ne apnaa.... bahot bahot badhaayee sahib....


arsh

M.A.Sharma "सेहर" said...

उस दिन..एकाएक मैं, मैं से उठकर....मैं से थोडा आगे बढ़कर...कोई सुकरात..या शायद..कोई अरस्तू हो गया था मैं..

ये क्या लिख दिया मनु जी....आपका ये रूप भी था क्या??कमाल का है
दिख तो बड़ा सीधा सा रहा था लेकिन कमेन्ट करने के लिए कई बार पढ़ना पडा

बहुत खूब लिखा !!

गौतम राजरिशी said...

नज़्म पढ़ने आया...तो उधर "प्राची के पार" से आवाज सी आयी तो उधर चल पड़ा...
मामला कुछ समझ में नहीं...खुलासा रूबरू करेंगे!

हर पंक्तियों के तह तक जाने की कोशिश कर रहा हूँ फिलहाल इन दो मिस्‍रों में अटक गया हूँ "तुम्हारा हर सवाल.....कितने लाजवाब हो गए थे तुम भी"

सुलझा कर वापस लौटता हूँ फिर से।

RC said...

Bahut khoobsoorat kavita hai Manu ji. Alag aur shayad naya tazkeera. Kavita ka ant marmsparshi aur "waah" wala !! :-)
Ek shiqayat hai. Vivaran zara lamba laga mujhe. Wahi baat kam shabdon mein (magar zyada asardaar) hoti to kya baat hoti!

manu said...

दर्पण भाई को इस्लाह के लिए ही तो भेजी थी जी हमने....
इन्होने अपने ब्लॉग पे ही चिपका ली...
ऊँहूँ...ऊँहू...ऊँहूँ

'अदा' said...

hnm

ये चोरी नहीं इसे डकैती कहते है
हा..हा हा हा.

क्या तुम भी मुझे वैसे ही बहला दोगे....या बनोगे मेरे .....
सच्चे अरस्तू....!!!!

मनु जी,
अब आप ये बताएं ये 'तुम' कौन है ?
खैर, रचना की बात करें अब..
बहुत ही खूबसूरत अदायगी है आपकी..
जो भी कहा है हमेशा की तरह लाजवाब है
बेमिसाल है..
धमाल है..
बवाल है..

अमिताभ श्रीवास्तव said...

thoda samajhna pad rahaa he//
darpanji ke blog se idhar kooda, socha pahle idhar se udhar koodna tha to samajh me aataa/ par is kooda kaadi me dimaag ka bntadhaar ho gayaa, par maza aayaa.

Deep said...

khoobsurat rachna

गौतम राजरिशी said...

फिर से आया पढ़ने इस नज़्म को...

और हम इसे सुनेंगे उस दिन आपकी आवाज में मनु जी!

नीरज गोस्वामी said...

एक बोलती हुई सी नज़्म के लिए मनु जी आपको बधाई...बहुत खूबसूरत ख्याल पिरोये हैं आपने...
और दर्पण जी वाला क्या मामला है भाई, हमने तो अभी तक ये ही सुना था की" दर्पण झूठ न बोले...."
नीरज

गुंजन said...

मनु जी

एक नई साहित्यिक पहल के रूप में इन्दौर से प्रकाशित हो रही पत्रिका "गुंजन" के प्रवेशांक को ब्लॉग पर लाया जा रहा है। यह पत्रिका प्रिंट माध्यम में प्रकाशित हो अंतरजाल और प्रिंट माध्यम में सेतु का कार्य करेगी।

कृपया ब्लॉग "पत्रिकागुंजन" पर आयें और पहल को प्रोत्साहित करें। और अपनी रचनायें ब्लॉग पर प्रकाशन हेतु editor.gunjan@gmail.com पर प्रेषित करें। यह उल्लेखनीय है कि ब्लॉग पर प्रकाशित स्तरीय रचनाओं को प्रिंट माध्यम में प्रकाशित पत्रिका में स्थान दिया जा सकेगा।

आपकी प्रतीक्षा में,

विनम्र,

जीतेन्द्र चौहान(संपादक)
मुकेश कुमार तिवारी ( संपादन सहयोग_ई)

अबयज़ ख़ान said...

आप बे-तखल्लुस होकर भी बहुत खूब लिखते हैं.. आपको किसी नाम की क्या ज़रूरत है। लेकिन इतने सवाल किसके लिए हमें भी समझाओ न...

दिगम्बर नासवा said...

एकदम वही सवाल तो लादे खडा हूँ मैं आज...
ठीक तुम्हारे ही सामने...
क्या तुम भी मुझे वैसे ही बहला दोगे....
या बनोगे मेरे .....
सच्चे अरस्तू..


बहूत कुछ कहती हुयी नज़्म है मनु जी............ अपने आप से कुछ कहती हुयी........... समय को सामने लाती ..... लाजवाब

Babli said...

वाह मनु जी बहुत ही सुंदर कविता लिखा है आपने! इस बार का आपका कविता सबसे अलग सबसे जुदा लगा! इस शानदार और जानदार कविता के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

MUFLIS said...

नज़्म कह लेने की एक अच्छी कोशिश पर बधाई
अस्ल में...मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझा सकना मुश्किल काम है ...
और जोखिम भरा भी ...
मन हल्का होने के बाद भी
जब कुछ ढो लेना चाहता हो
जवाब...
अपने ऊपर सवाल ओढ़ लेना चाहें ...तो ..
संजीदगी से सादगी की और जाना काम कर जाता है ...(अक्सर..)
खैर !!
.... ....... .. ..... ..... अच्छी रचना है .
---मुफलिस---

प्रकाश बादल said...

अरे भाई ये क्या हो रिया है!!!!



मेरे भाई मनु के लिए एक शेर किसी और का ही है, क्योंकि अपना तो कई दिनों से लिखा नहीं गया।

"अब उससे जुड़ गया है एक और रिश्ता,

कि मेरा भाई मेरा पड़ौसी हो गया।"

Harkirat Haqeer said...

सबसे पहले आपकी कमाल की नज़्म पढ़ी ....साथ ही साथ ये भी सोचती गयी की मनु जी ने ये खूबी भी छुपा रखी थी अब तक ....फिर इतनी ढेर सारी टिप्पणियाँ ....गौतम जी का खोज को चले जाना ( मेजर जो ठहरे )....फिर अदा का एक सवाल और तीन धमाल ....मुफलिस जी ने भी कई सवाल ओढा दिए ....और मैं सोच रही हूँ ये हम्म्म्म्म्म्म्म्म से लेकार अरस्तु के बीच इतनी गहरी खाई ...... नापने लगती हूँ .....पर कहीं अन्दर ही गुम हो जाती हूँ .....

कितने लाजवाब हो गए हैं आप.....!!!

'अदा' said...

हम्म्म्म्म्म्म्म्म
हरकीरत जी ने याद दिलाया
की हमारे सवाल जवाब अब तक नहीं आया..
आप अरस्तु ढूढ़ रहे हो या अरस्तु बन गए तो.. वैसे एक सुकरात हमारे पड़ोस में रहता है कहें तो भेजवा दूँ हम्म्म्म्म्म्म्म्म
हा हा हा हा

Poonam Agrawal said...

Aaki kavita vakai lajavaab hai ...kuch alag hai...kuch hat ker hai....
Bahla doge ya banoge mere sachche Arastu.... sunder bhav.....

adwet said...

bhut sundar

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सचमुच लाजवाब कर देने वाली रचना...ब्लौग पर आने के लिये धन्यवाद.

jyoti said...

yes this is gud and u r also gud ya bhabhi bhi okkkkkkkkkkkkkkkkkkkkkk