बे-तख़ल्लुस

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Friday, June 10, 2011

एक नयी ग़ज़ल...

एक नयी ग़ज़ल लेकर हाज़िर हैं...जो नेट कि मेहरबानी से किसी तरह पोस्ट हो जाए तो...




बढ़ा दी हैं मेरी गर्दिश ने जिम्मेदारियां मेरी
कहाँ हैं अब किसी के काम की नाकामियां मेरी

नज़रिया इन दिनों कैसा है उनका क्या बताऊँ, अब
खटकती ही नहीं उनकी नज़र में खूबियाँ मेरी

खुदा जाने कि मेरी मुश्किलों से वो रहा ग़मगीं
कि उसके ग़म से अफसुर्दा रहीं दुश्वारियां मेरी

किसी की चाल है या है चलन इस दौर का ऐसा
चले हैं हट के मेरे तन से अब परछाइयाँ मेरी

समझना था सभी ने अपने अपने ढंग से मुझको
समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियां मेरी

हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी

करेंगे रंग वो बेबाक सा कुछ अब के चिलमन का
कि उस चिलमन पे शा'या हो चलीं बेबाकियां मेरी


22 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

किसी की चाल है या है चलन इस दौर का ऐसा
चले हैं हट के मेरे तन से अब परछाइयाँ मेरी

bahut umda sher jo shayar ki takleef bayan karne men saksham hai ,
achchhe ash'aar se sajee is ghazal ke kiye mubarakbad qubool kijiye .

नीरज गोस्वामी said...

मनु जी बहुत अरसे बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली है...कमाल किया है आपने फिर एक बार

किसी की चाल है या है चलन इस दौर का ऐसा
चले हैं हट के मेरे तन से अब परछाइयाँ मेरी

समझना था सभी ने अपने अपने ढंग से मुझको
समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियाँ मेरी

वाह ऐसे ऐसे शेर इस ग़ज़ल में पिरोये हैं के बार बार पढने को जी करता है. दाद कबूल करें हुज़ूर.

नीरज

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

bade din tak gayab rahe sarkaar..a.cchi ghazal lagi...teesra sher bataure khaas pasand aaya..:)

daanish said...

किसी की चाल है या है चलन इस दौर का ऐसा
चले हैं हट के मेरे तन से अब परछाइयाँ मेरी

समझना था सभी ने अपने अपने ढंग से मुझको
समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियाँ मेरी

aise naayaab aur kaamyaab sher haiN k apne aap ko khud padhvaa rahe haiN..
waah !!
gazal
bs ek baar padh lene se mn nahi bhartaa...
baar baar aana hogaa
hosh aane se pehle bhi !
hosh jaane ke baad bhi !!

डिम्पल मल्होत्रा said...

kya baat pahla cmnt aapne nahi kiya:)
aap hmesha hi achha likhte ho ..
ye khas psand aaya.
हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी

Vivek Jain said...

किसी की चाल है या है चलन इस दौर का ऐसा
चले हैं हट के मेरे तन से अब परछाइयाँ मेरी

समझना था सभी ने अपने अपने ढंग से मुझको
समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियाँ मेरी

वाह, क्या बात है, विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

श्रद्धा जैन said...

kisi ki chaal waah.. samjhna tha.. khoob kaha aur khuda jaane .. sher bahut pasand aaye.. bade din baad padha aapko bahut achcha laga.. jaldi jaldi khabar dete rahe

शारदा अरोरा said...

bahut khoob ..hiasab bachpan ka bakaya tha ...

दर्पण साह said...

हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी

:-(


नज़रिया इन दिनों कैसा है उनका क्या बताऊँ, अब
खटकती ही नहीं उनकी नज़र में खूबियाँ मेरी

:-)

मनोज अबोध said...

मेरे ब्‍लाग पर आपके आगमन का धन्‍यवाद ।
आपको नाचीज का कहा कुछ अच्‍छा लगा, उसके लिए हार्दिक आभार

आपके कलम की जादूगरी अच्‍छी लगी । बधाई

saanjh said...

khatakti hi nahin unki nazar mein khoobiyaan meri.....

wahhhh...!!! kya kaha jaaye aapko sir.....lovely :)

अमिताभ श्रीवास्तव said...

मनुजी,

"उनके लिये ज़मीन नई और ये आसमां

अपने लिये चिरागे, सहर भी धुवां धुवां।"


बहुत दिन बाद आया, बहुत दिनों बाद ही आपने कुछ लिखा..ये बहुत दिन बहुत नहीं लगते जब देरियां समान हो..,
बेहतरीन कलम भी..कलाम भी

M.A.Sharma "सेहर" said...

to net aap par meherbaan ho hee gaya Manuji ...:)


समझना था सभी ने अपने अपने ढंग से मुझको
समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियाँ मेरी Umda sher !

हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी kamaal !

डिम्पल मल्होत्रा said...

नज़रिया इन दिनों कैसा है उनका क्या बताऊँ, अब
खटकती ही नहीं उनकी नज़र में खूबियाँ मेरी:-(
हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी:-)

mahendra verma said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल लिखी है मनु जी।
नए भाव, नए अर्थ।

दर्पण साह said...

the jab tak paas, to ehsaas bilkul bhi nahin tha ye,
ki unse dur rhkra door hongi duriyaan meri.

इंदु पुरी said...

लंबे अरसे बाद वापस तुम्हे और तुम्हारी गज़ल पढ़ने को मिली.हर शे'र बहुत खूबसूरत बन पड़ा है.
'चले हैं हट के मेरे तन से अब परछाइयाँ मेरी'
'समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियाँ मेरी'

'हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी'
दर्द ही दर्द दिखता है हर हर्फ में.'अगर करती नही मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी' तो भीतर तक हिला कर रख देती है.
कभी मिले तो सामने बैठ कर खूब सुनेंगे तुम्हारे शे'रो को. जियो .

Udan Tashtari said...

बहुत दिनों बाद दिखे इस बेहतरीन गज़ल के साथ.

Vishal said...

Waise to sabhi sher ba kamaal hain, lekin ye wala mujhe khas taur se pasand aayaa.. Mubarakbaad!!
हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी

neelam said...

समझना था सभी ने अपने अपने ढंग से मुझको
समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियां मेरी

हिसाबे-उम्र, इस दिल पर अभी बचपन बकाया था
अगर करती नहीं मुझको बड़ा मजबूरियां मेरी

ye do humne chura liye ,koi hungama to nahi barpega ,do hi hain

neelam said...

kamaal hai gautam ka koi comment nahi abhi tak kyun ?????????????

अनुपमा पाठक said...

समझना था सभी ने अपने अपने ढंग से मुझको
समझ कर भी समझता क्यूँ कोई खामोशियाँ मेरी
वाह!