बे-तख़ल्लुस

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'बेतख़ल्लुस' हूं मुझे कोई भी अपना लेगा

manu

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Wednesday, March 2, 2011

एक पुरानी ग़ज़ल... मेज़र साहब की जिद्द पर... ग़ज़ल..जो कि मुफलिस जी के साथ मोबाइल एस.एम.एस के द्वारा हुई...

जमा खोरो की नीती जेब पर भारी रही तो
जो खुद मिट जाने की हद तक खरीदारी रही तो

सवेरे शाम बस खिचड़ी ख्यालों की पकेगी
अगर फल से भी मंहगी अब के तरकारी रही तो

खुद अपनी शक्ल की पहचान मुश्किल हो रहेगी
उजालों की, अंधेरों से तरफदारी रही तो

वफ़ा की राह अगले वक़्त में वीरान होगी
वफादारी पे गर यूं ही ज़फा भारी रही तो

हलक से सच तुम्हीं बोलो, भला फूटेगा कैसे
अगर गर्दन पे ठहरी झूठ की आरी रही तो

गुजर बादाकाशों का बोल क्योंकर हो सकेगा..?
जो साक़ी की भी पीने में तलबगारी रही तो

सिनेमा में दिखेंगे भांड और सर्कस के जोकर
अदा के नाम पे ये ही अदाकारी रही तो



19 comments:

manu said...

नीती.*....


नीति..


:)

kshama said...

"....Jhooth kee aaree rahee to"! Behtareen gazal kahee hai!!

इस्मत ज़ैदी said...

ek bar aur salgirah mubarak ho

achchhee ghazal hai ,gautam ki zid ke liye use dhanyavad dena

Udan Tashtari said...

वाह!! क्या बात है...

daanish said...

खुद अपनी शक्ल की पहचान मुश्किल हो रहेगी
उजालों की, अँधेरों से तरफदारी रही, तो

ग़ज़ल का हर शेर
आपके अन्दर खामोश बैठे हुए शायर से
रु.ब.रु करवा रहा है जनाब !

हमें भी लुत्फ़ मिलता ही रहेगा शायरी का
करम की यूँ कहीं बारिश यही, जारी रही तो

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

सवेरे शाम बस खिचड़ी ख्यालों की पकेगी
अगर फल से भी मंहगी अब के तरकारी रही तो
ये भी एक अलग ही अंदाज़ है आपका.

उम्मतें said...

जिद जिसने भी की हो और एस.एम.एस.पर चर्चा जो भी हुई हो पर ...आपने अदभुत लिखा है ! बेहतरीन ...शानदार...बा-कमाल लेखन ! हमारी मुबारकबाद क़ुबूल फरमाइये !

Satish Saxena said...

बहुत खूब...शुभकामनायें !!

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल| धन्यवाद|

गौतम राजऋषि said...

शुक्र है, हमारे ज़िद की लाज रख ली गयी और हमसब को इतनी नायब ग़ज़ल सुनने को मिली। जियो मनु साब...जियो!! दिल खुश कर दिया!!!

"गुजर बादाकाशों का बोल क्योंकर हो सकेगा..?जो साक़ी की भी पीने में तलबगारी रही तो"...ये हमारा हुआ सर जी!

गौतम राजऋषि said...

अप्रैल में मिलेंगे तो एक साक़ी की व्यवस्था कर के रखा जाये पहले से, अभी से कहे देते हैं हम!!!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

umda gazal.

Ria Sharma said...

खुद अपनी शक्ल की पहचान मुश्किल हो रहेगी
उजालों की, अंधेरों से तरफदारी रही तो
वफ़ा की राह अगले वक़्त में वीरान होगी
वफादारी पे गर यूं ही ज़फा भारी रही तो


UMDA !!

JAI HO MANUJI :))

***Punam*** said...

खुद अपनी शक्ल की पहचान मुश्किल हो रहेगी
उजालों की, अंधेरों से तरफदारी रही तो
वफ़ा की राह अगले वक़्त में वीरान होगी
वफादारी पे गर यूं ही ज़फा भारी रही तो

बेहतरीन ग़ज़ल.....भाव पूर्ण और संवेदनापूर्ण भी !!

meena said...

bahut khoob manu ji !!!!!

रचना दीक्षित said...

वाह क्या नया अंदाज़ है ....

हल्ला बोल said...

ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. साथ ही धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
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मनोज अबोध said...

बहुत अच्‍छी रचना बधाई

हमारीवाणी said...

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