बे-तख़ल्लुस

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'बेतख़ल्लुस' हूं मुझे कोई भी अपना लेगा

manu

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Monday, May 4, 2009


दोस्तों, हिंद युग्म पर छपी ये ग़ज़ल आज पोस्ट कर रहा हूँ,,,, हम अल्मोडा जा रहे थे और इस जगह हमारी बस खराब हो गयी थी,,, पहले के दो शेर इसी लैंड स्केप के साथ साथ हुए थे,,,,,


ये हरी बस्तियां महफूज बनाए रखना,
इस अमानत पे कड़े पहरे बिठाए रखना

अगले मौसम में परिंदे जरूर लौटेंगे
सब्ज़ पेडों को,kiसी तौर बचाए रखना

जिंदगी इन के बिना और भी मुश्किल होगी
सुर्ख उम्मीद के ये फूल खिलाए रखना

शब कटी है तो कभी आफताब चमकेगा
सुनहरी मछलियों पे जाल लगाए रखना

तेरी गफलत से न रह जाए कहीं राहों में
ख्वाब की फिक्र में आँखों को जगाए रखना


मिल गया मुफलिस जी का शेर,,,,,,,


रात गुजरी है , तो सूरज भी यहाँ चमकेगा


 
नूर की बूँद से धरती को सजाये रखना 


(उम्मीद भी आ गयी , पर्यावरण का पहलु भी )
 

28 comments:

दिगम्बर नासवा said...

शब कटी है तो कभी आफताब चमकेगा
सुनहरी मछलियों पे जाल लगाए रखना
मनु जी
अल्मोडा गया तो नहीं पर सूना बहुत है ......... वहां की वादियाँ, हरियाली, सर्द मौसम............आपके शेरों में भी इनकी झलक नज़र आती है. आपके इस शेर में जीवन को मस्त जीने का अंदाज़ खूबसूरती से ढाला है

Vaise poori gazal mein prakriti ki saath jeene ka andaj bakhoobi uttara hai aapne

"अर्श" said...

वाह मनु भाई आज के मौसम के हिसाब से लिखा है आपने लगता है बहोत गर्मी के बाद आज की दिल्ली की बारिश और आपकी ये ग़ज़ल सुकून दे रहा है दिल को बहोत ही तरलता से दिल के गहराई तक पहुँच रहा है...

आखिरी शे'र के क्या कहने बहोत ही खूबसूरती से कहा है आपने...

बधाई
अर्श

हरकीरत ' हीर' said...

अगले मौसम में परिंदे जरुर लौटेगें
सब्ज़ पेडों को किसी टूर बचाए रखना

मनु जी जब आपने कहा है तो जरुर बचाए रखेगें ....बहुत खूब......!!

शब कटी है तो कभी आफताब चमकेगा
सुनहरी मछलियों पे जाल लगाए रखना

सुनहरी मछलियों पे जाल .....?? ये तो हमारा काम नहीं......!!

वैसे हिंद युग्म में भी पढ़ी थी आपकी ये ग़ज़ल.....आपने इस शेर में जीवन को मस्त जीने के अंदाज़ में खूबसूरती से ढाला है .... दिगम्बर नासवा की पंक्तियाँ चोरी कर कह रही हूँ ....!!

manu said...

जी हरकीरत जी,
मुफलिस जी न भी यही कहा था के ये जाल बिछाना कुछ जम नहीं रहा है,,,,
और उन्होंने इस के बदले एक नया शेर भी दिया था जो मुझे सारी मेल छानकर भी नहीं मिला ....
मुफलिस जी आकर मुझे एक बार फिर से वो खूबसूरत शेर दे दें तो ,,,,
मेहरबानी होगी,,,,,
बाकी ये कई साल पहले की लिखी और बनाई हुयी है,,,,,
par jaal shabd us waqt ke lihaaj se bhi galat hi hai,,,

नीरज गोस्वामी said...

मछलियों पे जाल वाली बात छोड़ दें तो ग़ज़ल खूब कही है आपने...आखरी शेर बहुत पसंद आया...लिखते रहिये...
नीरज

गौतम राजऋषि said...

ये हिंदी-युग्म पे कब आयी? और मैं चूक गया....

पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे तो ये "सुनहरी मछलियों पे जाल लगाये रखना" वाला मिस्‍रा खूब भाया...शायर की सोच है। यदि हम गुलजार साब की "आखों की महकती खुस्बू" की महक ले सकते हैं तो सुनहरी मछलियों पे जाल क्यों नहीं लगा सकते...
वैसे इस बारे में मुफ़लिस साब का नजरिया जानना दिलचस्प रहेगा...
हुज़ूssssssssर !!!
"ख्वाब की फिक्र" वाली बात ने मन मोह लिया है सरकार

दर्पण साह said...

aap likhte rahiye ghazal , hum to ho bhi aaiye...
:)


"sunhari machliyon pe jaal" ke upar sabke comment padhe...//par mujhe yehi line sabhi lines main sabse pasand aaiye...//aur main gautam ji ki baat see bhi itfaq rakhta hoon//haan phir bhi hatane ke liye kahoonga par doosre karn se (karan ye ki ismein jeev hatya ka sa put milta hai, baaki aap mujhe mujhse behtaar jante hain to kahe ka abhipraay samajh gaye honge)

Urmi said...

बहुत बहुत शुक्रिया!
बढ़िया लगा आपकी ग़ज़ल! सच कहूँ तो आपकी हर एक ग़ज़ल काबिल ऐ तारीफ है! नैनीताल बहुत ही सुंदर जगह है और मैं करीब दस साल पहले वहां घुमने गई थी! आपका ग़ज़ल पड़कर कुछ शनों के लिए मैं नैनीताल पहुँच गई थी!

सीमा सचदेव said...

मनु जी आपकी यह गज़ल हिन्दयुग्म पर पढी थी पर देरी से और टिप्पणी नही कर पाई थी । सर्व-प्रथम तो आपको उसके लिए बधाई । मुझे गज़ल की तकनीकी जानकारी नहीं और न ही बींच-बींच में प्रयोग हुए उर्दू शब्द समझ आए जैसे शब ... लेकिन prakrity चित्रण और प्रक्रति को बचाने के बात ने मंत्रमुग्ध कर दिया । ५ मई को एनवार्न्मैण्ट डे भी था तो आपकी गज़ल सही समय पर आई । बहुत-बहुत बधाई

muflis jee ka sheyar bhi laajavaab hai

हरकीरत ' हीर' said...

मनु जी,
क्यों हर बार विवाद में डाल देते हैं मुझे.....??
गौतम जी सही कह रहे हैं ....."शायर की सोच है। यदि हम गुलजार साब की "आखों की महकती खुस्बू" की महक ले सकते हैं तो सुनहरी मछलियों पे जाल क्यों नहीं लगा सकते..."...और फिर जाल तो मछलियां पकड़ने के लिए ही तो बने हैं ......!!

Mumukshh Ki Rachanain said...

वाह,

शानदार आशापूर्ण भावों की प्रस्तुति पर मेरी बधाई स्वीकारें.

ग़ज़ल की ज्यादा समझ न होने से विवाद में नहीं पड़ना चाहता.

मुझे प्रस्तुति पसंद आयी, बस इतना ही कहना है

चन्द्र मोहन गुप्त

मुकेश कुमार तिवारी said...

मनु जी,

आप से कुछ बात हुई उसके लिये मैं मुफलिस जी को धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने अपना नम्बर दिया ही और साथ आपका भी।

बहुत रोचक लगा आपसे बतियाना, देखिये किसी दिन दिल्ली में मुलाकात होती है।

इस खूबसूरत गजल के लिये पुनः बधाईयाँ ।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Riya Sharma said...

Manu ji ..

yugm par to pratikriya dee thee...yahan dekh kar ,padhkar man nahi maana ki pratikriya kiye bagair laut jaaun ..

aap ke sabhee aashavaadi jindadil sher jeene ki aas jagatey huve khoob bhaye man ko ..

अमिताभ श्रीवास्तव said...
This comment has been removed by the author.
अमिताभ श्रीवास्तव said...

lo, ye bhi khoob raha, hind yugm me aapki gazal se rubaru hua to shighra hi aapke blog par aa dhamka/ ynha fir se vaachan hua/ wah ...almoda ki vaadiya man ko khinchti he, mujhe bhi soubhagya mila he vnha ki vadiyo me apne aap ko rachne basne ka//aalam hi kuchh aour he//
aapki gazal ...muflisji ka sher...NOOR hi to he/ bahut khoob/

Pratik Ghosh said...

बहुत सुन्दर ब्लॉग...
मुझे देखकर बहुत अच्चा लगा...
आप और भी काम ब्लॉग पर डालें
बहुत अच्छे

my blog
http://kikorinakori.blogspot.com/

रश्मि प्रभा... said...

उत्कृष्ट रचना...


अगले मौसम में परिंदे जरुर लौटेगें
सब्ज़ पेडों को बचाए रखना .....

प्रकाश गोविंद said...

बहुत बढ़िया गजल बन गयी है जनाब !
हर शेर खूबसूरत है !

भाई "सुनहरी मछलियों पे जाल लगाए रखना"
हमें तो जम रहा है ! मछलियाँ होंगी तो जाल भी होंगे ! मछलियों का सुनहरी दिखना ये उनकी खूबी है और जाल लगाना हमारी फितरत !

वैसे जाल तो वो भी लेकर बैठे हैं जो कभी नदी या समुन्दर नहीं गए !

भाई जाल मतलब "नेट"
नेट यानी इंटरनेट !!

vijay kumar sappatti said...

manu saheb , deri si comment ke liye maafi chahta hoon , aapko to sab haal pata hi hai ..

gazal do baar padh chuka hoon , aur waadiyon se aur aapki gazal se nikale ka dil nahi hota hai ..

aap to kamal likhte hai saheb .. wah wah ...

meri dil se badhai sweeka r karen ..

vijay

महावीर said...

वाह! बहुत ख़ूब! आपने तो सिर्फ़ 'सुनहरी मछलियों पे जाल' की बात की है और हम तो आपके हर मिस्रे के कमाल के जाल में फंस गए। पर्यावरण के पहलू से भी क़ाबिले तारीफ़ है।
'मुफ़लिस' साहेब का शेर पढ़कर तो वाक़ई में आपके शेर के इस मिस्रे का लुत्फ़ और भी बढ़ गया:
'शब कटी ह तो कभी आफ़ताब चमकेगा'
बधाई।
महावीर शर्मा

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाहवा... मुफलिस जी के शेर को ही रखें तो खूबसूरती और बढ़ जायेगी...

Prakash Badal said...

जिनकी आँखों में नफ़रतों की चिंगारियाँ हों


ऐसे रिश्तों को हमेशा ही पराये रखना।

वाह क्या ग़ज़ल कही आपने और क्या शेर कहे मुफलिस भाई और मैने!

GAURAV said...

you are a very good writer

श्रद्धा जैन said...

wah agle mousam mein parinde bhi zarur loutenge kamaal ka sher hai

aapko padhna bhaut pasand aaya

naresh said...

bahut acche
manu bhai

दर्पण साह said...

huzooooooor ab kuch naya ho jaiye?
Waiting for ur new post !!

Mamta Sharma said...

gazal padh kar dil khush hua bahut khubsoorat andaz

दिपाली "आब" said...

shaandaar ghazal kahi hai manu ji
badhai