बे-तख़ल्लुस

manu

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Thursday, June 25, 2009

तू जो सबसे जुदा नहीं होता,
तुझपे दिल आशना नहीं होता,

कैसे होती कलाम में खुशबू,
दिल अगर फूल सा नहीं होता.........!!!!!

मेरी बेचैन धडकनों से बता,
कब तेरा वास्ता नहीं होता

खामुशी के मकाम पर कुछ भी
अनकहा, अनसुना नहीं होता

आरजू और डगमगाती है
जब तेरा आसरा नहीं होता

आजमाइश जो तू नहीं करता
इम्तेहान ये कडा नहीं होता

हो खुदा से बड़ा वले इंसां
आदमी से बड़ा नहीं होता

ज़ख्म देखे हैं हर तरह भरकर
पर कोई फायदा नही होता

राह चलतों को राजदार न कर
कुछ किसी का पता नहीं होता,

जिसका खाना खराब तू करदे
उसका फिर कुछ बुरा नहीं होता

मय को ऐसे बिखेर मत जाहिद
यूं किसी का भला नहीं होता

इक तराजू में सब को मत तौलो
हर कोई एक सा नही होता

मेरा सिर धूप से बचाने को
अब वो आँचल रवा नहीं होता

रात होती है दिन निकलता है
और तो कुछ नया नहीं होता

हम कहाँ, कब कयाम कर बैठें
हम को अक्सर पता नहीं होता

सोचता हूँ, के काश हव्वा ने
इल्म का फल चखा नहीं होता

होता कुछ और, तेरी राह पे जो
'बे-तखल्लुस' गया नहीं होता

21 comments:

manu said...

पहला कमेन्ट...
खुद मेरा ही....एक बार फिर तरही मुशायरे की ये गजल ही डाल रहा हूँ....

ज़रा ज्यादा ही लम्बी हो गयी है....( मालगाडी की तरह..)
इसके लिए मुआफ कीजियेगा....
:)
अभी तक पिछले LIVE मिनी-मुशायरे का खुमार नहीं उतरा है....( उतरेगा भी नहीं..)

Babli said...

वाह वाह क्या बात है मनु जी! काफी दिनों बाद आपका नया पोस्ट पड़ने को मिला और मुझे आपका ये ग़ज़ल बेहद पसंद आया! आप ग़ज़ल या कविता जो भी लिखते हैं कमाल का है और आपकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है! बस मैं तो यही कहूँगी की इसी तरह उम्दा ग़ज़ल और रचना लिखते रहिये! एक बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई!

M.A.Sharma "सेहर" said...

खामोशी के मुकाम पर कुछ भी
अनकहा ,अनसुना नहीं होता

सोचता हूँ,के काश हव्वा ने इल्म का फल चखा नहीं होता
होता कुछ और,तेरी राह पे जो'बे-तखल्लुस' गया नहीं होता

कहाँ से लाऊ मनु जी अती तारीफ के शब्द.??:)

आपकी ग़जल के भावों को दिल से समझने का अपना ही आनंद है

सुन्दर भाव उम्दा ग़ज़ल !!!

दिगम्बर नासवा said...

मनु जी........ हम तो पढ़ कर ही इतने खुमार में डूब गयी फिर आने तो मुशायरे में कह कर आ रहे हैं ये ग़ज़ल............... और आप कहते हैं लम्बी............. भाई हमने तो पढ़ना शुरू किया ख़त्म कब हुयी पता ही नहीं चला.......... इतनी लाजवाब........... ग़ज़ल कहना कोई आप से सीखे.......आम शब्दों से बुनी हुयी..... मेरे जैसे तमाम आम आदमी की ग़ज़ल

अमिताभ श्रीवास्तव said...

der aayad hamesha durust aayad hota he, aapki gazal ki tarah, vese sach kahu to aapki gazlo ki khumaari utarti nahi itani jaldi, so achha karte he ki beech me kaafi din rakh dete he/ taaki in dino poora mazaa liya jaa sake/ kher../ जिसका खाना खराब तू करदेउसका फिर कुछ बुरा नहीं होता../ esa prasaad mil jaaye vaah, ynha jin shbdo ka upyog he..KHARAAB, baavjood BURA nahi hota//lajavaab he/
हो खुदा से बड़ा वले इंसांआदमी से बड़ा नहीं होता
ynha bhi bahut khoob likh gaye janaab//
manuji, "gar aapka bemisaal kalaam nahi hota to sach kahe hamaara ynhaa aanaa naa hota....//"

दर्पण साह "दर्शन" said...

haar gaya...
..phir !
apse,Digambar ji se ya, amitabhi ji se nahi....

kal bijli se...
aaj madhur ki "...." se.

waise bijli aur pani naam ke do judwa bacche kahin kho gaye hai apni maa monsoon ke saath...

unki nai kotwali dariyaganj mai rapat likhane gaya tha...
...aur late ho gayi.

talash jaari thi ki jeb kat gayi...
..zindagi aur ashar dono bikhar gaye.

luta pita ghar aa raha tha ki naam bhi kisi ne loot liya...
...to 'john' odh liya...
...haan shayad...
राह चलतों को राजदार न करकुछ किसी का पता नहीं होता,
जिसका खाना खराब तू करदेउसका फिर कुछ बुरा नहीं होता

ab to fridge main (vat tax paid fridge main) ek old monk aur ek red lable padi hai...
ghar jaake dekhun kahin wo bhi kyunki kya sahi kaha hai kisi shayar ne...
मय को ऐसे बिखेर मत जाहिदयूं किसी का भला नहीं होता
इक तराजू में सब को मत तौलोहर कोई एक सा नही होता

"अर्श" said...

खुदा का शुक्र है वरना गुजराती कैसे शाम...
शराब जिसने बनाई उसे हमारा सलाम...
ये मयकदा है यहाँ का निजाम उलटा है ..
जो लाद्खादा ना सका पी के हो गया बदनाम...

सलाम हुजुर,
कौन सा शे'र यहाँ लेकर आयुन इसी ऊहापोह में हूँ और ना लेके आने का फैसला किया है ... ये वेसे ही किया जैसे उस शाम को लौटने का किया था फिर कभी नहीं आसका... उस एक शाम और रात की खुमारी तो जिन्दगी भर भी नहीं उतरने वाली...
इस ग़ज़ल के क्या कहने जनाब बहोत उम्दा हर शे'र झुमा देने वाला है ....

मनु दर्पण मुफलिस गौतम
अर्श बने सब एक नशेमन ...

सलाम जी
अर्श

Harkirat Haqeer said...

वाह ...वाह....!!
यहाँ तो खूब महफिलों के मज़े लूटे जा रहे हैं
......और हम यहाँ यूँ ही मुस्कुराते जा रहे हैं

दर्पण जी , " aaj madhur ki "...." se.
" आपके ये कोड वर्ड समझने की काफी कोशिश की पर पल्ले नहीं पड़ी ....अब देखें गौतम जी और मुफलिस जी कौन सी old monk aur red lable...लेकर आते हैं ....

कैसे होती कलाम में खुशबू
दिल अगर फूल सा नहीं होता ...

सुभानाल्लाह .....!!

आरजू और डगमगाती है
जब तेरा आसरा नहीं होता

क्या कहूँ .....बस मौन हूँ....!!

रात होती है महफिलें सजती हैं
दर्पण यूँ ही नशेमन नहीं होता .....!!

'अदा' said...

aarju dagmagati hai
jab tera aasra nahi hota

bahut khoob Manu ji...
lajwaab ...

agar samay nikaal kar meri blog par bhi aayen to accha lagega hamein.

नीरज गोस्वामी said...

कैसे होती कलाम में खुशबू,
दिल अगर फूल सा नहीं होता

आपका ये शेर ही अपने आपमें पूरी ग़ज़ल है...गुरुदेव कहा करते हैं की ऐसे शेर लिखे नहीं जा सकते ऊपर से उतरते हैं...ग़ज़ल लम्बी है लेकिन बोझिल नहीं...बहुत ही खूबसूरत शेर कहे हैं आपने...खुशबूदार फूलों जैसे...और फूलों की माला भी कभी लम्बी हुई है...???
लिखते रहें.
नीरज

Vijay Kumar Sappatti said...

manu ji ,

namaskar ...

pahli baat to aap logo ne mujhe mushaire me nahi bulaya ... yaar hamen bhi yaad kar lete ,, hum bhi aa jaate aap sabse milne ke liye ...

anyway , there is always a next time in life.. bahut jald milenge....इक तराजू में सब को मत तौलो
हर कोई एक सा नही होता.... ab kis sher ki taaref karun aur kis ki nahi .. sirf waah hji niklle jaa rahhi hai ... wah ji wah..
god bless you boss .. aap yun hi acchi acchi gazalen sunate rahe...

bahut badhai dil se...

aapka
vijay







aapka
vijay

Vijay Kumar Sappatti said...

manu ji ,

namaskar ...

pahli baat to aap logo ne mujhe mushaire me nahi bulaya ... yaar hamen bhi yaad kar lete ,, hum bhi aa jaate aap sabse milne ke liye ...

anyway , there is always a next time in life.. bahut jald milenge....इक तराजू में सब को मत तौलो
हर कोई एक सा नही होता.... ab kis sher ki taaref karun aur kis ki nahi .. sirf waah hji niklle jaa rahhi hai ... wah ji wah..
god bless you boss .. aap yun hi acchi acchi gazalen sunate rahe...

bahut badhai dil se...

aapka
vijay

MUFLIS said...

हुज़ूर ,,,
हालाँकि ये ग़ज़ल पहले भी पढ़ चुका हूँ
लेकिन अब भी नयी-नयी सी महसूस हो रही है
आपकी लेखनी par धीरे-धीरे
रश्क़ होने लगा है ...
और ...
इश्क़ भी ,,,,,

कहन , लहजा , और ख़यालात का सलीके से इज़हार .....वाआआअह्ह्ह्ह .
और ,,,वो आप सब का हसीन मुशायरा !!!!!

हाय ! उस शाम का असर, देखो ,
अब भी दिल से जुदा नहीं होता .

---मुफलिस---

दर्पण साह "दर्शन" said...

rail gaadi...
..rail gaadi !!

chuk chuk...

...kahan ho aa bhi jao !!

दिलीप कवठेकर said...

बहुत अच्छा!!

Mumukshh Ki Rachanain said...

आपका अपना ही पहला कमेन्ट इस शानदार ग़ज़ल का उचित सम्मान सा करता नहीं लग रहा है. ग़ज़ल लम्बी ज़रूर है पर पढने पर लम्बी तो प्रतीत होती ही नहीं कारण की रोचकता और जिज्ञासा लगातार बनी ही रहती है.

इस शानदार ग़ज़ल को मेरा सलाम.

मजबूरन कहना पड़ रहा है.......

समां बांधती ग़ज़ल जब दिलो-दिमाग पर
वक़्त बीत गया कितना पता नहीं होता

एक बार पुनः बधाई

चन्द्र मोहन गुप्त

'अदा' said...

आपकी यह ग़ज़ल पहले भी पढ़ चुकी हूँ, लेकिन एक बार फिर पढने कि ख्वाहिश ने मुझे यहाँ पहुंचा दिया...

आप लिखते रहें, हम आते रहेंगे ...

'अदा' said...

aapke blog par ye paitings aapki hai? jahir si baat hai aapki hi hongi, bahut khoobsurat hain, badhai sweekar karein,
agar unpar koi comment karna chahe to kahan kar sakta hai ?

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

मनु जी,
मुश्किल में हूँ कि किस शेर को यहाँ लिखूँ किसे नहीं...हर शेर लाजवाब ...वाह..वाह..वाह..

"इक तराजू में सब को मत तौलो,
हर कोई एक सा नही होता"
"मेरी बेचैन धडकनों से बता,
कब तेरा वास्ता नहीं होता"
रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....

गौतम राजरिशी said...

ऐसे तो जाने कितनी मुद्दतों बाद आप एक पोस्ट लगाओगे...और इधर हम चंद रोज के लिये गुम क्या हुये धड़ाधर दो पोस्ट????
बात क्या है?
और इस सर्च-वारंट का क्य करूँ?

इस ग़ज़ल को सुनने का सौभाग्य शायद मुझे ही पहले-पहल मिला था? या मुफ़लिस जी को?? हाँ, इतना तो जरूर है कि इसी ग़ज़ल को सुनकर मेरी वो अदनी-सी तरही ने जन्म लिया था।

"मय को ऐसे बिखेर मत जाहिद / यूं किसी का भला नहीं होता"..अहा! क्या बात कही है जिल्लेइलाही!! लोग मयकश को ढ़ूंढ़ रहे होंगे इस शेर को पढ़ कर और मैं तो उस बेतखल्लुस में छुपे सूफ़ी को...


"तेरी राह पे जो'बे-तखल्लुस' गया नहीं होता" इस पर तो कुछ कहना अपने सामर्थ्य की बात नहीं साब...!

मुलाकात के लिये बेचैन मन को समझाना दुश्वार है!

jyoti said...

u r gud