बे-तख़ल्लुस

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Monday, August 20, 2012

अनन्या भाग दो


                            अब से १३-१४  वर्ष पूर्व वह १३-१४ वर्ष का ही था ! तब खट्टी इमली का एक पौधा गुरुकुल के सामने फैली व्यर्थ सी भूमि पर उसे उगता हुआ मिला था ! उस भूमि के विषय में उसके पिता ने उसे बताया था कि वह किसी काम की नहीं है, लगभग शापित है... और उस पर कभी कुछ नहीं उग सकता ..सिवाय कंटीले झाड़ों के! किन्तु जब से गुरुकुल में उसके एक घनिष्ठ मित्र ने अपनी किसी बड़ी शंका के समाधान के समय इस स्थान की पुनः खोज की थी तब ही से प्रत्येक दिक्षार्थी की लघुशंका हेतु यह स्थान प्रचलित हो गया था ...बिना गुरुकुल के प्रधानाचार्य की स्वीकृति के ! एक दिन भादों की विचित्र दोपहर में उसकी दृष्टि इस बंजर भूमि पर फेंके गए कूड़े-करकट में से झांकते इस नन्हे इमली के पौधे पर पड़ी थी जिसकी अधिकतर जडें उस व्यर्थ सी भूमि के ऊपर ही थीं ! यहाँ तक कि जिस गहरे चमकीले कत्थई बीज से वह संभवतः उगा था, उसी को और अधिक सुन्दर, नए से हरे रूप में अपने साथ ही लिए उगे जा रहा था ! उसे ध्यान आया कि अभी कुछ समय पूर्व जेठ मास की कठोर धूप में उसने गोबर से लिपे प्राचार्य के कक्ष की पिछली भीत पर अपने नाखूनों से खोदकर ऐसा ही एक खट्टी इमली वाला पौधा उकेरा था ! तब उसकी उँगलियों पर से कुछ नाखून छूट गए थे, सूखे-लिपे गोबर पर उसके रक्त से जो चिन्ह बने थे वे सब भयावह थे.....उनमें केवल कोई पौधा था ...खट्टी इमली का कोमल हरापन कहीं नहीं था..!
                                   केवल पौधा ही सही, परन्तु मनुष्य को अपनी उँगलियों से कुरेदे इस पौधे से प्रेम था ! इमली के तने पर नवजात से हरे बीज की कमी अब भी गोबर से लिपी भीत वाले पौधे पर उसे खल रही थी ! हरे बीज का वैसा रंग उसने बस एकाध बार, एक-दो अलग तरह के वस्त्र धारण करने वाली, बहुधा अपने से बड़ी लगने वाली युवतियों की चुनरी पर देखा था ! पूर्णतः व्यर्थ भूमि पर बिखरी अद्वितीय हरीतिमा का इन अत्यावश्यक युवतियों के परिधान से क्या संबंध था, उसे कभी न पता चल सका
                                 बीतते समय के प्रत्येक तात्पर्य का भान सब को यदि न भी हो सके तो क्या समय का बीतना रुक सकता है..? हरे परिधानों वाली युवतियों से वह छोटा क्यूँ दिखता है, यह बात शायद कभी उसकी समझ में आती भी तो समय को उससे आगे निकलने का कोई न कोई और अवसर मिल जाता ! गुरुकुल के उस घनिष्ठ मित्र ने समय समय पर अपने अनुभव उस के साथ बांटे तो थे, परन्तु उसे सदैव यही लगा था कि यह सारी वार्ताएं उससे केवल इस कारण से होती हैं क्यूंकि वह अपने मित्र एवं उन युवतियों की अपेक्षा सदा अल्प वय का दिखता है ! यदि उसका जन्म कुछ और पहले हुआ होता तो शायद वह स्वयं मित्र के कंधे पर घनिष्ठता से कुहनी टिकाये हरे परिधानों की कथाएँ कह रहा होता !
                                अस्तु...! यह खट्टी इमली का पौधा उकेरने के पश्चात् उसे भीतरी सतह पर कुछ बड़ा समझा जाने लगा था ! यह भी उस समय की कुछ कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी ! लगता था कि बड़ी युवतियों की दृष्टि अब उस पर पड़ती थी तो आँखों के नीचे फैले धानी काजल से होकर पड़ती थी ! उसे तो इतना तक लगने लगा था कि उसकी काल्पनिक कुहनियों के तले घनिष्ठ मित्र का कंधा ही नहीं, प्राचार्य का शीश तक है ! परन्तु हुआ यह था कि कुछ सहपाठियों के उलाहनों के कारण उसकी वह उपलब्धि प्राचार्य को खटक गयी थी ! गुरुकुल से निष्काषित किये जाने के पश्चात् फिर उसने न तो घर का मुंह देखा, न पिता का !

                                दाहिनी ओर की दोनों भुजाओं के साथ तीसरी भुजा उसने इन्हीं विचारों के साथ पूरी तन्मयता से उकेर डाली थी ! अब प्रतिमा पर कुल जमा पांच भुजाएं थीं ! चार तो कई शताब्दियों से चलीं आ रहीं एवं पांचवीं एकदम आज ही उकेरी हुई ! एकदम अभी ही उकेरी हुई...!! एकदम उसी के द्वारा...!!! जब राजसभा में उसे इस विलक्षण कार्य हेतु विशेष सम्मान ग्रहण करने के लिए मंच पर बुलाया जाएगा तो वह सरलता से मंचासीन राज-पार्षदों पर अपनी क्षमादायक दृष्टि डालते हुए स्वीकार करेगा कि यह चमत्कार उसके कला-कौशल से नहीं हुआ, अपितु दैवयोग से उसकी दृष्टि के समक्ष पाषाण पर प्रकट हुई प्रकृति की कृपा से हुआ है !यही तो होती है विनम्रता ..जो उसके पिता में भी थी ! जैसा भी कुछ लगता उन्हें, ठीक वैसा ही कह देते थे...हर किसी को...!

                               प्रतिमा के दाहिनी ओर बनी यह विशेष भुजा स्वयं तो पूर्णतः दोष-रहित थी परन्तु इस विलक्षण सृजन से पूरी प्रतिमा उसे कुछ असंतुलित दिखने लगी थी ! दाहिना भाग कुछ अधिक भार लिए एवं बाँयां भाग कुछ हल्का..! चारों भुजाओं पर जो भुजबंद अंकित थे वे सभी कांस्य या अधिक से अधिक स्वर्ण के हो सकते थे ! पांचवीं भुजा पर भी वह ऐसा ही भुजबंद उकेरना चाहता था ! बांह पर लिपटी पाषाण की  डोर को वह किसी मूल्यवान धातु के रूप में ढालना ही चाह रहा था कि डोरी के अनगढ़े लटकाव पर उसे कुछ नयी रेखाएं दिखीं! ध्यान से देखने पर पता चला कि इस लटकाव पर बाकी चारों भुजाओं सा मूल्यवान धातुओं से बना हुआ भुजबंद नहीं है, बल्कि चार-पांच नन्हीं रेखाएं नीचे पृथ्वी की ओर गिरती हुईं एक बहुत छोटे से कमल-पुष्प की आकृति सा कुछ बना रहीं हैं ! सभी से छोटी बसौली ही जैसे तैसे इस नन्हें फूल को कच्चा पक्का उकेर पायी थी ! बाकी इसे कोमलता से तराशने का कार्य मनुष्य की उँगलियों ने ही किया था ! सब कुछ पूर्णतः स्पष्ट था अब ! अब मंच पर प्रदर्शित की जाने वाली विनम्रता की कुछ अधिक आवश्यकता उसे लग रही थी !    ...

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