बे-तख़ल्लुस

manu

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Monday, October 25, 2010

एक बे-काफिया ग़ज़ल...

एक ग़ज़ल ... बे-kaafiyaa ग़ज़ल...
करवा चौथ par...


जब से है बज्म में हमराजे सुखनवर मेरा
शे'र क्या रुक्न भी होता है मुक्कमल मेरा

कुफ्र कहते हो जिसे तुम, कभी दीवानापन
कुछ नहीं और, है ये तौर-ऐ-इबादत मेरा

रश्क होता है फरिश्तों को भी आदम से तो फिर
बोल क्यों खटके मुझे रूतबा-ऐ-आदम मेरा

रात जो हर्फ़, तमन्ना में नया लगता है
सुबह मिलता है वोही हर्फ़-ऐ-मुक़र्रर मेरा

और गहराइयां अब बख्श न हसरत मुझको
कितने सागर तो समेटे है ये साग़र मेरा

आह निकली है ओ यूं दाद के बदले उसकी
कुछ तो समझा वो मेरे शे'र से मतलब मेरा