बे-तख़ल्लुस

manu

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Sunday, January 27, 2013


फ़िक्र में रोज़ी की जब है मारा मारा आदमी
आदमी को हो भी तो कैसे गवारा आदमी 

जिसने बोला, आदमी का है गुजारा आदमी
आदमी ने उसके मुंह पर दे के मारा आदमी

फितरतन कोई किसी का भी नहीं, पर सब कहें
ये हमारा आदमी है, वो तुम्हारा आदमी

नित नए मजहब में बांटो आदमी को इस क़दर

या बचे मज़हब जहां में, या बेचारा आदमी

आदमी गोया कचौड़ी और मठरी हो गया
थोड़ा सा खस्ता है लेकिन, है करारा आदमी

बात ये भी चाशनी में घोल कर कहनी पड़ी
बातों में ऐसी मिठास, और इतना खारा आदमी ?


आदमी से रोज अंतिम सीख लेता है मगर
आदमी से सीखता है, फिर दोबारा आदमी

माँ के औरतपन के दिन तो जाने कब के लद गए
बाप में अब भी बचा है , ढेर सारा आदमी

'बे तखल्लुस' फ़िक्र है तो आने वाले कल की है
अब तलक तो आदमी का, है सहारा आदमी