बे-तख़ल्लुस

manu

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Wednesday, March 2, 2011

एक पुरानी ग़ज़ल... मेज़र साहब की जिद्द पर... ग़ज़ल..जो कि मुफलिस जी के साथ मोबाइल एस.एम.एस के द्वारा हुई...

जमा खोरो की नीती जेब पर भारी रही तो
जो खुद मिट जाने की हद तक खरीदारी रही तो

सवेरे शाम बस खिचड़ी ख्यालों की पकेगी
अगर फल से भी मंहगी अब के तरकारी रही तो

खुद अपनी शक्ल की पहचान मुश्किल हो रहेगी
उजालों की, अंधेरों से तरफदारी रही तो

वफ़ा की राह अगले वक़्त में वीरान होगी
वफादारी पे गर यूं ही ज़फा भारी रही तो

हलक से सच तुम्हीं बोलो, भला फूटेगा कैसे
अगर गर्दन पे ठहरी झूठ की आरी रही तो

गुजर बादाकाशों का बोल क्योंकर हो सकेगा..?
जो साक़ी की भी पीने में तलबगारी रही तो

सिनेमा में दिखेंगे भांड और सर्कस के जोकर
अदा के नाम पे ये ही अदाकारी रही तो