बे-तख़ल्लुस

manu

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Sunday, February 28, 2010

ताज़ा ग़ज़ल

पिछली कुछ रातों को जाने क्या क्या ख्याल आये दिल में......
बस हम फर्क ढूंढते रहे
कभी चित्रकार और कलाकार में..
कभी गायक और गवैये में...
कभी ग़ज़लकार और शायर में....
तो कभी..
ब्लोगर्स में और खुद अपने में...
थोड़ा/ज़्यादा फर्क महसूस तो हुआ...
खैर.....
अपना क्या है,
हम तो ऐसे ही सोचते सोचते एक दिन निकल लेंगे...


आप ये ताज़ा ग़ज़ल देखिये..


आदमी ग़लतियों का पुतला है
तू, जो हरदम सही है, तू क्या है

मेरे बारे में लोग जो भी कहें
मेरे बारे में तू क्या कहता है

होश की बात ही नशे में भी
ये भी पीने का कुछ तरीका है

वक़्त जाएगा किस हिसाब में, जो
हमने इक दूसरे पे खरचा है

ईन्चना है तेरा तबस्सुम फिर
मेरे जाने से कैसा कुम्हला है




Wednesday, February 10, 2010

एक और पुरानी ग़ज़ल...






जो लोग कहते हैं, वो लगावट, हो अपने भी दरमियां तो कुछ हो
इस उडती-उडती खबर से हमपे, जो तू भी हो बदगुमां तो कुछ हो

ये ग़म हमारा तेरी जुबां से न हो सके गर बयां तो कुछ हो
हो खोयी-खोयी नज़र से तेरी, जो हाल अपना अयां तो कुछ हो

करें तगाफुल पे जत्न ऐसे, तो वस्ल में क्या न वो करेंगे
मेरी तरह जो ये खुश खयाली तुझे भी हो मेरी जां तो कुछ हो

है साकी का ग़ैर से भी वादा,हमें तलब आज कुछ ज्यादा
मेरी जुनूं-खेज तिशनगी का, हो और भी इम्तेहां तो कुछ हो

क्यूं इश्क से तो यूं बे-असर है, कि हव्वा जैसी ही बे-खबर है
वो खुल्द का फल, किसी तरह गर चखे जो तेरी जुबां तो कुछ हो

शिकन का खंजर, तेरी जबीं से जिगर में मेरे उतर गया है
ये नर्म खंज़र जो खुदकुशी की कहे अगर दास्ताँ तो कुछ हो

ग़ज़ल है क्या, तुझसे गुफ्तगू है,ख्याल में पिन्हा तू ही तू है
ए मेरी वजहे -ग़ज़ल, तू मेरे सुखन में भी हो रवां तो कुछ हो,

रदीफ़ से हम तो ज्यूं के त्यूं हैं, तू काफिये सा बदल रहा है
हो मेल दोनों का 'बे-तखल्लुस', बंधे नया इक समां तो कुछ हो