बे-तख़ल्लुस

manu

manu

Thursday, August 20, 2009

वैसे तो मतले कहाँ बनते हैं ,,,,
पता नहीं क्या हुआ के मतला ही बन के रह गया.....
बस ....
छाप ही दिया ...
कब से कुछ नहीं लिखा था...



कुछ न ईमां पर कहें , जो साहिबे-ईमां नहीं
लफ्ज़ आसां है मगर ये इतना भी आसां नहीं

क्यूं ख़याल अपने हों, फैज़-औ-मीर-ग़ालिब से जुदा
या तो वो कुछ और थे, और या हमीं इन्सां नहीं.

Sunday, August 2, 2009

hind-yugm se...........


शामे-तन्हाई में क्या-क्या कहर बरपाता है दिल
क्या-क्या कह जाता है जब कहने पे आ जाता है दिल

फिक्र में डूबे सफे जब दर्द से हों रूबरू
इक ग़ज़ल उम्मीद की हौले से लिख जाता है दिल

चुगलियाँ रंगीन प्याले की, सुराही के गिले
दोनों की सुनता है और दोनों को समझाता है दिल

चुप लगाकर धड़कनें और गुनगुना कर खामुशी
सुनती हैं तकरीरे-उल्फत, और फरमाता है दिल

खुश ख्यालों से घनेरी चांदनी की जुल्फ को
आप उलझा हो वले, पर हंस के सुलझाता है दिल

जब वो तेरे हैं तो फिर क्या दूरियां-नजदीकियां
जिंदगी को और कभी यूं खुद को बहलाता है दिल