बे-तख़ल्लुस

manu

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Monday, January 26, 2009

नज़्म


वक्त बद-वक्त सही
आसमां सख्त सही,
न कोई ठोर-ठिकाना
कहीं ज़माने में,
खुशी की ज़िक्र तक
बाकी नहीं फ़साने में,
कब से पोशीदा लिए बैठा हूँ
इन ज़ख्मों को.....
टूटे दिल को
तेरे मरहम की ज़रूरत भी नहीं.....
अश्क अब सूख चले
आँख के समंदर से.....
अब गिला तुझसे नहीं
दिल से शिकायत भी नहीं.......
वक्त बद-वक्त सही................

वो ढलती शाम का कहना
यहीं रुक जाओ तुम....
जाने कल कौन सा अज़ाब
लिए आए सहर........
कल आफ़ताब उगे
जाने किसका पी के लहू.........
जाने कल
इम्तिहाने-इश्क पे आ जाए दहर.........
आज बस जाओ
इस दिल के गरीबखाने में......
वक्त बद-वक्त सही
आसमां सख्त सही,
न कोई ठोर-ठिकाना कहीं ज़माने में.............

Monday, January 19, 2009

चांदनी के देस


चन्दों से बने घर में बसाने के वास्ते,
इनसान के दिल से तुझे निकाल रहे हैं,

मासूम हैं बहोत तेरे पाले हुए बन्दे
हैं ज़हर नाक वो जो तुझे पाल रहे हैं

ये और ही जहान के मज़हब के लोग हैं
जो तेरे मेरे बीच दरर डाल रहे हैं

वादे वफ़ा से उनका कोई वास्ता नहीं
वादे मगर ज़बां पे बहरहाल रहे हैं

धरती से गिला हमको न अम्बर से शिकायत 
जिस हाल में रहे हों, खुश खयाल रहे हैं

जिनसे गुज़र के पहुंचा हूँ मैं चांदनी के देस 
वो रास्ते अंधेरों से पामाल रहे हैं....||