बे-तख़ल्लुस

manu

manu

Sunday, November 30, 2008

आख़िर शाम को मैंने अपना वोट दे ही दिया.....एक स्याही आज अपनी भी ऊंगलियों को छू गयी............................
मेरे वाला आए ...तेरे वाला आए .......................................................................................................
पर ऐसा कोई ना आए .....जैसे के आते रहे है...................

Saturday, November 29, 2008

आज पूरी रात दिमाग में कैफ़ी आज़मी साहब की नीचे लिखी लाइने घूमती रहीं, और मैं रात भर सोचता रहा के आख़िर मैंने आज तक वोट क्यूं नहीं दिया ......"आज की रात बहोत गर्म हवा चलती है आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी ,मैं उठूँ,तुम भी उठो,ये भी उठे वो भी उठे,कोई खिड़की इसी दीवार पे खुल जायेगी "चलो वोट दे आयें
क्या जोर-ऐ-सितम जाने,
लीडर की है पैदाइश ,
नाजों से पला है इक ,
गुलदस्ते का गुँचा है

Wednesday, November 26, 2008

""ये ज़मीं, चुकने ही वाली है पर मेरे हमदम...कोंपलें और भी फूटेंगी इन ख़लाओं से.....!!""

Monday, November 24, 2008


हमने समझा

सिमट

रही है ज़मीन

फासले

तंग होते

जा रहे हैं

अब ये जाना

बढ़ी है

भीड़ बहुत

जो थोड़े से थे

वो लोग

खोते जा रहे हैं



अब ना

परदा उठा

ऐ शाम-ऐ-हयात

अब ना

मंज़र में

वो सबाहत है

अब ना

नज़रों में

वो उजाले हैं

अश्क हर

नक्श धोते जा रहे हैं

Sunday, November 23, 2008

एम.एफ़.एवं एफ़.एम......!


एम.एफ। और एफ एम। दो ऐसे शब्द जिन से जब तब मुलाकात हो जाती है। एक एम एफ तो बहुतेरे लोगों के गले ही नहीं उतरता यानी अपना एम एफ हुसैन ! और एक एफ.एम.के बगैर बहुतेरों को दुनिया ही सूनी लगती है यानी एफ.एम.रेडियो! अपना मिजाज़ काफी लोगों से अक्सर मेल नहीं खाता। एम.एफ.बेचारे में तो अपने को ऐसी कोई ख़ास कमी नहीं लगती जिस के चलते इतना बवाल होता है। और आप भी सोच कर देखें ...कुछ ज़्यादा ही नहीं हो जाता भले आदमी के साथ..? और अब ज़रा एफ.एम.महोदय की भी सुध लें.... कितने ही लोग हैं जिनकी सुबह एफ.एम.के किसी न किसी चैनल से होती है जो अक्सर देर रात तक तारी रहता है। एफ.एम.गोल्ड की बात छोड़ दें तो ज्यादातर के साथ मेरा तज़ुर्बा कड़वा ही रहा है। हालांकि मैं चाह कर भी एफ.एम.नहीं सुन पाता लेकिन जब कभी भी न चाहते हुए भी सुना है तो मेरी चाहत ने इससे तौबा ही की है। गीत की पसंद की तो बात करना बेमानी होगा क्योंकि वो तो सब मुट्ठी भर लोगों की मर्ज़ी से ही बजते बनते हैं। हाँ !जब मुसलसल सुनते सुनते कान पक जाते हैं और मजबूरन इनके आदी जाते हैं तो मेरे जैसे बाकी बेबस श्रोताओं की तरह मुझे भी इनकी सुपर-डूपेर्टी कबूलनी पड़ती है। ये तो बात हुई संगीत माफिया की या कह लें के पूँजीवाद की जिनका के एक निरीह श्रोता कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इन उदघोषकों से अवश्य ही प्रार्थना करना चाहूँगा के कम से कम आप लोग अर्थपूर्ण गीत न बजाया किजीये। गलती से आ गयी फरमाइश पे भी नहीं!इनका बड़ा अनर्थ होता है।कोई भी गंभीरता से संगीतबद्द किया गीत सुनने के फ़ौरन बाद आर.जे.की बेसिर पैर की उन्मुक्त चटर पटर तमाचे जैसी लगती है। जैसे "बिछडे सभी बारी बारी....!" चल रहा है और आधे अधूरे रफी साहब को एन बीच में घोटकर पूरी मस्ती में चहकना 'ओ.के.फ्रेंड्स !ये साहब तो बिछड़ गए हैं अब आपके साथ है वैरी वैरी होट.......!!!!!!!!! भगवान् के लिए ऐसे ही गीत बजाएं जो आपके माहौल को सूट करें। अच्छे संगीत के मर्म की समझ जो आकाशवाणी के उदघोषकों को थी उसका तो अब एकदम अकाल है। ग़ालिब का शेर याद आ रहा है ....
"अब है इस मामूर में कहते-गम-ऐ-उल्फत असद,
हमने माना के रहे दिल्ली में पर खाएँगे क्या?"